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| इच्छा और द्वेष के द्वंद्व से मुक्त होकर ही मनुष्य मुझे पा सकता है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 7 (श्लोक 21-30)
श्लोक 21
संस्कृत: यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
भावार्थ: जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ।
विश्लेषण: भगवान यहाँ अपनी उदारता दिखा रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी भी रूप में ईश्वर को पूजना चाहता है, तो परमात्मा स्वयं उसकी उस श्रद्धा को और मजबूत कर देते हैं, क्योंकि अंततः शक्ति का स्रोत वही हैं।
श्लोक 22
संस्कृत: स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
भावार्थ: वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से उन इच्छित भोगों को प्राप्त करता है, जो वास्तव में मेरे द्वारा ही विधान किए गए हैं।
विश्लेषण: देवताओं से जो फल मिलता है, वह भी वास्तव में सर्वोच्च परमात्मा (कृष्ण) की अनुमति से ही मिलता है। देवता केवल 'वितरक' (Distributors) हैं, 'दाता' (Creator) तो भगवान ही हैं।
श्लोक 23
संस्कृत: अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
भावार्थ: परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त अंत में मुझे ही प्राप्त होते हैं।
विश्लेषण: यहाँ 'अल्प बुद्धि' इसलिए कहा गया है क्योंकि लोग क्षणभंगुर सुख (स्वर्ग, धन) माँगते हैं। देवताओं की पूजा का फल भी देवताओं के लोक तक ही सीमित है, जबकि भगवान की भक्ति सीधे मोक्ष और कभी न खत्म होने वाला आनंद देती है।
श्लोक 24
संस्कृत: अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
भावार्थ: बुद्धिहीन पुरुष मेरे अविनाशी परम भाव को न जानते हुए, मुझ निराकार परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्म लेकर शरीर धारण करने वाला मानते हैं।
विश्लेषण: लोग समझते हैं कि भगवान केवल एक साधारण मनुष्य के रूप में जन्म लेते हैं। वे यह नहीं देख पाते कि वे जन्म-मृत्यु से परे अविनाशी सत्य हैं।
श्लोक 25
संस्कृत: नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
भावार्थ: अपनी 'योगमाया' से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी संसार मुझ जन्मरहित और अविनाशी को नहीं पहचान पाता।
विश्लेषण: जैसे बादल सूरज को ढँक लेते हैं, वैसे ही भगवान की अपनी माया उनके असली स्वरूप को सामान्य आँखों से छिपा लेती है। इसीलिए सब उन्हें नहीं पहचान पाते।
श्लोक 26
संस्कृत: वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! मैं भूतकाल, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई (श्रद्धाहीन) पुरुष नहीं जानता।
विश्लेषण: ईश्वर काल के पार हैं। उन्हें सब पता है कि कब क्या हुआ और क्या होगा, लेकिन हमारी सीमित बुद्धि उन्हें तब तक नहीं समझ सकती जब तक वह भक्ति से शुद्ध न हो जाए।
श्लोक 27
संस्कृत: इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानी सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! संसार में इच्छा (राग) और द्वेष से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःखादि द्वंद्वों के मोह से सभी प्राणी अत्यंत अज्ञानी हो रहे हैं।
विश्लेषण: मनुष्य क्यों भटकता है? क्योंकि वह 'मुझे यह चाहिए' (इच्छा) और 'मुझे यह नहीं चाहिए' (द्वेष) के चक्कर में फँसा रहता है। यही द्वंद्व (Dualities) हमें सत्य से दूर रखते हैं।
श्लोक 28
संस्कृत: येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहे विनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
भावार्थ: परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्यों के पाप नष्ट हो गए हैं, वे उस द्वंद्व रूपी मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मुझे भजते हैं।
विश्लेषण: जब कर्म शुद्ध होते हैं, तभी द्वंद्वों का पर्दा हटता है और मनुष्य पूरी निष्ठा के साथ परमात्मा की भक्ति कर पाता है।
श्लोक 29
संस्कृत: जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥
भावार्थ: जो मेरी शरण होकर बुढ़ापे और मृत्यु से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस 'ब्रह्म' को, सम्पूर्ण 'अध्यात्म' को और सम्पूर्ण 'कर्म' को जानते हैं।
विश्लेषण: भगवान की शरण में जाने का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति का वास्तविक प्रयास करना है। ऐसे साधक ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त करते हैं।
श्लोक 30
संस्कृत: साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥
भावार्थ: जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित मुझे जानते हैं, वे मृत्यु के समय भी मुझे ही जानते हुए मुझमें लीन हो जाते हैं।
विश्लेषण: मृत्यु के क्षण में मन जहाँ होता है, वैसी ही गति मिलती है। जो जीवन भर भगवान को हर रूप में देखता है, वह मरते समय भी ईश्वर में स्थित रहता है और मोक्ष पाता है।
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