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| "सृष्टि का आदि, मध्य और अंत मैं ही हूँ; मुझसे रहित कुछ भी नहीं है।" |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 10 (श्लोक 31-40)
श्लोक 31
संस्कृत: पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥
भावार्थ: मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ।
विश्लेषण: भगवान अपनी शुद्धता और सामर्थ्य को दर्शा रहे हैं। वायु की गति, श्रीराम की मर्यादा और वीरता, तथा गंगा की पवित्रता—ये सब ईश्वर की ही श्रेष्ठता के रूप हैं।
श्लोक 32
संस्कृत: सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) और चर्चा करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला 'वाद' हूँ।
विश्लेषण: संसार की उत्पत्ति से प्रलय तक सब कुछ परमात्मा है। विद्याओं में वह विद्या जो आत्मा का ज्ञान दे, वह सर्वश्रेष्ठ है और भगवान का स्वरूप है।
श्लोक 33
संस्कृत: अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥
भावार्थ: मैं अक्षरों में 'अ' कार हूँ और समासों में 'द्वंद्व' नामक समास हूँ। अक्षयकाल (महाकाल) तथा सब ओर मुखवाला, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।
विश्लेषण: जैसे 'अ' के बिना भाषा संभव नहीं, वैसे ही ईश्वर के बिना अस्तित्व संभव नहीं। वे ही अनंत काल हैं जो कभी समाप्त नहीं होता।
श्लोक 34
संस्कृत: मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
भावार्थ: मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का कारण हूँ। स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा (बुद्धि), धृति (धैर्य) और क्षमा—ये सात दिव्य गुण मैं ही हूँ।
विश्लेषण: मृत्यु के रूप में वे सब कुछ हर लेते हैं, और जीवन के रूप में नई सृष्टि करते हैं। मानवीय सद्गुणों में वे ही श्रेष्ठता के रूप में वास करते हैं।
श्लोक 35
संस्कृत: बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥
भावार्थ: मैं गायन योग्य श्रुतियों में बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ। महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ।
विश्लेषण: गायत्री मंत्र की महिमा और वसंत ऋतु की सुंदरता (फूलों का खिलना) ईश्वर के आनंदमयी स्वरूप को प्रकट करती है।
श्लोक 36
संस्कृत: द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥
भावार्थ: मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों की विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ।
विश्लेषण: यहाँ भगवान बताते हैं कि जीत की खुशी, संकल्प की शक्ति और यहाँ तक कि छल की प्रबलता में भी उनकी माया/शक्ति ही कार्य कर रही है।
श्लोक 37
संस्कृत: वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥
भावार्थ: वृष्णिवंशियों में वासुदेव (स्वयं कृष्ण), पाण्डवों में धनञ्जय (अर्जुन), मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य भी मैं ही हूँ।
विश्लेषण: भगवान अपने सखा अर्जुन और स्वयं को भी अपनी ही विभूति बताते हैं, यह दर्शाते हुए कि श्रेष्ठता कहीं भी हो, वह उन्हीं का अंश है।
श्लोक 38
संस्कृत: दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥
भावार्थ: मैं दमन करने वालों की दंड-शक्ति हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों में 'मौन' हूँ और ज्ञानवानों का तत्वज्ञान मैं ही हूँ।
विश्लेषण: न्याय की शक्ति, कूटनीति की चतुरता और मौन की गहराई—ये सब ईश्वर को अनुभव करने के माध्यम हैं।
श्लोक 39
संस्कृत: यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण (बीज) है, वह मैं ही हूँ। ऐसा कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो।
विश्लेषण: यहाँ अध्याय का सार है—संसार की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी वस्तु का अस्तित्व केवल इसलिए है क्योंकि उसमें परमात्मा का अंश है।
श्लोक 40
संस्कृत: नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥
भावार्थ: हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए केवल संक्षेप में (उदाहरण मात्र) कहा है।
विश्लेषण: भगवान स्वीकार करते हैं कि उनकी महिमा असीम है। उन्होंने तो केवल कुछ झलकियाँ मात्र दिखाई हैं ताकि अर्जुन की बुद्धि उन्हें हर जगह देख सके।

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