आज जिसे हम अफगानिस्तान का प्रमुख शहर कंधार (Kandahar) कहते हैं, उसका इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास, सनातन परंपरा और महाभारत काल से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में कंधार का पुराना नाम 'गंधार' (Gandhara) था। यह वही ऐतिहासिक भूमि है जिसने न केवल कई साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा, बल्कि वैदिक संस्कृति, बौद्ध धर्म और सिल्क रोड के व्यापार का प्रमुख केंद्र भी रही।
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महाभारत काल और गंधार साम्राज्य का इतिहास
कंधार का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण संदर्भ महाभारत (Mahabharata) में मिलता है। उस काल में इसे 'गंधार साम्राज्य' कहा जाता था। यह साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान के क्षेत्र में विस्तृत था।
माते गांधारी और मामा शकुनि: महाभारत की प्रमुख पात्र माता गांधारी, गंधार के राजा सुबल की पुत्री थीं। गंधार देश की राजकुमारी होने के कारण ही उनका नाम 'गांधारी' पड़ा। उनके भाई शकुनि (Gandhar Naresh Shakuni) गंधार के राजकुमार थे, जिन्हें महाभारत युद्ध की मुख्य पटकथा लिखने वालों में से एक माना जाता है।
तक्षशिला का विद्या केंद्र: प्राचीन गंधार की दो मुख्य राजधानियाँ थीं— पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) और तक्षशिला (Taxila)। तक्षशिला प्राचीन काल में विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र था, जहाँ आचार्य चाणक्य जैसे महान विद्वानों ने अध्ययन और अध्यापन कार्य किया था।
ऋग्वेद में वर्णन: गंधार देश का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। प्राचीन काल में यहाँ के लोग अपनी समृद्ध कला, संगीत और ऊनी वस्त्रों के व्यापार के लिए विश्वप्रसिद्ध थे।
सिकंदर का आक्रमण और 'कंधार' नाम की उत्पत्ति
समय बीतने के साथ गंधार की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति ने कई विदेशी आक्रमणकारियों को आकर्षित किया। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (330 ई.पू.) में जब सिकंदर महान (Alexander the Great) ने फारसी साम्राज्य को हराने के बाद पूर्व की ओर रुख किया, तो उसने इस स्थान का सामरिक महत्व समझा।
सिकंदर ने यहाँ एक नए शहर की नींव रखी जिसका नाम 'अलेक्जेंड्रिया अरकोसिया' (Alexandria Arachosia) रखा गया। प्रमुख इतिहासकारों का मानना है कि यही 'अलेक्जेंड्रिया' शब्द समय के साथ अपभ्रंश होकर स्थानीय भाषा में 'कंधार' बन गया। सिकंदर के बाद यह क्षेत्र सेल्यूकस निकेटर के पास आया, जिसे बाद में मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने संधि के माध्यम से अपने विशाल साम्राज्य में शामिल कर लिया।
मौर्य साम्राज्य और बौद्ध धर्म का स्वर्ण काल
सम्राट अशोक के शासनकाल में गंधार और कंधार क्षेत्र में एक महान सांस्कृतिक क्रांति आई। सम्राट अशोक ने इस पूरे क्षेत्र में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार कराया।
गंधार कला शैली (Gandhara Art Style): इस कालखंड में भारतीय और यूनानी (ग्रीक) कला के अद्भुत संगम से 'गंधार कला' का जन्म हुआ। इसके अंतर्गत भगवान बुद्ध की सुंदर मूर्तियों का निर्माण ग्रीक शैली में किया गया।
सम्राट अशोक के शिलालेख: कंधार में आज भी सम्राट अशोक के द्विभाषी शिलालेख (यूनानी और अरामी भाषा) मौजूद हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण है कि कंधार कभी महान मौर्य साम्राज्य का अभिन्न अंग था।
मध्यकालीन इतिहास: मुगलों और सफावियों का संघर्ष
7वीं शताब्दी के बाद इस क्षेत्र में सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन होने लगे। धीरे-धीरे गंधार पर हिंदू और बौद्ध प्रभाव कम होता गया और मध्यकाल में यह क्षेत्र इस्लामी सुल्तानों और आक्रांताओं के नियंत्रण में आ गया।
महमूद गजनवी का दौर: 10वीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। इसके बाद कंधार क्षेत्र मध्य एशियाई शासकों के बीच राजनीतिक खींचातान का केंद्र बना रहा।
मुगल साम्राज्य और कंधार: 16वीं और 17वीं शताब्दी में कंधार शहर भारत के मुगल साम्राज्य और ईरान के सफाविद वंश के बीच प्रतिष्ठा की जंग बन गया था। मुगल सम्राट बाबर ने 1522 ई. में कंधार पर विजय प्राप्त की थी। मुगलों के लिए कंधार सामरिक दृष्टि से 'भारत का प्रवेश द्वार' माना जाता था।
आधुनिक कंधार का इतिहास और वर्तमान दौर
सन 1747 में अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) ने कंधार को अपनी राजधानी बनाया, जिसे आधुनिक अफगानिस्तान का संस्थापक माना जाता है। 19वीं शताब्दी में यह क्षेत्र ब्रिटिश-अफगान युद्धों का गवाह बना।
20वीं और 21वीं शताब्दी में कंधार वैश्विक राजनीति और संघर्षों के केंद्र में आ गया। 1990 के दशक में कंधार तालिबान आंदोलन का मुख्य गढ़ बना। वहीं 1999 में इंडियन एयरलाइंस के प्लेन हाईजैक (IC-814) की घटना भी कंधार एयरपोर्ट से ही जुड़ी हुई है। 2001 में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद और फिर 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद कंधार पुनः तालिबान के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।
निष्कर्ष
गांधार से कंधार तक का 5000 वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि यह स्थान हमेशा से एशिया की धुरी रहा है। जहाँ इसके प्राचीन पुरातात्विक अवशेष और 'गंधार' नाम हमें महाभारत कालीन समृद्ध भारत की याद दिलाते हैं, वहीं इसका आधुनिक इतिहास राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी बयां करता है।