गरुड़ पुराण पहला अध्याय: संपूर्ण संस्कृत श्लोक और हिंदी अर्थ (Garud Puran Adhyay 1 All Slokas in Sanskrit & Hindi)


गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय (मर्त्यलोक और परलोक की यात्रा) में भगवान श्रीहरि गरुड़ जी को यह बताते हैं कि जीव इस मृत्युलोक में किस प्रकार कर्म करता है, उसकी आत्मा शरीर कैसे छोड़ती है और परलोक की यात्रा में उसे क्या-क्या सहना पड़ता है।

यहाँ इस अध्याय के संपूर्ण 65 श्लोक दिए जा रहे हैं:

गरुड़ पुराण प्रथम अध्याय: संपूर्ण 65 श्लोक एवं हिंदी अनुवाद

श्लोक 1

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥१॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान नारायण, पुरुषों में श्रेष्ठ नर, ज्ञान की देवी माँ सरस्वती और महर्षि वेदव्यास को प्रणाम करके 'जय' (पुराण) का पाठ आरंभ करना चाहिए।

श्लोक 2

सूतं पौराणिकं श्रीमन्नैमिषारण्यवासिनः।

पप्रच्छुः परमं तत्त्वं शौनकाद्या महर्षयः॥२॥

  • हिंदी अनुवाद: नैमिषारण्य में निवास करने वाले शौनकादि ऋषियों ने पुराणों के ज्ञाता सूत जी से परम तत्व (मर्त्यलोक और परलोक के रहस्य) के विषय में प्रश्न पूछा।

श्लोक 3

ऋषय ऊचुः

कथं नारायणो देवो गरुडेन समागतः।

कथं वा गरुडायैतत्प्रोक्तवान् गरुडोऽपि च॥३॥

  • हिंदी अनुवाद: ऋषियों ने पूछा—भगवान नारायण का गरुड़ जी के साथ मिलन कैसे हुआ और भगवान ने उन्हें इस महापुराण तथा परलोक यात्रा का ज्ञान किस प्रकार दिया?

श्लोक 4

कस्मै प्रोक्तवान् सर्वं गरुडः पन्नगाशनः।

तदस्माकं महाभाग कथयस्व महामते॥४॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी ने यह परम ज्ञान आगे किसे सुनाया, हे महामती सूत जी! वह सब आप हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 5

सूत उवाच

श्रूयतां मुनयः सर्वे यत्पृष्टं भवद्भिः पुरा।

कथयिष्यामि तत्सर्वं विष्णुना यदुदाहृतम्॥५॥

  • हिंदी अनुवाद: सूत जी बोले—हे ऋषियों! आप सभी ध्यानपूर्वक सुनें। जो प्रश्न आपने पूछा है, वही ज्ञान पूर्वकाल में भगवान विष्णु ने गरुड़ जी से कहा था, वही मैं आपको सुनाता हूँ।

श्लोक 6

गरुड़ उवाच

कथितो भवता सम्यग्देवमार्गः सुखप्रदः।

अधुना श्रोतुमिच्छामो यममार्गं भयंकरम्॥६॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी ने भगवान से कहा—हे प्रभु! आपने मुझे देवमार्ग का वर्णन सुनाया। अब मैं मर्त्यलोक से परलोक जाने वाले भयंकर यममार्ग के बारे में सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 7

श्रीभगवानुवाच

शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि यममार्गं सुदारुणम्।

येन गच्छन्ति पापात्मा यमलोकं सुदुःखिताः॥७॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें मर्त्यलोक से परलोक जाने वाले उस कठिन मार्ग के बारे में बताता हूँ, जिस पर पापी जीव दुःखी होकर यात्रा करते हैं।

श्लोक 8

मर्त्यलोके तु यः कश्चित् करोति शुभपापकम्।

तस्य सर्वं यथा भुङ्क्ते तथा शृणु समाहितः॥८॥

  • हिंदी अनुवाद: मनुष्य इस मर्त्यलोक (पृथ्वी) में जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल वह परलोक में किस प्रकार भोगता है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 9

सदा पापात्मकाः क्रूरा दयाधर्मविवर्जिताः।

दुःसङ्गसहिता नित्यं सत्शास्त्रपरङ्मुखाः॥९॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य मर्त्यलोक में सदा पाप कर्मों में लीन रहते हैं, क्रूर स्वभाव के हैं, जिनमें दया-धर्म नहीं है और जो शास्त्रों से विमुख रहते हैं...

