भगवद्गीता अध्याय 5 (21-29): अक्षय आनंद की प्राप्ति और शांति का अंतिम सूत्र

एक शांत योगी भौंहों के बीच ध्यान केंद्रित करते हुए, आंतरिक ज्योति का अनुभव कर रहा है।
इन्द्रियों से मिलने वाले भोग अस्थायी और दुख के स्रोत हैं, सच्चा सुख केवल आत्मा के भीतर है।

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 5 (श्लोक 21-29)

श्लोक 21

संस्कृत: बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्‌ । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥

भावार्थ: बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है।

विश्लेषण: जब हम बाहरी सुखों (महँगी चीजें, स्वाद, प्रशंसा) पर निर्भरता छोड़ देते हैं, तब हमें अपने भीतर एक गहरे आनंद का पता चलता है। यह आनंद कभी खत्म नहीं होता, इसलिए इसे 'अक्षय' कहा गया है।


श्लोक 22

संस्कृत: ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥

भावार्थ: जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि वे सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।

विश्लेषण: श्रीकृष्ण एक कड़वा सच बताते हैं—इन्द्रियों के सुख 'दुख की योनि' (स्रोत) हैं। क्यों? क्योंकि वे शुरू होते हैं और खत्म हो जाते हैं। सुख के खत्म होने का डर और उसके बाद का खालीपन दुख लाता है। बुद्धिमान व्यक्ति अस्थायी सुख के पीछे नहीं भागता।


श्लोक 23

संस्कृत: शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌ । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

भावार्थ: जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है।

विश्लेषण: काम (इच्छा) और क्रोध (गुस्सा) बिजली के झटके या 'वेग' की तरह आते हैं। जो व्यक्ति मरने से पहले इन आवेगों को झेलना और शांत करना सीख जाता है, वही असली विजेता और सुखी इंसान है।


श्लोक 24

संस्कृत: योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥

भावार्थ: जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: यहाँ तीन शब्द महत्वपूर्ण हैं: अन्तःसुख (भीतर का सुख), अन्तराराम (भीतर का आराम), और अन्तर्ज्योति (भीतर का प्रकाश)। जिसकी खुशी बाहरी दुनिया की गुलाम नहीं है, वह परमात्मा से एक हो जाता है।


श्लोक 25

संस्कृत: लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥

भावार्थ: जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका मन परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

विश्लेषण: मोक्ष केवल खुद के लिए नहीं है। सच्चा ज्ञानी वह है जो 'सर्वभूतहिते रताः' (सबके भले में लगा हुआ) है। करुणा और ज्ञान मिलकर ही व्यक्ति को मुक्त करते हैं।


श्लोक 26

संस्कृत: कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌ । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌ ॥

भावार्थ: काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है।

विश्लेषण: ऐसे व्यक्ति के लिए दुनिया बदल जाती है। उसे हर तरफ, हर परिस्थिति में केवल परमात्मा की शांति का अनुभव होता है।


श्लोक 27-28

संस्कृत: स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥

भावार्थ: बाहर के विषयों का चिंतन न करते हुए, दृष्टि को भृकुटी (भौंहे) के बीच स्थित करके, प्राण-अपान वायु को सम करके, जिसने इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीत ली हैं—ऐसा मोक्षपरायण मुनि जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा मुक्त ही है।

विश्लेषण: यहाँ अगले अध्याय (अध्याय 6 - ध्यानयोग) की नींव रखी गई है। ध्यान की सरल विधि—विषयों को बाहर छोड़ना, आँखों को स्थिर करना और श्वासों पर नियंत्रण। जो मन को इस तरह साध लेता है, वह जीवित रहते हुए भी मुक्त है।


श्लोक 29

संस्कृत: भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌ । सुहृदं सर्वभूतनाम ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

भावार्थ: मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियों का निःस्वार्थ प्रेमी (सुहृद) जानकर परम शान्ति को प्राप्त होता है।

विश्लेषण (शांति का सूत्र): श्रीकृष्ण स्वयं को 'सुहृद' (Best Friend) कहते हैं। जब हम यह जान लेते हैं कि पूरी सृष्टि का मालिक हमारा सबसे बड़ा शुभचिंतक है, तो सारी चिंताएँ और तनाव खत्म हो जाते हैं।

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