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| कल्याण के मार्ग पर चलने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 6 (श्लोक 31-47)
श्लोक 31
संस्कृत: सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
भावार्थ: जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।
विश्लेषण: यह सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति है। योगी संसार के सारे काम करते हुए भी भीतर से भगवान से जुड़ा रहता है क्योंकि उसे हर इंसान और जीव में ईश्वर ही दिखाई देते हैं।
श्लोक 32
संस्कृत: आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
विश्लेषण: 'आत्मौपम्येन' का अर्थ है—जैसा मैं हूँ, वैसे ही सब हैं। जो दूसरों के सुख-दुख को अपने सुख-दुख की तरह महसूस करता है, वही सबसे बड़ा योगी है। यह सहानुभूति और करुणा की पराकाष्ठा है।
श्लोक 33
संस्कृत: योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
भावार्थ: अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ।
विश्लेषण: यहाँ अर्जुन अपनी व्यावहारिक कठिनाई बता रहे हैं। उन्हें लगता है कि समता का यह विचार सुनने में अच्छा है, पर चंचल मन के रहते इसे चौबीसों घंटे बनाए रखना असंभव है।
श्लोक 34
संस्कृत: चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
भावार्थ: क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।
विश्लेषण: अर्जुन हम सबकी समस्या रखते हैं। मन इतना ताकतवर है कि वह बुद्धि को भी मथ देता है। अर्जुन को लगता है कि हवा को मुट्ठी में कैद करना आसान है, पर मन को रोकना नामुमकिन।
श्लोक 35
संस्कृत: असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।
विश्लेषण (सफलता के दो सूत्र): श्रीकृष्ण अर्जुन की बात मानते हैं, पर समाधान भी देते हैं। 1. अभ्यास: बार-बार मन को वापस लाना। 2. वैराग्य: उन चीजों की व्यर्थता को समझना जिनके पीछे मन भाग रहा है।
श्लोक 36
संस्कृत: असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
भावार्थ: जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है।
विश्लेषण: बिना अनुशासन के योग केवल कल्पना है। जो व्यक्ति मन को ढीला छोड़ देता है, वह कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता, लेकिन प्रयास करने वालों के लिए यह संभव है।
श्लोक 37
संस्कृत: अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
भावार्थ: अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को प्राप्त न होकर किस गति को प्राप्त होता है।
विश्लेषण: अर्जुन का प्रश्न उन लोगों के लिए है जो आध्यात्मिक मार्ग पर चलना तो चाहते हैं पर बीच में भटक जाते हैं। उनका क्या भविष्य होता है?
श्लोक 38
संस्कृत: कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
भावार्थ: हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
विश्लेषण: अर्जुन का डर है कि कहीं ऐसा व्यक्ति 'त्रिशंकु' की तरह बीच में न लटक जाए—न उसे संसार के सुख मिले और न ही ईश्वर की प्राप्ति हुई।
श्लोक 39
संस्कृत: एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
भावार्थ: हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव नहीं है।
विश्लेषण: अर्जुन ने श्रीकृष्ण को पूर्ण गुरु के रूप में स्वीकार किया है, जो समय और जन्मों के पार देख सकते हैं।
श्लोक 40
संस्कृत: पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
विश्लेषण (महा-आश्वासन): श्रीकृष्ण कहते हैं कि अच्छी राह पर चला गया एक भी कदम बेकार नहीं जाता। ईश्वर के मार्ग पर मेहनत करने वाले की कभी हार नहीं होती।
श्लोक 41
संस्कृत: प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥
भावार्थ: योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान (धनवान) पुरुषों के घर में जन्म लेता है।
विश्लेषण: यदि साधना अधूरी रह जाए, तो व्यक्ति स्वर्ग के सुख भोगता है और फिर उसे ऐसे परिवार में जन्म मिलता है जहाँ उसकी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी हों और वह फिर से योग शुरू कर सके।
श्लोक 42
संस्कृत: अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥
भावार्थ: अथवा वैराग्यवान पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, सो संसार में निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है।
विश्लेषण: यह पिछले श्लोक से भी ऊँची स्थिति है। सीधे योगियों के घर जन्म लेना सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि वहाँ बचपन से ही आध्यात्मिक वातावरण मिलता है।
श्लोक 43
संस्कृत: तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
भावार्थ: वहाँ उसे पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को (संस्कारों को) अनायास ही प्राप्त हो जाता है और वह फिर परमात्मा की प्राप्ति के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है।
विश्लेषण: हमारी आध्यात्मिक उन्नति कभी शून्य नहीं होती। हम जहाँ इस जन्म में छोड़ते हैं, अगले जन्म में वहीं से शुरू करते हैं।
श्लोक 44
संस्कृत: पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
भावार्थ: वह पिछले अभ्यास के कारण न चाहते हुए भी भगवान की ओर आकर्षित होता है। योग का केवल जिज्ञासु भी वेदों के सकाम कर्मों के फल को पार कर जाता है।
विश्लेषण: पिछले जन्मों के संस्कार इतने शक्तिशाली होते हैं कि वे व्यक्ति को स्वतः ही अध्यात्म की ओर खींच लेते हैं।
श्लोक 45
संस्कृत: प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥
भावार्थ: परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कार बल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है।
विश्लेषण: अनेक जन्मों की मेहनत मिलकर अंततः एक जन्म में पूर्णता (सिद्धि) प्रदान करती है।
श्लोक 46
संस्कृत: तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥
भावार्थ: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तू योगी हो।
विश्लेषण: श्रीकृष्ण यहाँ योग (परमात्मा से जुड़ाव) को केवल तपस्या या किताबी ज्ञान से ऊपर बताते हैं।
श्लोक 47
संस्कृत: योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
भावार्थ: सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
विश्लेषण (अध्याय का निष्कर्ष): सर्वोच्च योगी वह है जिसका हृदय भगवान के प्रति प्रेम और अटूट श्रद्धा से भरा है।
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