भगवान श्रीकृष्ण का जन्म: कब, कहाँ और कैसे?
समय (कब):
पौराणिक गणनाओं और ज्योतिषीय साक्ष्यों के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म आज से लगभग 5200 वर्ष पूर्व द्वापर युग के अंत में हुआ था। तिथि थी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी और नक्षत्र था रोहिणी। उस समय अर्धरात्रि का समय था और चारों ओर भारी वर्षा हो रही थी।
स्थान (कहाँ):
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर मथुरा में हुआ था। मथुरा उस समय उग्रसेन के अधीन थी, लेकिन उनके क्रूर पुत्र कंस ने उन्हें जेल में डालकर शासन हड़प लिया था। श्रीकृष्ण का जन्म कंस के उसी कारागार (जेल) में हुआ था।
कथा (कैसे):
कंस की बहन देवकी और उनके पति वसुदेव के विवाह के समय एक आकाशवाणी हुई थी कि देवकी की आठवीं संतान कंस का वध करेगी। भयभीत कंस ने अपनी ही बहन और जीजा को कैद कर लिया और उनकी पहली 6 संतानों को निर्दयता से मार डाला। सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया (जो बलराम जी के रूप में प्रकट हुए)।
जब आठवीं संतान यानी स्वयं भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के जन्म का समय आया, तो प्रकृति में दिव्य चमत्कार होने लगे। आधी रात को जैसे ही कृष्ण प्रकट हुए, जेल के पहरेदार गहरी नींद में सो गए और लोहे की भारी बेड़ियाँ व दरवाजे अपने आप खुल गए। वसुदेव जी ने बालक कृष्ण को एक टोकरी में रखा और उफनती यमुना पार कर गोकुल में अपने मित्र नंद बाबा के घर पहुँचा दिया। यमुना ने स्वयं कान्हा के चरण स्पर्श करने के लिए अपना जल स्तर कम कर दिया था। जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म पर अडिग रहने की यही सीख हमें श्रीमद्भगवद्गीता के सार से भी मिलती है।
श्रीकृष्ण से जुड़ी 10 अनसुनी और रहस्यमयी बातें
श्रीकृष्ण के जीवन और लीलाओं के बारे में बहुत सी बातें प्रचलित हैं, लेकिन ये 10 तथ्य अक्सर शोध और गूढ़ धार्मिक ग्रंथों तक ही सीमित रह जाते हैं:
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उनका रंग काला नहीं था: बहुत से लोग मानते हैं कि कृष्ण नीले या काले रंग के थे। वास्तव में, उनका मूल रंग 'मेघ श्यामल' था, यानी वर्षा वाले बादलों जैसा गहरा सांवला। उनके शरीर से एक दिव्य और अलौकिक आभा निकलती थी, जो देखने वालों को नीला होने का आभास देती थी। जैसा कि श्रीकृष्ण और होली के रहस्यों में भी बताया गया है, वे रंगों के गहरे आध्यात्मिक अर्थों को भली-भांति जानते थे।
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शरीर से आती थी पारिजात की खुशबू: प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, श्रीकृष्ण के शरीर से कभी पसीना या दुर्गंध नहीं आती थी। उनके देह से प्राकृतिक रूप से चंदन और पारिजात के फूलों जैसी अलौकिक सुगंध हमेशा निकलती रहती थी।
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कभी बूढ़े नहीं हुए (अक्षय यौवन): क्या आपने कभी श्रीकृष्ण को सफेद दाढ़ी या झुर्रियों वाले वृद्ध के रूप में देखा है? पुराणों के अनुसार, कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय उनकी आयु लगभग 89 वर्ष थी और देह त्याग के समय 125 वर्ष, फिर भी वे सदैव 16-18 वर्ष के नवयुवक जैसे ही दिखते थे। उन्हें 'अक्षय यौवन' प्राप्त था।
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गांडीव धारी अर्जुन से भी हुआ था युद्ध: यद्यपि कृष्ण और अर्जुन परम मित्र थे, लेकिन एक बार 'गया' नामक गंधर्व को वचन देने के कारण कृष्ण और अर्जुन के बीच भीषण युद्ध हुआ था। यह युद्ध इतना भयानक रूप ले चुका था कि अंत में स्वयं भगवान शिव को बीच में आकर हस्तक्षेप करना पड़ा था।
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आँखों की पुतलियां स्थिर रहती थीं: योग शास्त्र के अनुसार श्रीकृष्ण महायोगी थे। उनकी आँखों के बारे में कहा जाता है कि वे कभी सामान्य मनुष्यों की तरह पलकें नहीं झपकाते थे और उनकी पुतलियां हमेशा स्थिर रहती थीं, जो उनके सदैव जाग्रत चेतना में रहने का संकेत था।
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विश्व का पहला 'मार्शल आर्ट्स' (कलारीपयट्टू): प्राचीन मान्यताओं के अनुसार युद्ध कला 'कलारीपयट्टू' की नींव श्रीकृष्ण ने ही रखी थी। उन्होंने चाणूर और मुष्टिक जैसे शक्तिशाली मल्लों को हराकर यह सिद्ध किया था कि शारीरिक बल से बड़ी सही तकनीक होती है। उनका सुदर्शन चक्र संचालन इसी कला का शिखर था।
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प्राचीन मूल ग्रंथों में राधा जी का स्पष्ट नाम: यह तथ्य शोधकर्ताओं को अचंभित करता है कि महाभारत, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के प्राचीनतम मूल संस्करणों में राधारानी का नाम प्रत्यक्ष रूप से बहुत कम मिलता है। उनका विस्तृत वर्णन बाद में 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' और भक्ति काल के आचार्यों व कवियों के माध्यम से जगत् में प्रसिद्ध हुआ।
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एक साथ कई रूप धारण करने की कला: देवर्षि नारद ने एक बार द्वारका में देखा कि कृष्ण अपनी 16,108 रानियों के साथ अलग-अलग महलों में एक ही समय पर उपस्थित थे और हर स्थान पर अलग कार्य कर रहे थे। यह उनकी 'योगमाया' की अनंत शक्ति का परिचय था।
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त्रिकालदर्शी सहदेव का मौन: पांडवों में सहदेव त्रिकालदर्शी थे। उन्हें महाभारत युद्ध के परिणाम और हर घटना का पहले से ज्ञान था। लेकिन कृष्ण ने उन्हें वचनबद्ध किया था कि यदि वे किसी को यह रहस्य बताएंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी, ताकि नियति का चक्र सुचारू रूप से चल सके।
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गांधारी का शाप और देह त्याग: श्रीकृष्ण का देह त्याग किसी रोग से नहीं, बल्कि 'जरा' नामक शिकारी के बाण से हुआ था। यह महाभारत युद्ध के पश्चात माता गांधारी द्वारा दिए गए उस शाप का फलीभूत रूप था, जिसके अनुसार यदुवंश का आपस में लड़कर अंत होना तय हुआ था। सनातन इतिहास में ऐसी ही प्रतिज्ञाओं और वचनों का महत्व हम भीष्म पितामह के जीवन और उनकी भीषण प्रतिज्ञा में भी देखते हैं।
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल चमत्कारों की गाथा नहीं, बल्कि धर्म, नीति और मानव जीवन के सर्वोच्च मूल्यों को स्थापित करने वाला एक आदर्श दर्शन है। कारागार जैसी विकट परिस्थिति में जन्म लेकर भी उन्होंने अपने कर्मों और मुस्कान से संपूर्ण सृष्टि को एक नई दिशा दी। जिस तरह महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता का इतिहास हमें धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियों से डरने के बजाय अपने कर्तव्य पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।