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| परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्—धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 4 (श्लोक 1-10)
श्लोक 1
संस्कृत:
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
अनुवाद: श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।
विश्लेषण: यहाँ श्रीकृष्ण इस ज्ञान की प्राचीनता और प्रामाणिकता सिद्ध कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि यह ज्ञान कोई नई विचारधारा नहीं है, बल्कि सृष्टि के आरंभ से महान राजाओं और ऋषियों के माध्यम से चली आ रही एक दिव्य परंपरा है।
संस्कृत: इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
अनुवाद: श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।
विश्लेषण: यहाँ श्रीकृष्ण इस ज्ञान की प्राचीनता और प्रामाणिकता सिद्ध कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि यह ज्ञान कोई नई विचारधारा नहीं है, बल्कि सृष्टि के आरंभ से महान राजाओं और ऋषियों के माध्यम से चली आ रही एक दिव्य परंपरा है।
श्लोक 2
संस्कृत:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
अनुवाद: हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया।
विश्लेषण: समय के साथ शुद्ध ज्ञान में मिलावट हो जाती है या लोग उसे भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो योग (ज्ञान) लुप्त हो गया था, उसे पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
संस्कृत: एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
अनुवाद: हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया।
विश्लेषण: समय के साथ शुद्ध ज्ञान में मिलावट हो जाती है या लोग उसे भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो योग (ज्ञान) लुप्त हो गया था, उसे पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
श्लोक 3
संस्कृत:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
अनुवाद: तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है।
विश्लेषण: ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता क्या है? श्रीकृष्ण के अनुसार 'प्रेम और श्रद्धा' (भक्त और सखा होना)। वे अर्जुन को यह गुप्त रहस्य इसलिए दे रहे हैं क्योंकि अर्जुन का हृदय शुद्ध है।
संस्कृत: स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
अनुवाद: तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है।
विश्लेषण: ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता क्या है? श्रीकृष्ण के अनुसार 'प्रेम और श्रद्धा' (भक्त और सखा होना)। वे अर्जुन को यह गुप्त रहस्य इसलिए दे रहे हैं क्योंकि अर्जुन का हृदय शुद्ध है।
श्लोक 4
संस्कृत:
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥
अनुवाद: अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
विश्लेषण: अर्जुन यहाँ एक तर्कसंगत प्रश्न पूछता है। वह श्रीकृष्ण को केवल वासुदेव के पुत्र के रूप में देख रहा है, इसलिए उसे समय का यह अंतराल (Time Gap) समझ नहीं आ रहा।
संस्कृत: अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥
अनुवाद: अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
विश्लेषण: अर्जुन यहाँ एक तर्कसंगत प्रश्न पूछता है। वह श्रीकृष्ण को केवल वासुदेव के पुत्र के रूप में देख रहा है, इसलिए उसे समय का यह अंतराल (Time Gap) समझ नहीं आ रहा।
श्लोक 5
संस्कृत:
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥
अनुवाद: श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।
विश्लेषण: यहाँ श्रीकृष्ण अपनी ईश्वरता प्रकट करते हैं। जीव (अर्जुन) अज्ञान के कारण पिछले जन्मों को भूल जाता है, लेकिन ईश्वर (कृष्ण) को सब कुछ स्मृति में रहता है।
संस्कृत: बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥
अनुवाद: श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ।
विश्लेषण: यहाँ श्रीकृष्ण अपनी ईश्वरता प्रकट करते हैं। जीव (अर्जुन) अज्ञान के कारण पिछले जन्मों को भूल जाता है, लेकिन ईश्वर (कृष्ण) को सब कुछ स्मृति में रहता है।
श्लोक 6
संस्कृत:
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
अनुवाद: मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
विश्लेषण: अवतार का विज्ञान—ईश्वर जन्म नहीं लेता, वह 'प्रकट' होता है। वे अपनी ही माया (शक्ति) का उपयोग करके संसार में देह धारण करते हैं, लेकिन वे प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं होते।
संस्कृत: अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
अनुवाद: मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
विश्लेषण: अवतार का विज्ञान—ईश्वर जन्म नहीं लेता, वह 'प्रकट' होता है। वे अपनी ही माया (शक्ति) का उपयोग करके संसार में देह धारण करते हैं, लेकिन वे प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं होते।
श्लोक 7
संस्कृत:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
अनुवाद: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से प्रकट होता हूँ।
विश्लेषण: यह भगवद्गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। यह अवतार के 'समय' और 'कारण' को बताता है। जब समाज का नैतिक पतन चरम पर होता है, तब ईश्वरीय हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।
संस्कृत: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
अनुवाद: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से प्रकट होता हूँ।
विश्लेषण: यह भगवद्गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। यह अवतार के 'समय' और 'कारण' को बताता है। जब समाज का नैतिक पतन चरम पर होता है, तब ईश्वरीय हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।
श्लोक 8
संस्कृत:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
अनुवाद: साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।
विश्लेषण: अवतार के तीन उद्देश्य: 1. सज्जनों की रक्षा, 2. दुष्टों का विनाश, 3. धर्म के मूल्यों की पुनः स्थापना।
संस्कृत: परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
अनुवाद: साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।
विश्लेषण: अवतार के तीन उद्देश्य: 1. सज्जनों की रक्षा, 2. दुष्टों का विनाश, 3. धर्म के मूल्यों की पुनः स्थापना।
श्लोक 9
संस्कृत:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
अनुवाद: हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है।
विश्लेषण: जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि ईश्वर का अवतार स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि कल्याण के लिए है, वह मुक्त हो जाता है। ईश्वर के दिव्य स्वरूप का ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है।
संस्कृत: जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
अनुवाद: हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है।
विश्लेषण: जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि ईश्वर का अवतार स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि कल्याण के लिए है, वह मुक्त हो जाता है। ईश्वर के दिव्य स्वरूप का ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है।
श्लोक 10
संस्कृत:
वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥
अनुवाद: पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे बहुत से भक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
विश्लेषण: मोक्ष की विधि—राग (लगाव), भय और क्रोध से मुक्ति। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कई लोग इस 'ज्ञान-रूपी तप' से शुद्ध होकर पहले ही ईश्वर के भाव को प्राप्त कर चुके हैं।
संस्कृत: वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥
अनुवाद: पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे बहुत से भक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
विश्लेषण: मोक्ष की विधि—राग (लगाव), भय और क्रोध से मुक्ति। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कई लोग इस 'ज्ञान-रूपी तप' से शुद्ध होकर पहले ही ईश्वर के भाव को प्राप्त कर चुके हैं।
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