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| "दिव्य आँखों के बिना उस परम सत्य का दर्शन संभव नहीं है।" |
श्लोक 1
संस्कृत: मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
भावार्थ: अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान (मोह) नष्ट हो गया है।
विश्लेषण: अर्जुन स्वीकार करते हैं कि पिछले अध्यायों के उपदेश ने उनके मन के भ्रम को दूर कर दिया है। अब वे समझ चुके हैं कि कृष्ण केवल एक शरीर नहीं, बल्कि साक्षात् परमेश्वर हैं।
श्लोक 2
संस्कृत: भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
भावार्थ: हे कमलनेत्र! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा का भी श्रवण किया है।
विश्लेषण: अर्जुन भगवान को 'कमलपत्राक्ष' (कमल के समान नेत्रों वाले) कहकर संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने सैद्धांतिक रूप से भगवान की शक्ति को समझ लिया है, लेकिन अब वे उसे प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं।
श्लोक 3
संस्कृत: एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
भावार्थ: हे परमेश्वर! आप अपने विषय में जो कुछ कहते हैं, वह बिल्कुल वैसा ही है; परन्तु हे पुरुषोत्तम! मैं आपके उस ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति से युक्त 'ईश्वरीय रूप' को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
विश्लेषण: यह श्लोक जिज्ञासा की पराकाष्ठा है। अर्जुन केवल सुनकर संतुष्ट नहीं हैं, वे उस विराट सत्य का अनुभव अपनी आँखों से करना चाहते हैं।
श्लोक 4
संस्कृत: मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
भावार्थ: हे प्रभो! यदि आप ऐसा मानते हैं कि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना संभव है, तो हे योगेश्वर! मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन कराइए।
विश्लेषण: अर्जुन यहाँ अत्यंत विनम्र हैं। वे यह नहीं कह रहे कि "दिखाइये ही", बल्कि कह रहे हैं कि "यदि मैं उसके योग्य हूँ और यदि आप संभव समझते हैं"।
श्लोक 5
संस्कृत: पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के, अलौकिक और अनेक रंगों तथा आकृतियों वाले दिव्य रूपों को देख।
विश्लेषण: भगवान अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार करते हैं। वे संकेत देते हैं कि उनका रूप किसी एक सीमा में बँधा नहीं है, बल्कि वह अनंत विविधताओं का पुंज है।
श्लोक 6
संस्कृत: पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहूनीदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥
भावार्थ: हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को, वसुओं को, रुद्रों को, अश्विनीकुमारों को और मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख।
विश्लेषण: भगवान अर्जुन को मानसिक रूप से तैयार कर रहे हैं कि वे केवल कृष्ण को नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के देवताओं और उन शक्तियों को देखने वाले हैं जिन्हें पहले कभी किसी ने नहीं देखा।
श्लोक 7
संस्कृत: इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ॥
भावार्थ: हे गुडाकेश (अर्जुन)! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित, चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ तू देखना चाहता है, वह देख ले।
विश्लेषण: 'इहैकस्थं' का अर्थ है—एक ही स्थान पर। पूरा ब्रह्मांड भगवान के शरीर के एक छोटे से हिस्से में सिमटा हुआ है। अर्जुन की हर जिज्ञासा यहाँ शांत होने वाली है।
श्लोक 8
संस्कृत: न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
भावार्थ: परन्तु तू मुझको इन अपने प्राकृतिक नेत्रों द्वारा देखने में समर्थ नहीं है, इसलिए मैं तुझे 'दिव्य चक्षु' देता हूँ, जिससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख।
विश्लेषण: दिव्य सत्य को देखने के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है। हमारी साधारण आँखें केवल भौतिक पदार्थों को देख सकती हैं, विराट रूप को देखने के लिए भगवान ने अर्जुन को चेतना की एक नई दृष्टि प्रदान की।
श्लोक 9
संस्कृत: एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥
भावार्थ: संजय बोले- हे राजन् (धृतराष्ट्र)! महायोगेश्वर और पापों का नाश करने वाले भगवान हरि ने इस प्रकार कहकर अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य विश्वरूप दिखाया।
विश्लेषण: यहाँ से संजय धृतराष्ट्र को उस महान दृश्य का वर्णन सुनाना शुरू करते हैं जो युद्धभूमि में घटित हो रहा है।
श्लोक 10
संस्कृत: अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥
भावार्थ: उस रूप में अनेक मुख और नेत्र थे, अनेक अद्भुत दृश्य थे, बहुत से दिव्य आभूषण थे और बहुत से दिव्य शस्त्र हाथों में उठाए हुए थे।
विश्लेषण: विश्वरूप का वर्णन शुरू होता है। यह रूप इतना विशाल है कि इसके मुख और नेत्रों की कोई गिनती नहीं है।
श्लोक 11
संस्कृत: दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
भावार्थ: उन्होंने दिव्य मालाएं और वस्त्र धारण किए हुए थे, शरीर पर दिव्य गंध का लेप था। वह रूप सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख वाला (विराट) था।
विश्लेषण: भगवान का वह देव-स्वरूप अत्यंत सुगंधित और प्रकाशमान था। 'विश्वतोमुखम्' का अर्थ है कि वे हर दिशा में देख रहे थे, उनकी सत्ता से बाहर कुछ भी नहीं था।

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