Geeta Adhyay 18 Shlok 11-20 in Hindi: कर्म सिद्धि के 5 कारण और सात्त्विक ज्ञान

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) श्लोक 11 से 20 हिंदी अर्थ व व्याख्या

Gita Hindi Adhyay 18 Shlok 11-20 Shrimad Bhagavad Gita Chapter 18 Five Causes of Action and Sattvic Knowledge

"जब कर्म के पाँच कारण हैं, तो 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा अहंकार करना अज्ञानता है।"

Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के 18वें अध्याय 'मोक्षसंन्यासयोग' के श्लोक 11 से 20 में भगवान श्रीकृष्ण कर्मफल के त्याग, किसी भी कार्य की सिद्धि के 5 मुख्य कारणों और सात्त्विक ज्ञान के स्वरूप की व्याख्या करते हैं। इसके पिछले भाग को पढ़ने के लिए गीता अध्याय 18 श्लोक 1 से 10 की व्याख्या देखें, और इसके अगले भाग को समझने के लिए गीता अध्याय 18 श्लोक 21 से 30 की व्याख्या पढ़ सकते हैं। आइए, इन श्लोकों का सरल हिंदी अर्थ और आध्यात्मिक विश्लेषण समझते हैं।

कर्मफल का त्याग और कर्म-बंधन से मुक्ति (श्लोक 11 - 12)

श्लोक 11

संस्कृत:
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥11॥

भावार्थ: क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा पूरी तरह से सभी कर्मों का त्याग किया जाना संभव नहीं है, इसलिए जो कर्मों के फल का त्याग करता है, वास्तव में वही 'त्यागी' कहलाता है।

विश्लेषण: भगवान स्पष्ट करते हैं कि जब तक शरीर है, सांस लेना, खाना-पीना जैसे कर्म चलते रहेंगे। इसलिए कर्म छोड़ना समाधान नहीं है, कर्म के पीछे का लालच (फल) छोड़ना ही असली समाधान है।

श्लोक 12

संस्कृत:
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌॥12॥

भावार्थ: कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों को मरने के बाद अच्छा (इष्ट), बुरा (अनिष्ट) और मिला-जुला (मिश्र)—ऐसे तीन प्रकार के फल मिलते हैं, किंतु कर्मफल का त्याग करने वाले संन्यासियों को कर्मों का फल कभी नहीं भुगतना पड़ता।

विश्लेषण: जो फल की इच्छा रखते हैं, उन्हें अपने कर्मों के अनुसार स्वर्ग, नरक या पुनर्जन्म मिलता है। लेकिन जो ईश्वर को समर्पित होकर कर्म करते हैं, वे कर्म-बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

किसी भी कर्म की सिद्धि के 5 कारण (श्लोक 13 - 17)

श्लोक 13

संस्कृत:
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌॥13॥

भावार्थ: हे महाबाहो! समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य-शास्त्र में ये पाँच कारण बताए गए हैं, उन्हें तू मुझसे भलीभाँति जान।

विश्लेषण: भगवान यहाँ विज्ञान समझा रहे हैं कि कोई भी काम केवल हमारे चाहने से नहीं होता, उसके पीछे पाँच महत्वपूर्ण कारक काम करते हैं।

श्लोक 14

संस्कृत:
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥14॥

भावार्थ: किसी भी कर्म की सिद्धि में ये पाँच हेतु हैं: 1. अधिष्ठान (शरीर), 2. कर्ता (अहंकारयुक्त कर्ता), 3. करण (विभिन्न इन्द्रियाँ), 4. विविध चेष्टाएँ (प्रयत्न) और 5. दैव (ईश्वरीय विधान या प्रारब्ध)।

विश्लेषण: जब सफलता के पाँच कारण हैं, तो मनुष्य अकेले खुद को कर्ता मानकर अहंकार क्यों करता है? विशेषकर 'दैव' (पाँचवाँ कारण) हमारे हाथ में नहीं है।

श्लोक 15

संस्कृत:
शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥15॥

भावार्थ: मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से शास्त्र के अनुकूल या विपरीत जो भी कर्म शुरू करता है, उसके ये पाँचों ही कारण होते हैं।

श्लोक 16

संस्कृत:
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥16॥

भावार्थ: ऐसा होने पर भी, जो मनुष्य अपनी अशुद्ध बुद्धि के कारण केवल अपनी आत्मा को ही कर्ता समझता है, वह अज्ञानी सत्य को नहीं देख पाता।

विश्लेषण: आत्मा साक्षी है, वह कुछ नहीं करती। शरीर और इन्द्रियाँ पाँच कारणों के अधीन काम करती हैं। जो कहता है "मैंने किया", वह भ्रम में है।

श्लोक 17

संस्कृत:
यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥17॥

भावार्थ: जिस मनुष्य के भीतर 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा अहंकार भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि संसार के पदार्थों में लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न ही पाप से बँधता है।

विश्लेषण: यह श्लोक अर्जुन के युद्ध सम्बन्धी संशय का अंतिम उत्तर है। यदि कर्म निष्काम भाव और अहंकार रहित होकर किया जाए, तो उसका पाप नहीं लगता।

कर्म-प्रेरणा, कर्म-संग्रह और सात्त्विक ज्ञान (श्लोक 18 - 20)

श्लोक 18

संस्कृत:
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥18॥

भावार्थ: ज्ञाता (जानने वाला), ज्ञान (जानने की क्रिया) और ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु)—ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं। तथा कर्ता, करण और क्रिया—ये तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है।

श्लोक 19

संस्कृत:
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि॥19॥

भावार्थ: सांख्य शास्त्र के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता भी गुणों (सत्त्व, रज, तम) के भेद से तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं। अब तू उन्हें भी मुझसे सुन।

श्लोक 20

संस्कृत:
सर्वभूतैषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥20॥

भावार्थ: जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य अलग-अलग दिखने वाले सभी प्राणियों में एक ही अविनाशी परमात्मा को समभाव से देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक ज्ञान जान।

विश्लेषण: सच्चा ज्ञान वह है जो हमें 'अनेकता में एकता' दिखाए। जब हम हर जीव में ईश्वर को देखते हैं, तभी हम सात्त्विक ज्ञान को प्राप्त होते हैं।

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