श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग) श्लोक 1 से 10 हिंदी अर्थ व व्याख्या
Gita Hindi (श्रीमद्भगवद्गीता) के 17वें अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के श्लोक 1 से 10 में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच श्रद्धा के स्वरूप और आहार के तीन प्रकारों पर गहन चर्चा होती है। श्रीकृष्ण यहाँ समझाते हैं कि मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व बन जाता है। यदि आप संपूर्ण अध्याय को समझना चाहते हैं, तो इसके बाद गीता अध्याय 17 श्लोक 11 से 20 की व्याख्या (यज्ञ, तप और दान) भी ज़रूर पढ़ें। आइए, इन श्लोकों का सरल हिंदी अर्थ और व्यावहारिक विश्लेषण समझते हैं।
तीन प्रकार की श्रद्धा का विचार (श्लोक 1 - 6)
श्लोक 1
संस्कृत:
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥1॥
भावार्थ: अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर (अनजाने में या आलस्यवश) अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजन करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? क्या वह सात्त्विकी है, राजसी है या तामसी?
विश्लेषण: अर्जुन का प्रश्न बहुत व्यावहारिक है। कई लोग शास्त्रों के जटिल नियमों को नहीं जानते, लेकिन उनके मन में भक्ति (श्रद्धा) होती है। अर्जुन पूछ रहे हैं कि ऐसे लोगों की गिनती किस श्रेणी में होगी?
श्लोक 2
संस्कृत:
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥2॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- मनुष्यों की वह बिना शास्त्रीय संस्कारों वाली, केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा तीन प्रकार की ही होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसके बारे में तू मुझसे सुन।
विश्लेषण: भगवान कहते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा उसके पिछले जन्मों के संस्कारों और वर्तमान स्वभाव से तय होती है। श्रद्धा होना ही काफी नहीं है, वह किस गुण से प्रभावित है, यह महत्वपूर्ण है।
श्लोक 3
संस्कृत:
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥3॥
भावार्थ: हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है, इसलिए जिस पुरुष की जैसी श्रद्धा है, वह स्वयं भी वैसा ही है।
विश्लेषण: यह मनोविज्ञान का गहरा सूत्र है। जैसा हमारा विश्वास होगा, वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। हम अपनी श्रद्धा के ही प्रतिबिंब (Mirror Image) हैं।
श्लोक 4
संस्कृत:
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥4॥
भावार्थ: सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को, तथा जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भूतगणों को पूजते हैं।
विश्लेषण: हमारी श्रद्धा हमें अपनी ओर आकर्षित करती है। सात्त्विक मन पवित्र शक्तियों की ओर जाता है, राजस मन शक्ति और धन की ओर, और तामस मन अंधकारमय शक्तियों की ओर।
श्लोक 5
संस्कृत:
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥5॥
भावार्थ: जो मनुष्य शास्त्र की विधि से रहित, केवल मनचाहा घोर तप करते हैं और जो पाखंड, अहंकार, कामना तथा आसक्ति के नशे में चूर हैं—
विश्लेषण: भगवान उन लोगों की निंदा कर रहे हैं जो शरीर को कष्ट देना ही धर्म समझते हैं, जबकि उनका उद्देश्य केवल अपना अहंकार बढ़ाना होता है।
श्लोक 6
संस्कृत:
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥6॥
भावार्थ: जो शरीर के अंगों को और अंतःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कष्ट देने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान।
विश्लेषण: शरीर परमात्मा का मंदिर है। व्यर्थ के हठ और कठोर उपवासों से शरीर को सुखाना आध्यात्मिक नहीं, बल्कि आसुरी कृत्य है, क्योंकि इससे आत्मा को कष्ट होता है।
तीन प्रकार के आहार: सात्त्विक, राजसिक और तामसिक (श्लोक 7 - 10)
श्लोक 7
संस्कृत:
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु॥7॥
भावार्थ: भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके भेदों को अब तू मुझसे सुन।
विश्लेषण: यहाँ से भगवान 'सात्त्विक जीवनशैली' (Lifestyle) का विज्ञान शुरू कर रहे हैं। हमारा भोजन हमारे विचारों और मन को सीधे प्रभावित करता है।
श्लोक 8
संस्कृत:
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥8॥
भावार्थ: आयु, बुद्धि, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने (स्निग्ध), हृदय को प्रिय और शरीर में लंबे समय तक शक्ति बनाए रखने वाले भोजन सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
विश्लेषण: सात्त्विक भोजन ताजा, सुपाच्य और पौष्टिक होता है। यह केवल जीभ को नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और मन को भी तृप्ति देता है।
श्लोक 9
संस्कृत:
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥9॥
भावार्थ: कड़वे, खट्टे, अधिक नमकीन, बहुत गर्म, तीखे, रूखे, जलन पैदा करने वाले और दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने वाले भोजन राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।
विश्लेषण: अधिक मिर्च-मसाले वाला और उत्तेजक भोजन राजसी है। यह स्वाद में तो अच्छा लग सकता है, लेकिन अंततः शरीर में बीमारियाँ और मन में अशांति पैदा करता है।
श्लोक 10
संस्कृत:
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥10॥
भावार्थ: जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी, झूठा और अपवित्र है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।
विश्लेषण: तामसी भोजन (जैसे जंक फूड, बासी खाना या नशीले पदार्थ) चेतना को सुस्त बना देता है और बुद्धि का नाश करता है।
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