Geeta Adhyay 17 Shlok 11-20 in Hindi: तीन प्रकार के यज्ञ, तप और दान

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग) श्लोक 11 से 20 हिंदी अर्थ व व्याख्या

Gita Hindi Adhyay 17 Shlok 11-20 Yajna Tapas Dana Shrimad Bhagavad Gita Chapter 17

"कर्तव्य भाव से और बिना फल की इच्छा के किया गया कर्म ही सात्त्विक है।"

Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के 17वें अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के श्लोक 11 से 20 में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के आधार पर यज्ञ, तप (शरीर, वाणी, मन) और दान के भेद समझाते हैं। यदि आप संपूर्ण गीता का अध्ययन कर रहे हैं, तो इसके बाद गीता अध्याय 17 श्लोक 21 से 28 की व्याख्या (ॐ तत्सत्) भी अवश्य पढ़ें। आइए, इन श्लोकों का सरल हिंदी अर्थ और आध्यात्मिक विश्लेषण समझते हैं।

यज्ञ के तीन प्रकार (श्लोक 11 - 13)

श्लोक 11

संस्कृत:
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥11॥

भावार्थ: जो यज्ञ शास्त्र विधि से नियत है और "यज्ञ करना ही कर्तव्य है"—इस प्रकार मन को स्थिर करके, फल की इच्छा न रखने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है।

विश्लेषण: सात्त्विक कर्म वह है जिसमें कोई स्वार्थ नहीं होता। व्यक्ति इसे केवल अपना धर्म और कर्तव्य मानकर पूर्ण श्रद्धा से करता है।

श्लोक 12

संस्कृत:
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌॥12॥

भावार्थ: परन्तु हे अर्जुन! जो यज्ञ केवल दिखावे (पाखंड) के लिए अथवा फल को दृष्टि में रखकर (किसी स्वार्थ से) किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस यज्ञ जान।

विश्लेषण: राजसी यज्ञ का मुख्य उद्देश्य प्रसिद्धि प्राप्त करना या बदले में कुछ भौतिक लाभ पाना होता है। इसमें भक्ति कम और प्रदर्शन अधिक होता है।

श्लोक 13

संस्कृत:
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥13॥

भावार्थ: शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

विश्लेषण: तामसी यज्ञ में नियमों और श्रद्धा का पूरी तरह अभाव होता है। यह केवल एक औपचारिकता या अंधविश्वास के कारण किया जाता है।

तीन प्रकार के तप: शरीर, वाणी और मन (श्लोक 14 - 16)

श्लोक 14

संस्कृत:
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥14॥

भावार्थ: देवता, ब्राह्मण, गुरु (माता-पिता और श्रेष्ठ जन) और ज्ञानियों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

विश्लेषण: शरीर को संयमित रखना और इसे शुभ कार्यों व सेवा में लगाना ही शारीरिक तपस्या है।

श्लोक 15

संस्कृत:
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते॥15॥

भावार्थ: जो वाणी उद्वेग पैदा न करने वाली, सत्य, प्रिय और हितकारी है तथा जो वेदों के पठन का और परमात्मा के नाम-जप का अभ्यास है—वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

विश्लेषण: अपनी बातों से किसी का दिल न दुखाना और सदैव सत्य व मीठा बोलना वाणी की सबसे बड़ी तपस्या है।

श्लोक 16

संस्कृत:
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥16॥

भावार्थ: मन की प्रसन्नता, शांत भाव, भगवच्चिन्तन का स्वभाव, मन का निग्रह (कंट्रोल) और अंतःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता—यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

विश्लेषण: विचारों को शुद्ध रखना और मन को व्यर्थ बातों से हटाकर शांति में स्थित करना मानसिक तपस्या है।

सात्त्विक, राजस और तामस तप के भेद (श्लोक 17 - 19)

श्लोक 17

संस्कृत:
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥17॥

भावार्थ: फल की इच्छा न करने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप (शरीर, वाणी और मन) को सात्त्विक तप कहते हैं।

विश्लेषण: जब तपस्या बिना किसी सांसारिक लालच के केवल ईश्वर के लिए की जाती है, तब वह सात्त्विक श्रेणी में आती है।

श्लोक 18

संस्कृत:
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌॥18॥

भावार्थ: जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए पाखंड से किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक फल वाला तप यहाँ राजस तप कहा गया है।

विश्लेषण: दूसरों को प्रभावित करने या अपना मान-सम्मान बढ़ाने के लिए की गई तपस्या राजसी है। इसका फल टिकाऊ नहीं होता।

श्लोक 19

संस्कृत:
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥19॥

भावार्थ: जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से, अपने शरीर और मन को पीड़ा देकर अथवा दूसरों का बुरा करने के लिए किया जाता है—वह तप तामस कहा गया है।

विश्लेषण: खुद को कष्ट पहुँचाना या किसी का अहित करने के उद्देश्य से किया गया तप तामसी श्रेणी में आता है।

सात्त्विक दान की परिभाषा (श्लोक 20)

श्लोक 20

संस्कृत:
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥20॥

भावार्थ: "दान देना ही कर्तव्य है"—ऐसे भाव से जो दान सही देश, काल और सुपात्र व्यक्ति को, बदले में उपकार की अपेक्षा किए बिना दिया जाता है, वह सात्त्विक दान है।

विश्लेषण: निस्वार्थ भाव से, सही समय पर, सही व्यक्ति की मदद करना ही वास्तविक सात्त्विक दान है।

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