श्लोक 10

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।

आसुरं भावमापन्ना दैवीसम्पद्विवर्जिताः॥१०॥

  • हिंदी अनुवाद: जो स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं, घमंडी हैं और धन के नशे में चूर रहते हैं, वे मृत्यु के बाद घोर यातना भोगते हैं।

श्लोक 11

अनेकाचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥११॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मोह के जाल में फँसे हैं और काम-वासनाओं के भोग में अंधे हैं, वे अंततः अपवित्र नरक में गिरते हैं।

श्लोक 12

म्रियमाणस्य मर्त्यस्य लक्षणं शृणु खगेश्वर।

यथा त्यजति देहं च तथा ते कथयाम्यहम्॥१२॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! अब मरणासन्न मनुष्य के लक्षणों को सुनो। जिस प्रकार जीव अपने इस भौतिक शरीर को छोड़ता है, वह मैं तुमसे कहता हूँ।

श्लोक 13

कण्ठे घुरघुरायाते वागिन्द्रियनिरोधतः।

दृष्टिर्विभ्राम्यते चक्षुः पीड्यते मारुतैस्तथा॥१३॥

  • हिंदी अनुवाद: मृत्यु के समय मनुष्य के गले से घुरघुर की आवाज़ आने लगती है, वाणी रुक जाती है, आँखों की दृष्टि छिन जाती है और प्राणवायु पूरे शरीर को पीड़ित करती है।

श्लोक 14

ऊर्ध्वदृष्टिः प्रभवति निःश्वासश्चोर्ध्वगो भवेत्।

शीतलता अङ्गेषु भवेत्प्राणविमोक्षणे॥१४॥

  • हिंदी अनुवाद: आँखें ऊपर की ओर टिक जाती हैं, सांसें तेज़ और ऊपर चलने लगती हैं और प्राण निकलने के समय पूरे हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते हैं।

श्लोक 15

यमाज्ञापुरःसरा दूता आगच्छन्ति भयं कराः।

पाशहस्ता महाकाया दंष्ट्राकरालवदनाः॥१५॥

  • हिंदी अनुवाद: यमराज की आज्ञा से भयंकर यमदूत वहाँ पहुँचते हैं, जिनके हाथों में पाश (रस्सी) होती है, विशाल शरीर और डरावने दाँत होते हैं।

श्लोक 16

तान् दृष्ट्वा भयसन्त्रस्तः शकृन्मूत्रं मुञ्चति।

क्रन्दते चातुरो जीवः पार्श्वस्थान् ह्यभिपश्यति॥१६॥

  • हिंदी अनुवाद: उन यमदूतों को देखकर भयभीत हुआ जीव मल-मूत्र त्याग देता है और व्याकुल होकर अपने परिजनों की ओर असहाय दृष्टि से देखता है।

श्लोक 17

न कोऽपि रक्षकस्तस्य बान्धवाश्च रुदन्ति हि।

ततो देहात्समुत्कृत्य गृह्णन्ति यमकिंकराः॥१७॥

  • हिंदी अनुवाद: उस समय उसका कोई रक्षक नहीं होता, रिश्तेदार केवल रोते रह जाते हैं। तब यमदूत उस जीव को शरीर से बाहर खींच लेते हैं।

श्लोक 18

यातनादेहमाश्रित्य याति जीवः खगेश्वर।

पाशेन बद्धः कण्ठे च क्रोशमानो सुदुःखितः॥१८॥

  • हिंदी अनुवाद: जीव यातना देह (सूक्ष्म शरीर) धारण कर लेता है और यमदूत उसके गले में रस्सी बाँधकर उसे घसीटते हुए परलोक ले जाते हैं।

श्लोक 19

मर्त्यलोकं परित्यज्य परलोकं प्रपद्यते।

अन्तरिक्षे निरालम्बो वायुवेगेन नीयते॥१९॥

  • हिंदी अनुवाद: मर्त्यलोक को छोड़कर जीव परलोक की यात्रा पर निकल पड़ता है। अंतरिक्ष में बिना किसी सहारे के वह वायु की गति से घसीटा जाता है।

श्लोक 20

ताड्यमानो यमदूतैः कोड़ैश्चैवातिदारुणैः।

स्मृत्वा कर्म स्वकं पापी क्रन्दते ह्यतिदुःखितः॥२०॥

  • हिंदी अनुवाद: यमदूतों के भयंकर कोड़ों की मार खाते हुए वह पापी जीव अपने द्वारा मर्त्यलोक में किए गए पापों को याद करके रोता है।

