अध्याय 14 श्लोक 11 - 20 | गुणत्रयविभागयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

एक योगी जो प्रकाश के पुंज के रूप में तीनों गुणों (सफ़ेद, लाल, काले रंग के चक्रों) को पार कर ऊपर उठ रहा है।
"तीनों गुणों को पार कर जाना ही मनुष्य जीवन की वास्तविक सफलता है।"


श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 14 (श्लोक 11-20)

श्लोक 11

संस्कृत: सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥

भावार्थ: जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।

विश्लेषण: जब आपका मन शांत हो, बुद्धि सही-गलत का फैसला कर पा रही हो और इंद्रियाँ वश में हों, तो समझें कि आप 'सत्त्व' के प्रभाव में हैं। यह आंतरिक प्रकाश की अवस्था है।


श्लोक 12

संस्कृत: लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, कर्मों में निरंतर प्रवृत्ति (भागदौड़), स्वार्थवश नए कार्यों का आरम्भ, अशान्ति और विषय-भोगों की लालसा—ये सब उत्पन्न होते हैं।

विश्लेषण: रजोगुण बढ़ने पर इंसान कभी शांत नहीं बैठता। उसे हमेशा कुछ नया पाने की भूख (लोभ) लगी रहती है और वह सांसारिक सुखों के पीछे भागता रहता है।


श्लोक 13

संस्कृत: अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अंधकार, कर्तव्य-कर्मों को न करना, प्रमाद (व्यर्थ की चेष्टाएँ) और मोह (मूर्खता)—ये सब उत्पन्न होते हैं।

विश्लेषण: तमोगुण व्यक्ति को आलसी और लापरवाह बनाता है। उसे क्या करना चाहिए, यह समझ नहीं आता और वह केवल भ्रम में जीता है।


श्लोक 14

संस्कृत: यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌ । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥

भावार्थ: जब कोई मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि की स्थिति में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य लोकों (स्वर्ग आदि) को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: मृत्यु के समय हमारी चेतना जिस गुण में होती है, वही हमारे अगले जीवन का आधार बनती है। सत्त्वगुण ऊर्ध्वगति (ऊपर की ओर) ले जाता है।


श्लोक 15

संस्कृत: रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्‍गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥

भावार्थ: रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु होने से जीव कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में जन्म लेता है, तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य पशु-पक्षी आदि मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

विश्लेषण: रजोगुण हमें वापस इसी कर्मप्रधान संसार में लाता है, जबकि तमोगुण हमें चेतना के निचले स्तरों (पशु योनि) में गिरा देता है।


श्लोक 16

संस्कृत: कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ ॥

भावार्थ: श्रेष्ठ (सात्त्विक) कर्म का फल सुख और ज्ञान रूपी निर्मल फल कहा गया है, राजस कर्म का फल दुःख है और तामस कर्म का फल अज्ञान है।

विश्लेषण: जैसा बीज, वैसा फल। अच्छे कार्यों से सुख मिलता है, स्वार्थी कार्यों से अंततः दुःख मिलता है, और अज्ञानपूर्ण कार्यों से केवल अंधकार मिलता है।


श्लोक 17

संस्कृत: सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥

भावार्थ: सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से निश्चित ही लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

विश्लेषण: हमारी बुद्धि का विकास सत्त्व से होता है, लालच रज से आता है और भ्रम तम से पैदा होता है।


श्लोक 18

संस्कृत: ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

भावार्थ: सत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण वाले मध्य में (मनुष्य लोक में) ही रहते हैं और तमोगुण की नीच वृत्तियों में स्थित तामस पुरुष अधोगति (नरक या नीच योनियों) को प्राप्त होते हैं।

विश्लेषण: यह ब्रह्मांड का 'ट्रैफिक सिस्टम' है। आपकी मानसिक फ्रीक्वेंसी ही तय करती है कि आप ब्रह्मांड के किस स्तर पर जाएंगे।


श्लोक 19

संस्कृत: नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥

भावार्थ: जिस समय देखने वाला (द्रष्टा) यह जान लेता है कि इन गुणों के अलावा कोई दूसरा कर्ता नहीं है, और वह गुणों से परे परमात्मा को जान लेता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: मुक्ति का रहस्य यह जानना है कि शरीर के सारे काम ये तीन गुण ही कर रहे हैं, आत्मा तो केवल साक्षी है। जब हम गुणों के खेल को समझकर उनसे ऊपर उठते हैं, तो ईश्वर को प्राप्त करते हैं।


श्लोक 20

संस्कृत: गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌ । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

भावार्थ: यह देहधारी पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को पार करके जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त होकर परमानन्द (अमृत) को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: 'गुणातीत' (गुणों से परे) होना ही मोक्ष है। जो व्यक्ति सुख-दुःख देने वाले इन तीनों गुणों से प्रभावित नहीं होता, वह इसी जीवन में अमरत्व का अनुभव करता है।

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