श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 (गुणत्रयविभागयोग) श्लोक 21 से 27 हिंदी अर्थ व व्याख्या
Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के 14वें अध्याय 'गुणत्रयविभागयोग' के अंतिम भाग (श्लोक 21 से 27) में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से एक परम ज्ञानी और गुणातीत पुरुष के लक्षण पूछ रहे हैं। उत्तर में भगवान बताते हैं कि प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से परे उठा हुआ व्यक्ति संसार के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखता है और कैसे केवल अनन्य भक्ति योग के माध्यम से इन तीनों गुणों के बंधनों को काटकर परम पद (ब्रह्म भाव) को प्राप्त किया जा सकता है।
गुणातीत पुरुष के लक्षण और आचरण (श्लोक 21 - 25)
श्लोक 21
संस्कृत:
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥21॥
भावार्थ: अर्जुन बोले—हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस उपाय से इन तीनों गुणों से पार होता है?
विश्लेषण: अर्जुन यहाँ एक आदर्श स्थितप्रज्ञ महापुरुष की पहचान पूछ रहे हैं। वे जानना चाहते हैं कि गुणों के प्रभाव से मुक्त होने के बाद साधक का आंतरिक भाव और सांसारिक व्यवहार कैसा हो जाता है।
श्लोक 22
संस्कृत:
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥22॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले—हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्य 'प्रकाश' को, रजोगुण के कार्य 'प्रवृत्ति' को और तमोगुण के कार्य 'मोह' को—इनके आने पर न तो द्वेष करता है और न इनके चले जाने पर इनकी इच्छा करता है।
विश्लेषण: गुणातीत व्यक्ति अपने मन की वृत्तियों (ज्ञान, चंचलता या आलस्य) का केवल साक्षी बन जाता है। वह इनके आने-जाने से विचलित न होकर केवल प्रकृति की क्रियाएँ मानता है।
श्लोक 23
संस्कृत:
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥23॥
भावार्थ: जो साक्षी के समान स्थित रहता है, जिसे गुण विचलित नहीं कर सकते और यह समझकर कि "गुण ही गुणों में बरत रहे हैं", जो परमात्मा में अचल स्थित रहता है और कभी डिगता नहीं—
विश्लेषण: 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' का अर्थ है कि शरीर और इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त हैं, किंतु आत्मा निष्क्रिय है। ऐसा ज्ञानी तटस्थ होकर आत्म-स्वरूप में टिका रहता है।
श्लोक 24
संस्कृत:
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥24॥
भावार्थ: जो निरंतर आत्म-भाव में स्थित है, सुख और दुःख को समान समझता है, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान दृष्टि रखता है, जो धैर्यवान है और जिसके लिए प्रिय-अप्रिय तथा अपनी निंदा और स्तुति एक समान हैं—
विश्लेषण: यह समत्व (Equanimity) की स्थिति है। जब साधक के लिए सोने और मिट्टी का मूल्य एक समान हो जाता है, तब वह समझ पाता है कि भौतिक संसार का आकर्षण निरर्थक है।
श्लोक 25
संस्कृत:
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते ॥25॥
भावार्थ: जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समभाव रखता है तथा जिसने सभी सकाम कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग कर दिया है, वह पुरुष 'गुणातीत' कहा जाता है।
विश्लेषण: ऐसा व्यक्ति अपने किसी कर्म का श्रेय स्वयं नहीं लेता, बल्कि ईश्वर को समर्पित करता है। उसके लिए संसार में कोई शत्रु या मित्र नहीं, सब परमात्मा का ही विस्तार है।
गुणों से पार पाने का उपाय: भक्ति योग और अध्याय समापन (श्लोक 26 - 27)
श्लोक 26
संस्कृत:
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥26॥
भावार्थ: और जो पुरुष अव्यभिचारी (अनन्य) भक्ति योग द्वारा निरंतर मेरा भजन-पूजन करता है, वह इन तीनों गुणों को भली-भाँति लाँघकर ब्रह्म भाव (मुक्ति) को प्राप्त करने के योग्य बन जाता है।
विश्लेषण: गुणों के प्रभाव को काटना स्वयं के प्रयास से कठिन है, परंतु ईश्वर की अनन्य भक्ति इसका सबसे सुगम मार्ग है। शरणागति से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और साधक सहज ही गुणातीत हो जाता है।
श्लोक 27
संस्कृत:
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥27॥
भावार्थ: क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का, अमृत का, नित्य शाश्वत धर्म का और अखंड एकरस परमानंद का अंतिम आश्रय (आधार) मैं ही हूँ।
विश्लेषण: अध्याय 14 के अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण अपनी सर्वोच्च सत्ता प्रकट करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जिस निराकार ब्रह्म, मोक्ष और परम शांति की खोज साधक करते हैं, उस सबका मूल आधार स्वयं वे ही हैं।
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