Geeta Adhyay 18 Shlok 41-50 in Hindi: वर्ण व्यवस्था, स्वधर्म और कर्मयोग
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) श्लोक 41 से 50 हिंदी अर्थ व व्याख्या …
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) श्लोक 41 से 50 हिंदी अर्थ व व्याख्या …
कर्मयोगी संसार में ऐसे रहता है जैसे जल में कमल का पत्ता श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 5 (श्लोक 1-10) श्लोक 1 संस्…
संशय अज्ञान की उपज है, इसे ज्ञान की तलवार से काटकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ें। श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 4 (श्लोक…
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सारा संसार वैसा ही करने लगता है। श्लोक 21 संस्कृत: यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्…
स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि लोक कल्याण (लोकसंग्रह) के लिए कर्म करना ही श्रेष्ठ मार्ग है। श्रीमद्भगवद्गीता - अ…
नियतं कुरु कर्म त्वं"—अपना निर्धारित कर्तव्य करना, कर्म न करने से कहीं श्रेष्ठ है। श्लोक 1 संस्कृत: ज्…
कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं"—भगवान श्रीकृष्ण का कालजयी संदेश। श्लोक 41 संस्कृत: व्यवसायात्म…
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