अध्याय 9 श्लोक 11 - 20 | राजविद्याराजगुह्ययोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

भगवान श्रीकृष्ण के पीछे सूर्य, वर्षा और वेदों का प्रतीक, और भक्त उनकी उपासना करते हुए।
मैं ही सूर्य की गर्मी हूँ और मैं ही वर्षा का जल; जीवन और मृत्यु दोनों मुझमें ही हैं।


श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 9 (श्लोक 11-20)

श्लोक 11

संस्कृत: अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌ ॥

भावार्थ: मेरे परम भाव को न जानने वाले मूढ़ लोग, मनुष्य शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझते हैं। वे मुझे केवल एक साधारण मनुष्य मानते हैं।

विश्लेषण: भगवान जब अवतार लेते हैं, तो अज्ञानी लोग उन्हें केवल हाड़-मांस का इंसान समझते हैं। वे उस अनंत शक्ति को नहीं देख पाते जो उस शरीर के भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड को चला रही है।


श्लोक 12

संस्कृत: मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥

भावार्थ: वे अज्ञानी जन व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले होते हैं। वे राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं।

विश्लेषण: जो लोग ईश्वर को नकारते हैं, उनकी उम्मीदें और मेहनत अंत में बेकार (मोघ) चली जाती है क्योंकि उनका आधार गलत होता है। वे स्वार्थ, हिंसा और अहंकार के वश में रहते हैं।


श्लोक 13

संस्कृत: महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्‌ ॥

भावार्थ: परंतु हे कुंतीपुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझे सब भूतों का सनातन कारण और अविनाशी जानकर अनन्य मन से निरंतर भजते हैं।

विश्लेषण: महात्मा वे हैं जो इस दृश्य संसार के पीछे छिपे 'मूल कारण' (ईश्वर) को पहचान लेते हैं। उनका मन कहीं और नहीं भटकता, वे केवल परमात्मा में ही टिके रहते हैं।


श्लोक 14

संस्कृत: सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥

भावार्थ: वे दृढ़ निश्चय वाले भक्त निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए, मुझे प्राप्त करने का यत्न करते हुए और मुझे बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरी उपासना करते हैं।

विश्लेषण (भक्ति के लक्षण): सच्चे भक्त सक्रिय होते हैं। वे केवल बैठकर सोचते नहीं, बल्कि कीर्तन, सेवा और निरंतर अभ्यास के माध्यम से भगवान से जुड़े रहते हैं।


श्लोक 15

संस्कृत: ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।

भावार्थ: कुछ ज्ञानयोगी मुझे 'एक' (अभिन्न) मानकर ज्ञानयज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं और कुछ लोग मुझे विराट स्वरूप मानकर अलग-अलग रूपों में पूजते हैं।

विश्लेषण: भगवान तक पहुँचने के कई रास्ते हैं। कोई उन्हें निराकार ब्रह्म मानता है, तो कोई उन्हें पूरी सृष्टि (विराट रूप) के रूप में देखता है। भगवान हर प्रकार की सच्ची खोज को स्वीकार करते हैं।


श्लोक 16

संस्कृत: अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ । मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ॥

भावार्थ: क्रतु (वैदिक यज्ञ) मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, पितरों को दिया जाने वाला अन्न (स्वधा) मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घी मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन की क्रिया भी मैं ही हूँ।

विश्लेषण: पूजा की हर सामग्री और क्रिया परमात्मा का ही विस्तार है। जब हम आहुति देते हैं, तो वह 'ईश्वर को ईश्वर के द्वारा ईश्वर में' ही अर्पित करना है।


श्लोक 17

संस्कृत: पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥

भावार्थ: इस जगत का पिता, माता, धारण करने वाला, पितामह (दादा), जानने योग्य तत्व, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।

विश्लेषण: संसार के सभी संबंध और ज्ञान का स्रोत परमात्मा ही है। वे ही सृष्टि के बीज हैं और वे ही उस ज्ञान के आधार हैं जो वेदों में वर्णित है।


श्लोक 18

संस्कृत: गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥

भावार्थ: परम लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, निवासस्थान, शरण, बिना स्वार्थ के हित करने वाला मित्र, उत्पत्ति-प्रलय, आधार और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

विश्लेषण: यह श्लोक भगवान के साथ हमारे हर संभव रिश्ते को दर्शाता है। वे न केवल हमारे जज (साक्षी) हैं, बल्कि सबसे अच्छे मित्र (सुहृत्) भी हैं।


श्लोक 19

संस्कृत: तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥

भावार्थ: मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत हूँ और मृत्यु भी, तथा सत् (जो है) और असत् (जो नहीं है) भी मैं ही हूँ।

विश्लेषण: प्रकृति की हर घटना के पीछे ईश्वरीय शक्ति है। जीवन और मृत्यु, दोनों उन्हीं के दो पहलू हैं। पूरी वास्तविकता परमात्मा के भीतर ही समाहित है।


श्लोक 20

संस्कृत: त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ॥

भावार्थ: तीनों वेदों को जानने वाले और सोम रस पीने वाले जो पापरहित पुरुष यज्ञों के द्वारा मुझे पूजकर स्वर्ग चाहते हैं, वे इंद्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग के दिव्य भोगों को भोगते हैं।

विश्लेषण: भगवान उन लोगों के बारे में बता रहे हैं जो पुण्य तो करते हैं पर उनका लक्ष्य मोक्ष नहीं बल्कि 'स्वर्ग के सुख' है। उन्हें वह सुख मिलता तो है, पर वह अस्थायी होता है।

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