अध्याय 11 श्लोक 12 - 20 | विश्वरूपदर्शनयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

हजारों सूर्यों के प्रकाश के बीच भगवान श्रीकृष्ण का विराट रूप और हाथ जोड़े खड़े विस्मित अर्जुन।
"आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने जैसा है परमात्मा का वह दिव्य प्रकाश।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 11 (श्लोक 12-20)

श्लोक 12

संस्कृत: दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥

भावार्थ: आकाश में एक साथ हजार सूर्यों के उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के बराबर शायद ही हो।

विश्लेषण: संजय उस अलौकिक दृश्य की कल्पना कर रहे हैं। भगवान का प्रकाश इतना प्रचंड है कि भौतिक सूर्य भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। यह अनंत चेतना के 'विस्फोट' जैसा अनुभव है।


श्लोक 13

संस्कृत: तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥

भावार्थ: उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अनेक प्रकार से विभाजित (अलग-अलग) सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण के उस शरीर में एक ही जगह स्थित देखा।

विश्लेषण: अर्जुन ने देखा कि पूरी गैलेक्सी, तारे, पृथ्वी और सभी लोक अलग-अलग होते हुए भी भगवान के एक ही शरीर के भीतर समाए हुए हैं। 'विविधता में एकता' का यह साक्षात् प्रमाण था।


श्लोक 14

संस्कृत: ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥

भावार्थ: उसके बाद आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर वाले अर्जुन ने उस प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा सहित सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।

विश्लेषण: अर्जुन की अवस्था 'हृष्टरोमा' (रोंगटे खड़े हो जाना) हो गई। जब आत्मा इतने विशाल सत्य का अनुभव करती है, तो शरीर और मन विस्मय (Awe) से भर जाते हैं।


श्लोक 15

संस्कृत: पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌ । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌ ॥

भावार्थ: अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवताओं को, प्राणियों के समूहों को, कमल के आसन पर बैठे ब्रह्मा को, महादेव (शिव) को, समस्त ऋषियों और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।

विश्लेषण: अर्जुन की दृष्टि अब दिव्य है। वे देख रहे हैं कि पूरी सृष्टि का 'मैनेजमेंट' (ब्रह्मा, शिव, ऋषि) कृष्ण के भीतर ही कार्य कर रहा है।


श्लोक 16

संस्कृत: अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌ । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥

भावार्थ: हे विश्वेश्वर! मैं आपको अनेक भुजाओं, पेट, मुख और नेत्रों वाले तथा सब ओर से अनंत रूपों वाला देख रहा हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न आदि को देखता हूँ, न मध्य को और न ही अंत को।

विश्लेषण: भगवान का वह रूप सीमाओं से परे है। अर्जुन जिधर भी दृष्टि डालते हैं, उन्हें भगवान का ही विस्तार दिखता है। जिसका न शुरू है न खत्म, वही 'अनंत' है।


श्लोक 17

संस्कृत: किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌ । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌ ॥

भावार्थ: मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए हुए, सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज के रूप में देख रहा हूँ। आप प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान ज्योति वाले हैं, जिन्हें देखना अत्यंत कठिन है।

विश्लेषण: भगवान के इस रूप में उनके ऐश्वर्य के प्रतीक (चक्र-गदा) भी हैं और उनकी असीमता भी। यह रूप 'दुर्निरीक्ष्यं' (देखने में अत्यंत कठिन) है क्योंकि इसकी चमक सहन करना साधारण क्षमता से बाहर है।


श्लोक 18

संस्कृत: त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥

भावार्थ: आप ही जानने योग्य 'परम अक्षर' (परब्रह्म) हैं। आप ही इस जगत के परम आधार हैं, आप ही सनातन धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं—ऐसा मेरा मत है।

विश्लेषण: साक्षात् दर्शन के बाद अर्जुन की बुद्धि में ज्ञान स्थिर हो जाता है। वे पहचान लेते हैं कि यही वह शक्ति है जो युगों-युगों से धर्म की रक्षा कर रही है।


श्लोक 19

संस्कृत: अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌ । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌ ॥

भावार्थ: आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत सामर्थ्य वाले, अनंत भुजाओं वाले तथा चंद्रमा और सूर्य रूपी नेत्रों वाले देख रहा हूँ। आपके मुख प्रज्वलित अग्नि के समान हैं और आप अपने तेज से इस जगत को तपा रहे हैं।

विश्लेषण: भगवान के नेत्रों को सूर्य और चंद्रमा कहा गया है, जो सृष्टि के प्रकाश के स्रोत हैं। उनकी अग्नि रुपी कांति अशुद्धियों को जला देने वाली है।


श्लोक 20

संस्कृत: द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌ ॥

भावार्थ: हे महात्मन्‌! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का पूरा आकाश और सभी दिशाएं केवल आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यंत व्याकुल (भयभीत) हो रहे हैं।

विश्लेषण: यहाँ पहली बार 'उग्रं' और 'प्रव्यथितं' शब्दों का प्रयोग हुआ है। भगवान का यह रूप केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि अत्यंत भयंकर भी है, जिसे देखकर ब्रह्मांड की शक्तियाँ भी काँप उठती हैं।

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