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| कंधार का इतिहास: महाभारत काल के गंधार साम्राज्य से आधुनिक अफगानिस्तान तक का सफर |
महाभारत काल और गंधार का गौरव
कंधार का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण संदर्भ महाभारत में मिलता है। उस समय इसे 'गंधार साम्राज्य' कहा जाता था। यह साम्राज्य आधुनिक पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी हिस्से और पूर्वी अफगानिस्तान तक फैला हुआ था।
शकुनि और गांधारी: महाभारत की प्रमुख पात्र गांधारी, गंधार के राजा सुबल की पुत्री थीं। उन्हीं के नाम पर उनका नाम 'गांधारी' पड़ा। उनके भाई शकुनि गंधार के राजकुमार थे, जिन्हें महाभारत युद्ध के मुख्य सूत्रधारों में से एक माना जाता है।
राजधानी तक्षशिला: प्राचीन गंधार की दो प्रमुख राजधानियाँ थीं—पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) और तक्षशिला। तक्षशिला उस समय विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र था, जहाँ चाणक्य जैसे विद्वानों ने शिक्षण कार्य किया।
सांस्कृतिक जुड़ाव: गंधार का वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है, जो इसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है। यहाँ के लोग अपनी कला, संगीत और ऊनी वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे।
सिकंदर का आक्रमण और 'अलेक्जेंड्रिया' का जन्म
जैसे-जैसे समय बीता, गंधार की रणनीतिक स्थिति ने विदेशी आक्रमणकारियों को आकर्षित किया। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (330 ई.पू.) में जब सिकंदर महान (Alexander the Great) ने फारसी साम्राज्य को हराते हुए पूर्व की ओर रुख किया, तो उसने इस क्षेत्र की महत्ता को समझा।
सिकंदर ने यहाँ एक शहर की नींव रखी जिसका नाम 'अलेक्जेंड्रिया अरकोसिया' रखा गया। इतिहासकारों का मानना है कि यही 'अलेक्जेंड्रिया' शब्द धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर 'कंधार' बन गया। सिकंदर के बाद यह क्षेत्र सेल्यूकस निकेटर के पास रहा, जिसे बाद में मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने एक संधि के तहत अपने साम्राज्य में मिला लिया।
मौर्य काल और बौद्ध धर्म का स्वर्ण युग
सम्राट अशोक के शासनकाल में गंधार और कंधार के क्षेत्र में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन आया। अशोक ने यहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
गंधार कला (Gandhara Art): इस काल में भारतीय और ग्रीक कला के मिश्रण से 'गंधार कला' का जन्म हुआ। इसमें भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं को ग्रीक शैली में बनाया गया।
अशोक के शिलालेख: कंधार में आज भी अशोक के द्विभाषी शिलालेख (यूनानी और अरामी भाषा में) मिलते हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि यह क्षेत्र कभी महान भारतीय मौर्य साम्राज्य का अभिन्न अंग था।
मध्यकालीन इतिहास और इस्लामी आक्रमण
7वीं शताब्दी के बाद इस क्षेत्र में इस्लाम का आगमन शुरू हुआ। सिंध पर अरबों की विजय के बाद धीरे-धीरे गंधार का हिंदू और बौद्ध प्रभाव कम होने लगा।
महमूद गजनवी: 10वीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने इस क्षेत्र पर कब्जा किया और यहाँ के मंदिरों और प्राचीन ढांचों को भारी नुकसान पहुँचाया। इसके बाद यह क्षेत्र सुल्तानों और मंगोलों के बीच सत्ता संघर्ष का केंद्र बना रहा।
मुगल और सफाविद संघर्ष: 16वीं और 17वीं शताब्दी में कंधार मुगल साम्राज्य और ईरान के सफाविद शासकों के बीच प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। बाबर ने 1522 में कंधार को जीता था। मुगलों के लिए कंधार सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह भारत का प्रवेश द्वार माना जाता था। हुमायूँ, अकबर और जहांगीर के समय तक यह मुगलों के पास रहा, लेकिन अंततः शाहजहाँ और औरंगजेब के समय यह मुगलों के हाथ से निकल गया।
आधुनिक कंधार और अहमद शाह अब्दाली
आधुनिक अफगानिस्तान के इतिहास में कंधार का स्थान 'राजधानी' जैसा रहा है। 1747 में अहमद शाह अब्दाली (जिसे दुर्रानी साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है) ने कंधार को अपनी राजधानी बनाया। अब्दाली को आधुनिक अफगानिस्तान का राष्ट्रपिता माना जाता है और उसकी समाधि आज भी कंधार के मुख्य आकर्षणों में से एक है।
19वीं शताब्दी में यह शहर एंग्लो-अफ़गान युद्धों का गवाह बना, जहाँ अंग्रेजों ने रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कंधार पर कई बार कब्जा करने की कोशिश की।
20वीं और 21वीं शताब्दी: संघर्ष का केंद्र
पिछले कुछ दशकों में कंधार का नाम दुनिया भर की सुर्खियों में 'युद्ध' और 'तालिबान' के कारण रहा है।
तालिबान का उदय: 1990 के दशक में कंधार तालिबान आंदोलन का जन्मस्थान बना। तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर ने कंधार को ही अपना मुख्य मुख्यालय बनाया था।
IC-814 हाईजैक (1999): भारत के इतिहास की एक दुखद घटना, इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण, कंधार हवाई अड्डे पर ही समाप्त हुआ था। इसने आधुनिक काल में भारत और कंधार के रिश्तों में एक कड़वाहट पैदा की।
अमेरिकी हस्तक्षेप: 2001 में 9/11 हमलों के बाद, अमेरिकी सेना ने कंधार से तालिबान को बेदखल किया, लेकिन दो दशकों के लंबे युद्ध के बाद 2021 में एक बार फिर यहाँ तालिबान का नियंत्रण स्थापित हो गया।
निष्कर्ष: इतिहास की गूँज
कंधार का इतिहास इस बात का गवाह है कि यह शहर हमेशा से एशिया की धुरी रहा है। जहाँ एक ओर इसके प्राचीन अवशेष और 'गांधार' नाम हमें महाभारत के गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं, वहीं इसका मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास सत्ता के क्रूर संघर्षों की कहानी कहता है।
आज कंधार भले ही अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा हो, लेकिन इसकी मिट्टी में दबे अशोक के शिलालेख और महाभारत की स्मृतियाँ हमेशा इसे भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक इतिहास से जोड़े रखेंगी। यह वह भूमि है जिसने वैदिक मंत्रों से लेकर युद्ध की चीखों तक, सब कुछ सुना है।
