Geeta Adhyay 18 Shlok 1-10 in Hindi: संन्यास, त्याग और 3 प्रकार का त्याग

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) श्लोक 1 से 10 हिंदी अर्थ व व्याख्या

Gita Hindi Adhyay 18 Shlok 1-10 Shrimad Bhagavad Gita Chapter 18 Sannyasa and Tyaga Difference

"कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म के फल का त्याग ही असली संन्यास है।"

Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के अंतिम एवं 18वें अध्याय 'मोक्षसंन्यासयोग' के श्लोक 1 से 10 में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से 'संन्यास' और 'त्याग' के बीच का सूक्ष्म अंतर पूछते हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ सात्त्विक, राजसिक और तामसिक त्याग के विषय में विस्तार से बताते हैं। यदि आप संपूर्ण गीता का अध्ययन कर रहे हैं, तो इसके बाद गीता अध्याय 18 श्लोक 11 से 20 की व्याख्या भी अवश्य पढ़ें। आइए, इन श्लोकों का सरल हिंदी अर्थ और आध्यात्मिक विश्लेषण समझते हैं।

संन्यास और त्याग का अंतर (श्लोक 1 - 3)

श्लोक 1

संस्कृत:
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥1॥

भावार्थ: अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को अलग-अलग (विस्तार से) जानना चाहता हूँ।

विश्लेषण: अर्जुन यहाँ स्पष्टता चाहते हैं कि क्या संन्यास का अर्थ सब कुछ छोड़ देना है, या त्याग का अर्थ केवल फल की इच्छा छोड़ना है। वे इन दोनों शब्दों के सूक्ष्म अंतर को समझना चाहते हैं।

श्लोक 2

संस्कृत:
काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥2॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- कितने ही विद्वान तो 'काम्य कर्मों' (कामना वाले कर्मों) के स्वरूप से त्याग को संन्यास समझते हैं, जबकि अन्य विचारकुशल पुरुष सभी कर्मों के 'फल' के त्याग को त्याग कहते हैं।

विश्लेषण: भगवान दो मत बताते हैं—एक जो कहते हैं कि इच्छाओं से जुड़े काम छोड़ दो, और दूसरे जो कहते हैं कि काम तो करो पर उसके परिणाम (Result) का मोह छोड़ दो।

श्लोक 3

संस्कृत:
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥3॥

भावार्थ: कुछ विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्म मात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए उन्हें त्याग देना चाहिए; जबकि दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म कभी त्यागने योग्य नहीं हैं।

विश्लेषण: यहाँ बहस इस बात पर है कि क्या कर्म करने से बंधन होता है? कुछ इसे बुरा मानकर छोड़ने को कहते हैं, तो कुछ इसे शुद्धि का साधन मानते हैं।

श्रीकृष्ण का अंतिम निर्णय और त्याग के प्रकार (श्लोक 4 - 6)

श्लोक 4

संस्कृत:
निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥4॥

भावार्थ: हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! संन्यास और त्याग के विषय में तू अब मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है।

विश्लेषण: भगवान अब अपना अंतिम निर्णय देने जा रहे हैं। वे समझाते हैं कि 'त्याग' भी हर किसी का एक जैसा नहीं होता, वह व्यक्ति के गुणों पर निर्भर करता है।

श्लोक 5

संस्कृत:
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌॥5॥

भावार्थ: यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं हैं, बल्कि वे तो अवश्य करने चाहिए; क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये तीनों ही बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।

विश्लेषण: भगवान स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए अच्छे कर्म (यज्ञ-दान-तप) कभी नहीं छोड़ने चाहिए, क्योंकि ये मन की सफाई के लिए जरूरी हैं।

श्लोक 6

संस्कृत:
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌॥6॥

भावार्थ: इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा अन्य सभी कर्तव्य कर्मों को 'आसक्ति' और 'फलों' का त्याग करके ही करना चाहिए—यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

विश्लेषण: यह गीता का सार है। काम मत छोड़ो, बल्कि काम के साथ जो "मेरा-तेरा" और "फल की चिंता" जुड़ी है, उसे छोड़ दो।

तामस, राजस और सात्त्विक त्याग की व्याख्या (श्लोक 7 - 10)

श्लोक 7

संस्कृत:
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥7॥

भावार्थ: नियत कर्म (जो जिम्मेदारी है) का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है।

विश्लेषण: अपनी जिम्मेदारियों से भागना या आलस्य के कारण काम न करना कोई महान त्याग नहीं है, बल्कि वह तामसिकता या मूर्खता है।

श्लोक 8

संस्कृत:
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌॥8॥

भावार्थ: जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है—ऐसा समझकर यदि कोई शरीर के कष्ट के डर से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को प्राप्त नहीं करता।

विश्लेषण: "काम करने में बड़ी मेहनत लगती है, शरीर दुखता है"—इस डर से काम छोड़ना राजसिक त्याग है। इसमें त्याग का कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता।

श्लोक 9

संस्कृत:
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन।
सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥9॥

भावार्थ: हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म "करना कर्तव्य है"—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।

विश्लेषण: जब आप कोई काम इसलिए करते हैं क्योंकि वह आपकी जिम्मेदारी है, और आप उसके परिणाम की चिंता नहीं करते, तो आप वास्तव में एक सात्त्विक त्यागी हैं।

श्लोक 10

संस्कृत:
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥10॥

भावार्थ: जो मनुष्य न तो अरुचिकर कर्म से द्वेष करता है और न ही सुखद कर्म में आसक्त होता है—वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त, संशयरहित और बुद्धिमान पुरुष ही सच्चा त्यागी है।

विश्लेषण: सच्चा त्यागी वह है जिसके लिए काम छोटा या बड़ा, सुखद या दुखद नहीं होता। वह हर परिस्थिति में स्थिर रहकर अपना कर्तव्य निभाता है।

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