Geeta Adhyay 17 Shlok 21-28 in Hindi: ॐ तत्सत् का अर्थ और महिमा

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग) श्लोक 21 से 28 हिंदी अर्थ व व्याख्या

Gita Hindi Adhyay 17 Shlok 21-28 Om Tat Sat Meaning Shrimad Bhagavad Gita Chapter 17

"श्रद्धा के बिना किया गया हर शुभ कार्य 'असत्' है।"

Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के 17वें अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के समापन श्लोकों (21 से 28) में भगवान श्रीकृष्ण राजस और तामस दान के लक्षणों का वर्णन करते हैं। इसके साथ ही, वे परमात्मा के परम पावन नाम 'ॐ तत्सत्' का आध्यात्मिक रहस्य और महिमा प्रकट करते हैं। यदि आप संपूर्ण गीता का अध्ययन कर रहे हैं, तो इसके बाद अगला अध्याय गीता अध्याय 18 श्लोक 1 से 10 की व्याख्या भी अवश्य पढ़ें। आइए, इन श्लोकों का सरल हिंदी अर्थ और विश्लेषण समझते हैं।

राजस और तामस दान का स्वरूप (श्लोक 21 - 22)

श्लोक 21

संस्कृत:
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥21॥

भावार्थ: जो दान क्लेशपूर्वक (बिना इच्छा के) तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से (बदले में कुछ पाने की आशा से) अथवा फल को दृष्टि में रखकर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।

विश्लेषण: राजसी दान वह है जहाँ व्यक्ति देने के बाद दुखी होता है या इस उम्मीद में देता है कि भविष्य में उसे इससे कोई सांसारिक या भौतिक लाभ प्राप्त होगा।

श्लोक 22

संस्कृत:
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥22॥

भावार्थ: जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र (अयोग्य व्यक्ति) को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

विश्लेषण: गलत समय, गलत स्थान और गलत व्यक्ति को अनादर या अपमान के साथ दिया गया दान पुण्य के बजाय पाप का कारण बनता है।

'ॐ तत्सत्' का अर्थ और महत्व (श्लोक 23 - 27)

श्लोक 23

संस्कृत:
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥23॥

भावार्थ: 'ॐ', 'तत्‌', 'सत्‌'—ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा गया है; उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण, वेद तथा यज्ञादि की रचना हुई है।

विश्लेषण: यह मन्त्र ईश्वर की संपूर्णता और दिव्यता को दर्शाता है। किसी भी शुभ कार्य की पूर्णता और शुद्धि के लिए इन महानामों का स्मरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

श्लोक 24

संस्कृत:
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥24॥

भावार्थ: इसलिए वेद मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।

विश्लेषण: 'ॐ' परमात्मा की उपस्थिति का प्रतीक है। किसी भी कर्म को आध्यात्मिक रूप देने के लिए उसे 'ॐ' के उच्चारण के साथ शुरू किया जाता है।

श्लोक 25

संस्कृत:
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥25॥

भावार्थ: 'तत्‌' अर्थात्‌ 'यह सब परमात्मा का ही है'—इस भाव से फल की इच्छा न रखकर मुमुक्षु पुरुषों द्वारा विविध प्रकार की यज्ञ, तप और दान रूप क्रियाएँ की जाती हैं।

विश्लेषण: 'तत्' शब्द कर्तापन के अहंकार को समाप्त करता है। यह याद दिलाता है कि फल की लालसा छोड़कर कर्म केवल ईश्वर के समर्पण भाव से करना चाहिए।

श्लोक 26

संस्कृत:
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणी तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥26॥

भावार्थ: 'सत्‌'—इस परमात्मा के नाम का प्रयोग सत्य भाव और श्रेष्ठ भाव में किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम और कल्याणकारी कर्म में भी 'सत्‌' शब्द का प्रयोग होता है।

विश्लेषण: जो कुछ भी शाश्वत, सत्य और मंगलकारी है, उसे 'सत्' कहा जाता है। यह कर्म की पवित्रता और शुभता को दर्शाता है।

श्लोक 27

संस्कृत:
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥27॥

भावार्थ: तथा यज्ञ, तप और दान में जो अचल स्थिति है, वह भी 'सत्‌' कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया गया कर्म निश्चय ही 'सत्‌' कहा जाता है।

विश्लेषण: यदि अनुष्ठान या कर्म में कोई त्रुटि रह जाए, तो 'सत्' भाव उसे परिपूर्ण कर देता है। भगवान के लिए की गई हर क्रिया 'सत्' (सत्य व पूर्ण) बन जाती है।

अश्रद्धा का दुष्परिणाम (श्लोक 28)

श्लोक 28

संस्कृत:
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥28॥

भावार्थ: हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा जो कुछ भी किया गया शुभ कर्म है—वह सब 'असत्‌' कहा जाता है; इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न ही परलोक में।

विश्लेषण: अध्याय 17 का यह अंतिम श्लोक स्पष्ट करता है कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी धार्मिक या शुभ कार्य व्यर्थ है। बाहरी आडंबर से फल नहीं मिलता, केवल अंतःकरण की शुद्ध श्रद्धा ही मुख्य है।

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