अध्याय 7 श्लोक 11 - 20 | आत्मसंयमयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

चार भक्त (एक दुखी, एक जिज्ञासु, एक धन की इच्छा रखने वाला और एक शांत ज्ञानी) भगवान की शरण में।
जो केवल मेरी शरण में आते हैं, वही इस अत्यंत कठिन माया को पार कर पाते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 7 (श्लोक 11-20)

श्लोक 11

संस्कृत: बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌ । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥

भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल (सामर्थ्य) हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल (शास्त्रसम्मत) काम हूँ।

विश्लेषण: भगवान कहते हैं कि वह शक्ति जो दूसरों की रक्षा के लिए इस्तेमाल हो, वह मेरा रूप है। साथ ही, वह इच्छा (काम) जो मर्यादा के भीतर और धर्म के अनुकूल हो, वह भी परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है।


श्लोक 12

संस्कृत: ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥

भावार्थ: और जो भी सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं, उन सबको तुम 'मुझसे ही होने वाले' जानो, परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं।

विश्लेषण: सृष्टि के सभी मानसिक भाव (शांति, चंचलता, आलस्य) भगवान से ही आते हैं, लेकिन भगवान इन गुणों के अधीन नहीं हैं। वे इनसे परे (Independent) हैं, जबकि ये गुण उन पर आश्रित हैं।


श्लोक 13

संस्कृत: त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्‌ । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्‌ ॥

भावार्थ: गुणों के कार्य रूप इन तीनों प्रकार के भावों (सत्त्व, रज, तम) से यह सारा संसार मोहित हो रहा है, इसीलिए यह प्राणिसमुदाय इन गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।

विश्लेषण: दुनिया रंग-बिरंगी माया (तीन गुणों) के खेल में इतनी उलझी हुई है कि वह उस 'खिलाड़ी' (परमात्मा) को नहीं देख पाती जो इन सबके पीछे है।


श्लोक 14

संस्कृत: दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

भावार्थ: क्योंकि यह अलौकिक त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर (पार करने में कठिन) है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझे ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

विश्लेषण (माया से मुक्ति का सूत्र): माया भगवान की शक्ति है, इसलिए इसे कोई अपने दम पर पार नहीं कर सकता। इसे पार करने का एकमात्र तरीका है—भगवान की शरण में जाना। 'शरण' ही वह चाबी है जो माया का ताला खोलती है।


श्लोक 15

संस्कृत: न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥

भावार्थ: माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुरी स्वभाव वाले, नीच और दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझे नहीं भजते।

विश्लेषण: अहंकार और बुरे कर्मों में डूबे लोग सत्य को देख नहीं पाते क्योंकि माया ने उनकी विवेक-शक्ति को ढँक दिया होता है।


श्लोक 16

संस्कृत: चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले चार प्रकार के भक्त मुझे भजते हैं: 1. आर्त (दुखिया), 2. जिज्ञासु (जानने का इच्छुक), 3. अर्थार्थी (सुख-सुविधा चाहने वाला) और 4. ज्ञानी

विश्लेषण: भगवान उदार हैं, वे हर उस व्यक्ति को स्वीकार करते हैं जो किसी भी कारण से उन्हें याद करता है—चाहे वह दुख में हो, लालच में हो, या सत्य की खोज में।


श्लोक 17

संस्कृत: तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥

भावार्थ: उनमें नित्य मुझमें स्थित, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यंत प्रिय है।

विश्लेषण: ज्ञानी भक्त भगवान से कुछ 'माँगता' नहीं, वह केवल भगवान को ही चाहता है। इस निष्काम प्रेम के कारण ही वह भगवान का सबसे प्रिय होता है।


श्लोक 18

संस्कृत: उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌ । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्‌ ॥

भावार्थ: ये सभी भक्त उदार (अच्छे) हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है—ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह मुझमें ही एकाग्र मन से स्थित रहता है।

विश्लेषण: भगवान अन्य तीन प्रकार के भक्तों को भी कम नहीं आंकते, लेकिन ज्ञानी को 'अपनी आत्मा' कहते हैं क्योंकि ज्ञानी और भगवान के बीच कोई पर्दा नहीं रह जाता।


श्लोक 19

संस्कृत: बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥

भावार्थ: बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष 'सब कुछ वासुदेव ही है'—ऐसा मानकर मुझे भजता है, वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।

विश्लेषण: 'वासुदेवः सर्वमिति'—यह गीता का परम सत्य है। हर कण में ईश्वर को देख लेना ही ज्ञान की पराकाष्ठा है। ऐसे महापुरुष संसार में बहुत कम होते हैं।


श्लोक 20

संस्कृत: कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥

भावार्थ: अपनी-अपनी कामनाओं के कारण जिनका ज्ञान नष्ट हो चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।

विश्लेषण: जब इंसान इच्छाओं (पैसे, पद, शक्ति) का गुलाम हो जाता है, तो वह मूल परमात्मा को भूलकर छोटे-छोटे फायदों के लिए इधर-उधर भटकने लगता है।

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  • ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण: भक्ति और श्रद्धा का मार्ग।
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