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| "कार्य के सिद्ध होने या न होने पर जो स्थिर रहे, वही श्रेष्ठ कर्ता है।" |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 18 (श्लोक 21-30)
श्लोक 21
संस्कृत: पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥
भावार्थ: किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग (भेदभाव से) जानता है, उस ज्ञान को तू राजस ज्ञान जान।
विश्लेषण: राजसी ज्ञान मनुष्य को एकता के बजाय अनेकता दिखाता है। ऐसा व्यक्ति लोगों को ऊँच-नीच, जाति, रंग या शरीर के आधार पर अलग-अलग मानता है।
श्लोक 22
संस्कृत: यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम् ॥
भावार्थ: परन्तु जो ज्ञान एक तुच्छ कार्य (जैसे केवल इस नाशवान शरीर) में ही पूर्ण के समान आसक्त है, जो बिना तर्क वाला, वास्तविक सत्य से रहित और संकुचित है—वह तामस ज्ञान कहा गया है।
विश्लेषण: तामसी ज्ञान अत्यंत अंधकारमय होता है। इसमें व्यक्ति एक छोटी सी चीज या केवल अपने शरीर को ही सब कुछ मान लेता है और सत्य की खोज नहीं करता।
श्लोक 23
संस्कृत: नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥
भावार्थ: जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ हो, कर्तापन के अभिमान से रहित हो और फल की इच्छा न रखने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो—वह सात्त्विक कर्म कहा जाता है।
विश्लेषण: सात्त्विक कर्म वह है जो बिना किसी निजी स्वार्थ या बदले की भावना के, केवल अपना कर्तव्य समझकर शांति से किया जाता है।
श्लोक 24
संस्कृत: यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥
भावार्थ: परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से भरा होता है तथा भोगों को चाहने वाले या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कर्म कहा गया है।
विश्लेषण: राजसी कर्म में दिखावा और थका देने वाली मेहनत होती है क्योंकि वह 'फल' पाने की तीव्र इच्छा से किया जाता है।
श्लोक 25
संस्कृत: अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
भावार्थ: जो कर्म भविष्य के परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश शुरू किया जाता है, वह तामस कर्म कहलाता है।
विश्लेषण: बिना सोचे-समझे किया गया ऐसा काम जिससे दूसरों को दुख हो या खुद की शक्ति नष्ट हो, तामसी कर्म है।
श्लोक 26
संस्कृत: मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥
भावार्थ: जो कर्ता आसक्ति से रहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सफल होने या न होने पर भी हर्ष-शोक आदि विकारों से मुक्त है—वह सात्त्विक कर्ता है।
विश्लेषण: सात्त्विक कर्ता काम को पूरे जोश (उत्साह) से करता है, पर परिणाम जो भी हो, वह विचलित नहीं होता।
श्लोक 27
संस्कृत: रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥
भावार्थ: जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला, अशुद्ध आचरण वाला और जीत-हार में हर्ष-शोक से लिप्त रहने वाला है—वह राजस कर्ता है।
विश्लेषण: राजसी कर्ता का मूड उसके काम के नतीजे पर टिका होता है। लाभ होने पर वह आसमान पर होता है और हानि होने पर गहरे दुख में डूब जाता है।
श्लोक 28
संस्कृत: आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥
भावार्थ: जो कर्ता चंचल, असभ्य, घमंडी, धूर्त, दूसरों की जीविका नष्ट करने वाला, दुखी रहने वाला, आलसी और काम को टालने वाला (दीर्घसूत्री) है—वह तामस कर्ता कहलाता है।
विश्लेषण: तामसी कर्ता आज का काम कल पर टालता है और मेहनत करने के बजाय छल-कपट से काम निकालना चाहता है।
श्लोक 29
संस्कृत: बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥
भावार्थ: हे धनंजय! अब तू बुद्धि का और धृति (धैर्य/धारण शक्ति) का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा विस्तारपूर्वक सुन।
श्लोक 30
संस्कृत: प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
भावार्थ: हे पार्थ! जो बुद्धि यह जानती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं, तथा क्या बंधन है और क्या मोक्ष—वह बुद्धि सात्त्विकी है।
विश्लेषण: सात्त्विक बुद्धि 'सही' और 'गलत' के बीच का स्पष्ट अंतर जानती है। यह हमें जीवन में सही निर्णय लेने की शक्ति देती है।

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