श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 (11-20): ध्यान योग की विधि और संतुलित जीवन का रहस्य

एक योगी सीधे बैठकर, नासिका के अग्रभाग पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, शांत वातावरण में दीपक की लौ की तरह स्थिर।
योग अति का नहीं, संतुलन का मार्ग है—न अधिक भोजन, न अधिक नींद।

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 6 (श्लोक 11-20)

श्लोक 11

संस्कृत: शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌ ॥

भावार्थ: शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके।

विश्लेषण: ध्यान के लिए 'स्थान' और 'आसन' का महत्व बताया गया है। स्थान शुद्ध और शांत होना चाहिए। आसन ऐसा हो जो न बहुत आरामदायक हो और न बहुत कठोर, ताकि शरीर स्थिर रह सके।


श्लोक 12

संस्कृत: तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥

भावार्थ: उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

विश्लेषण: ध्यान का प्राथमिक उद्देश्य 'आत्म-विशुद्धि' (Self-purification) है। इन्द्रियों की भाग-दौड़ को रोककर मन को एक बिंदु पर लाना ही योग का अभ्यास है।


श्लोक 13

संस्कृत: समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌ ॥

भावार्थ: काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ।

विश्लेषण: यह ध्यान की मुद्रा (Posture) है। रीढ़ की हड्डी, गला और सिर एक सीध में होने चाहिए। दृष्टि को नाक के अग्रभाग पर टिकाने से आँखों की चंचलता रुकती है और एकाग्रता बढ़ती है।


श्लोक 14

संस्कृत: प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥

भावार्थ: ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए।

विश्लेषण: मानसिक तैयारी—मन शांत और निर्भय होना चाहिए। योगी का लक्ष्य केवल परमात्मा (कृष्ण) होना चाहिए। जब मन ईश्वर में लीन होता है, तभी वह वास्तव में स्थिर होता है।


श्लोक 15

संस्कृत: युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥

भावार्थ: वश में किए हुए मन वाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: निरंतर अभ्यास का फल—परम शांति। यह शांति संसार की वस्तुओं से नहीं, बल्कि परमात्मा में विलीन होने से मिलती है।


श्लोक 16

संस्कृत: नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।

विश्लेषण (संतुलन का सिद्धांत): योग अति (Extremes) का मार्ग नहीं है। जो बहुत खाता है या भूखा रहता है, जो बहुत सोता है या सोता ही नहीं, वह कभी ध्यान नहीं कर सकता।


श्लोक 17

संस्कृत: युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

भावार्थ: दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।

विश्लेषण: 'युक्त' यानी संतुलित। सही खान-पान, सही मनोरंजन, सही काम और सही नींद—जिसका जीवन अनुशासित है, योग उसके सभी दुखों को हर लेता है।


श्लोक 18

संस्कृत: यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥

भावार्थ: अत्यंत वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में संपूर्ण भोगों से इच्छारहित पुरुष योगयुक्त कहा जाता है।

विश्लेषण: योग की सफलता की पहचान यह है कि मन अब बाहरी सुखों के लिए नहीं तरसता। वह अपने भीतर ही तृप्त हो जाता है।


श्लोक 19

संस्कृत: यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

भावार्थ: जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक की लौ चलायमान नहीं होती, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है।

विश्लेषण (महान उपमा): जैसे बिना हवा के दीपक की लौ स्थिर रहती है, वैसे ही विचाररहित मन परमात्मा में अडिग रहता है। यह एकाग्रता की उच्चतम अवस्था है।


श्लोक 20

संस्कृत: यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥

भावार्थ: योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में शांत हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ परमात्मा में ही संतुष्ट रहता है।

विश्लेषण: ध्यान की सिद्धि—जब मन पूरी तरह स्थिर हो जाए और साधक को अपने भीतर ही ईश्वर के दर्शन होने लगें, तब वह संसार के किसी भी अन्य सुख की इच्छा नहीं करता।

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