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| ज्ञानी सबमें एक ही परमात्मा को देखता है, चाहे वह विद्यावान ब्राह्मण हो या कोई पशु। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 5 (श्लोक 11-20)
श्लोक 11
संस्कृत: कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥
भावार्थ: कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
विश्लेषण: योग का उद्देश्य 'स्वयं की शुद्धि' है। कर्मयोगी शरीर और मन से तो काम करता है, लेकिन हृदय में यह भाव रखता है कि "मैं इसका मालिक नहीं हूँ।" यह अनासक्ति ही मन के मैल को साफ करती है।
श्लोक 12
संस्कृत: युक्तः कर्मफलत्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥
भावार्थ: कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है।
विश्लेषण: शांति का सीधा संबंध 'अपेक्षा' से है। जो फल की चिंता छोड़ देता है (युक्त), उसे परम शांति मिलती है। जो इच्छाओं के पीछे भागता है (अयुक्त), वह चिंताओं और बंधनों में फंस जाता है।
श्लोक 13
संस्कृत: सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥
भावार्थ: अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नौ द्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।
विश्लेषण: 'नौ द्वारों वाला नगर' यह मानव शरीर है। ज्ञानी जानता है कि आत्मा इस शरीर में केवल एक 'किरायेदार' की तरह है। वह शरीर की क्रियाओं का कर्ता नहीं बनता, इसलिए वह परम आनंद में रहता है।
श्लोक 14
संस्कृत: न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥
भावार्थ: परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है।
विश्लेषण: परमात्मा किसी को आदेश नहीं देता कि यह करो या वह करो। सब कुछ हमारी अपनी प्रकृति और संस्कारों (स्वभाव) के कारण होता है। भगवान एक साक्षी की तरह हैं।
श्लोक 15
संस्कृत: नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥
भावार्थ: सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।
विश्लेषण: अक्सर हम सोचते हैं कि भगवान हमारे पाप-पुण्य का हिसाब रखते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे इन द्वंद्वों से परे हैं। दुख केवल इसलिए है क्योंकि हमारा ज्ञान 'अज्ञान' की परतों के नीचे दबा हुआ है।
श्लोक 16
संस्कृत: ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषां आदित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥
भावार्थ: परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस परमात्मा को प्रकाशित कर देता है।
विश्लेषण: जैसे सूरज निकलते ही अंधेरा गायब हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होते ही अज्ञान की सारी परतें हट जाती हैं और ईश्वर का सत्य स्वरूप स्पष्ट दिखने लगता है।
श्लोक 17
संस्कृत: तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥
भावार्थ: जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और परमात्मा में ही जिनकी निरंतर स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं।
विश्लेषण: जब बुद्धि, मन और निष्ठा—सब कुछ केवल एक परमात्मा में टिक जाते हैं, तो मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त (अपुनरावृत्ति) हो जाता है।
श्लोक 18
संस्कृत: विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
भावार्थ: वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।
विश्लेषण: यह श्लोक 'आध्यात्मिक समानता' का प्रमाण है। एक ज्ञानी व्यक्ति बाहरी शरीर या सामाजिक स्थिति नहीं देखता; वह सबमें एक ही परमात्मा को देखता है। उसके लिए चींटी और हाथी का मूल्य समान है।
श्लोक 19
संस्कृत: इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
भावार्थ: जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे परमात्मा में ही स्थित हैं।
विश्लेषण: संसार जीतने का अर्थ है 'द्वंद्वों को जीतना'। जिसने मन को सम (Equal) कर लिया, उसने जीवन रहते ही मोक्ष पा लिया, क्योंकि समानता ही परमात्मा का असली स्वभाव है।
श्लोक 20
संस्कृत: न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥
भावार्थ: जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष परमात्मा में नित्य स्थित है।
विश्लेषण: मानसिक मजबूती का लक्षण—अच्छी खबर पर बहुत ज्यादा न उचकना और बुरी खबर पर टूटना नहीं। जो इन दोनों स्थितियों में स्थिर रहता है, वही वास्तव में ईश्वर के निकट है।
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