Gita Hindi Ch 13 (1-10): अध्याय 13 श्लोक 1-10 हिंदी अर्थ व व्याख्या | क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अंतर

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13 (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग) श्लोक 1 से 10 हिंदी अर्थ व व्याख्या

Geeta hindi Chapter 13 shlok 1-10

"यह शरीर केवल एक क्षेत्र है; असली ज्ञान उसे जानना है जो इसके भीतर निवास करता है।"

Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के 13वें अध्याय 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग' का प्रारंभ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा शरीर (प्रकृति) और आत्मा (पुरुष) के भेद को समझाने से होता है। इस भाग में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह शरीर 'क्षेत्र' (खेत) है और इसके भीतर की चेतन शक्ति 'क्षेत्रज्ञ' है। साथ ही, वे उन 20 आध्यात्मिक गुणों का वर्णन करते हैं जो मनुष्य को वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाते हैं। आइए, श्लोक 1 से 10 का सरल हिंदी भावार्थ और गहन विश्लेषण समझते हैं।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का स्वरूप (श्लोक 1 - 4)

श्लोक 1

संस्कृत:
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥1॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (खेत) कहलाता है और इसे जो जानता है, उसे तत्वज्ञानी 'क्षेत्रज्ञ' (खेत को जानने वाला) कहते हैं।

विश्लेषण: जैसे किसान खेत में बीज बोता है और फसल काटता है, वैसे ही यह शरीर एक खेत है जहाँ हम कर्मों के बीज बोते हैं और फल भोगते हैं। इस शरीर के भीतर जो 'जानने वाली' शक्ति (आत्मा) है, वही क्षेत्रज्ञ है।

श्लोक 2

संस्कृत:
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥2॥

भावार्थ: हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों (शरीरों) में क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो तत्व से ज्ञान है, वही वास्तविक 'ज्ञान' है—ऐसा मेरा मत है।

विश्लेषण: भगवान यहाँ एक गहरा रहस्य खोलते हैं। हर शरीर के भीतर बैठा जानने वाला अंश वास्तव में परमात्मा का ही स्वरूप है। शरीर और आत्मा के अंतर को पहचान लेना ही असली शिक्षा है।

श्लोक 3

संस्कृत:
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥3॥

भावार्थ: वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारों वाला है और जिससे पैदा हुआ है, तथा वह क्षेत्रज्ञ जो है और जिस प्रभाव वाला है—वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।

विश्लेषण: भगवान अब विस्तार से शरीर (प्रकृति) की बनावट और आत्मा (पुरुष) की शक्ति के बारे में बताने की भूमिका बना रहे हैं।

श्लोक 4

संस्कृत:
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥4॥

भावार्थ: इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के तत्व को ऋषियों ने बहुत प्रकार से गाया है, वेदों के मंत्रों ने विभागपूर्वक कहा है और तर्कपूर्ण ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी भलीभाँति निश्चित किया गया है।

विश्लेषण: भगवान स्पष्ट कर रहे हैं कि यह ज्ञान केवल वे ही नहीं दे रहे, बल्कि सनातन काल से ऋषियों और शास्त्रों ने भी इसी सत्य को प्रमाणित किया है।

शरीर (क्षेत्र) के 24 तत्त्व और विकार (श्लोक 5 - 6)

श्लोक 5

संस्कृत:
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥5॥

भावार्थ: पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति; तथा दस इंद्रियाँ (ज्ञान और कर्म), एक मन और पाँच इंद्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)—

विश्लेषण: यहाँ शरीर के 24 तत्वों का वर्णन है जिनसे यह 'क्षेत्र' बना है। यह हमारा भौतिक और मानसिक ढांचा है।

श्लोक 6

संस्कृत:
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌॥6॥

भावार्थ: तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर (पिंड), चेतना और धैर्य—इस प्रकार विकारों सहित यह 'क्षेत्र' संक्षेप में कहा गया।

विश्लेषण: मन के भाव (सुख-दुःख आदि) भी 'क्षेत्र' यानी शरीर का ही हिस्सा हैं। वे आत्मा के गुण नहीं हैं। आत्मा इन सब परिवर्तनों को केवल देखने वाली है।

आध्यात्मिक ज्ञान के 20 लक्षण (श्लोक 7 - 10)

श्लोक 7

संस्कृत:
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥7॥

भावार्थ: मान-बड़ाई का अभाव, दम्भ (पाखंड) का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता और मन-इंद्रियों का निग्रह (कंट्रोल)—

विश्लेषण: यहाँ से भगवान उन 20 गुणों का वर्णन कर रहे हैं जो मनुष्य को 'ज्ञान' की ओर ले जाते हैं। गुरु सेवा और आंतरिक पवित्रता इनमें प्रमुख हैं।

श्लोक 8

संस्कृत:
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌॥8॥

भावार्थ: इंद्रियों के भोगों में वैराग्य, अहंकार का अभाव और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोगों में दुःख व दोषों का बार-बार विचार करना।

विश्लेषण: ज्ञान तब आता है जब हम संसार की नश्वरता को पहचान लेते हैं। जीवन की कड़वी सच्चाइयों (बुढ़ापा, बीमारी) पर चिंतन करना हमें मोह से मुक्त करता है।

श्लोक 9

संस्कृत:
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥9॥

भावार्थ: पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का न होना, ममता का अभाव तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का समान रहना।

विश्लेषण: इसका अर्थ परिवार छोड़ना नहीं, बल्कि मोह छोड़ना है। जब मन लाभ और हानि में एक जैसा रहने लगता है, तब उसे 'समत्व' कहते हैं।

श्लोक 10

संस्कृत:
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥10॥

भावार्थ: मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अडिग (अव्यभिचारिणी) भक्ति, एकांत और शुद्ध स्थान में रहने का स्वभाव तथा विषयासक्त मनुष्यों की भीड़ में रुचि का न होना।

विश्लेषण: सच्चा ज्ञानी वह है जो एकांत में बैठकर स्वयं का और ईश्वर का चिंतन करता है और व्यर्थ की गपशप या भीड़भाड़ से दूर रहता है।

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