अध्याय 14 श्लोक 1 - 10 | गुणत्रयविभागयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

तीन रंगों की किरणों के बीच बैठी एक मानव आकृति जो सत्त्व (सफ़ेद), रज (लाल) और तम (काला) गुणों के प्रभाव को दर्शाती है।
"संसार की हर गतिविधि प्रकृति के इन तीन गुणों का ही खेल है।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 14 (श्लोक 1-10)

श्लोक 1

संस्कृत: परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी जो अति उत्तम परम ज्ञान है, उसे मैं फिर से कहूँगा, जिसे जानकर सभी मुनिजन इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।

विश्लेषण: भगवान यहाँ 'गुणों के विज्ञान' को सर्वश्रेष्ठ ज्ञान कह रहे हैं, क्योंकि इसे समझे बिना कोई यह नहीं जान सकता कि हम व्यवहार कैसे करते हैं और मुक्त कैसे हो सकते हैं।


श्लोक 2

संस्कृत: इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

भावार्थ: इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त हो गए हैं, वे सृष्टि के आरंभ में दोबारा जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय भी व्याकुल नहीं होते।

विश्लेषण: यह ज्ञान जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला है। जो गुणों के खेल को समझ लेता है, वह काल की सीमाओं से ऊपर उठ जाता है।


श्लोक 3

संस्कृत: मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! मेरी 'महत्‌-ब्रह्म' रूप मूल-प्रकृति (जड़) सभी भूतों की योनि (गर्भधारण का स्थान) है और मैं उसमें चेतन रूपी बीज को स्थापित करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से ही सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

विश्लेषण: सृष्टि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जहाँ 'प्रकृति' (Material) और 'पुरुष' (Consciousness) का मिलन होता है। भगवान यहाँ स्वयं को चेतना का स्रोत बता रहे हैं।


श्लोक 4

संस्कृत: सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

भावार्थ: हे कुन्तीपुत्र! सभी योनियों में जितने भी शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति उन सबकी माता (गर्भधारण करने वाली) है और मैं बीज स्थापित करने वाला पिता हूँ।

विश्लेषण: जैसे एक पौधे के लिए मिट्टी माता है और बीज डालने वाला पिता, वैसे ही हमारे भौतिक शरीर प्रकृति से बने हैं, लेकिन हमारे भीतर की जीवन-शक्ति परमात्मा से आई है।


श्लोक 5

संस्कृत: सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥

भावार्थ: हे महाबाहो! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर के भीतर बाँधते हैं।

विश्लेषण: यहाँ से 'तीन गुणों' का मुख्य विषय शुरू होता है। आत्मा तो स्वतंत्र है, लेकिन ये तीन गुण रस्सी की तरह उसे शरीर और संसार के मोह में जकड़ लेते हैं।


श्लोक 6

संस्कृत: तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌ । सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ ॥

भावार्थ: हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में 'सत्त्वगुण' निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और दोषरहित है। वह जीवात्मा को सुख और ज्ञान के अभिमान (आसक्ति) से बाँधता है।

विश्लेषण: सत्त्वगुण अच्छा है (शांति, ज्ञान), लेकिन यह भी एक 'सुनहरी जंजीर' है। सत्त्वगुणी व्यक्ति अपने ज्ञान और सुख के अहंकार में बँध सकता है।


श्लोक 7

संस्कृत: रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ । तन्निबध्नति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! 'रजोगुण' को रागात्मक (कामनाओं वाला) जान, जो तृष्णा और आसक्ति से पैदा होता है। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फलों के संबंध में बाँध देता है।

विश्लेषण: रजोगुण सक्रियता का गुण है। यह हमें बेचैन रखता है, नई चीजें पाने की इच्छा पैदा करता है और हमें दिन-रात काम में उलझाए रखता है।


श्लोक 8

संस्कृत: तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नति भारत ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! सभी देहाभिमानियों को भ्रमित करने वाले 'तमोगुण' को अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (लापरवाही), आलस्य और नींद के द्वारा बाँधता है।

विश्लेषण: तमोगुण सबसे निचला गुण है। यह बुद्धि को ढँक देता है। इसके प्रभाव में इंसान काम टालता है, ज्यादा सोता है और सही-गलत का अंतर भूल जाता है।


श्लोक 9

संस्कृत: सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है, और तमोगुण ज्ञान को ढँककर केवल प्रमाद (गलत कामों) में लगाता है।

विश्लेषण: हमारी मानसिक स्थिति इन गुणों पर निर्भर करती है। सुख की चाह सत्त्व है, भागदौड़ रज है और आलस्य या भ्रम तम है।


श्लोक 10

संस्कृत: रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! कभी रज और तम को दबाकर सत्त्व बढ़ जाता है, कभी सत्त्व और तम को दबाकर रज बढ़ जाता है, तो कभी सत्त्व और रज को दबाकर तम बढ़ जाता है।

विश्लेषण: हमारे भीतर इन तीनों गुणों का निरंतर युद्ध चलता रहता है। कभी हम बहुत शांत महसूस करते हैं (सत्त्व), कभी बहुत व्याकुल (रज), और कभी बहुत सुस्त (तम)। यह गुणों का चक्र ही हमारे व्यक्तित्व को बदलता रहता है।

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