श्लोक 21

हा पुत्र हा कलत्र च हा धनेति वदन् मुहुः।

पश्चात्तापं करोत्येव नाहं दत्तं हुतं न च॥२१॥

  • हिंदी अनुवाद: जीव चिल्लाता है—'हा पुत्र! हा पत्नी! हा धन!' और पश्चाताप करता है कि मैंने मर्त्यलोक में न तो दान दिया और न ही कभी धर्म कार्य किए।

श्लोक 22

न पीतं परमं तीर्थं न पूजितो हरिः क्वचित्।

तत्कर्मणः फलं प्राप्तं दारुणं यमशासने॥२२॥

  • हिंदी अनुवाद: न मैंने कभी तीर्थ स्नान किया, न कभी श्रीहरि की पूजा की। आज उसी पाप का यह भयंकर फल मुझे यमराज के दरबार में मिल रहा है।

श्लोक 23

एवं क्रन्दमानं तं दूताः प्रोचुः सुदारुणाः।

गच्छ शीघ्रं पापमते यमलोकं सुदुःखदम्॥२३॥

  • हिंदी अनुवाद: उस जीव को रोता देखकर क्रूर यमदूत कहते हैं—'ओ पापी! चुपचाप शीघ्र उस दुःखदायी यमलोक की ओर चल।'

श्लोक 24

त्वया कृतं च यत्पापं भुङ्क्ष्व तस्य फलं तथा।

न कोऽपि तव बन्धुश्च मर्त्यलोके सहायताम्॥२४॥

  • हिंदी अनुवाद: जो पाप तुमने मर्त्यलोक में किए हैं, उनका फल तुम्हें ही भोगना पड़ेगा। अब मर्त्यलोक का कोई रिश्तेदार तुम्हारी मदद के लिए नहीं आएगा।

श्लोक 25

एवमुक्त्वा तु ते दूताः ताडयन्ति मुहुर्मुहुः।

तप्तबालुकसंकीर्णे पंथानि नयति त्वरितम्॥ २५॥

  • हिंदी अनुवाद: ऐसा कहकर यमदूत उसे बार-बार मारते हैं और तपती हुई गर्म रेत से ढके मार्ग पर तेज़ी से ले जाते हैं।

श्लोक 26

न च च्छाया न विश्रामो न च पानीयमेव च।

तप्तेन सूर्यरश्मिना दह्यमानः प्रगच्छति॥२६॥

  • हिंदी अनुवाद: उस रास्ते पर न तो कहीं छाया है, न आराम करने की जगह और न ही पीने का जल। कड़कती धूप में जलता हुआ जीव आगे बढ़ता है।

श्लोक 27

क्षुधा तृषा समाविष्टो जीवो गच्छति दुःखितः।

पिण्डदानं तु यद्दत्तं पुत्रैश्च बान्धवैस्तथा॥२७॥

  • हिंदी अनुवाद: जीव भूख और प्यास से व्याकुल होकर चलता है। मर्त्यलोक में उसके पुत्रों और परिजनों द्वारा जो पिंडदान दिया जाता है...

श्लोक 28

तेनैव जीवते जीवः पंथानं परलोकगः।

तस्मात्पुत्रैश्च कर्तव्यं दसगात्रं तु सर्वथा॥२८॥

  • हिंदी अनुवाद: उसी पिंडदान के आहार से वह जीव परलोक के मार्ग पर जीवित रहता है। इसलिए पुत्रों को दसगात्र श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 29

यैस्तु दानं न दत्तं च पिण्डदानं न कारितम्।

ते यान्ति नरकं घोरं यमदूतैस्तु ताडिताः॥२९॥

  • हिंदी अनुवाद: जिसके लिए कोई दान या पिंडदान नहीं किया जाता, वह जीव अत्यंत भूखा-प्यासा रहकर यमदूतों की मार खाता हुआ घोर नरक में गिरता है।

श्लोक 30

अहो मर्त्यलोकज कर्म यज्जीवैः क्रियते शुभम्।

तदेव रक्षति तत्र नान्यः कोऽपि हि रक्षकः॥३०॥

  • हिंदी अनुवाद: अहो! मर्त्यलोक में जीव द्वारा किए गए शुभ कर्म ही परलोक में उसकी रक्षा करते हैं, उसके अलावा अन्य कोई रक्षक नहीं होता।

श्लोक 31

ततः क्रोशमात्रं गत्वा जीवो दृष्ट्वा तु यातनाम्।

हाहाकारं प्रकुरुते यममार्गस्य मध्यगः॥३१॥

  • हिंदी अनुवाद: परलोक के मार्ग में एक कोस आगे बढ़ते ही जीव भयानक यातनाओं को देखकर हाहाकार करने लगता है।

श्लोक 32

असिपत्रवनं नाम तत्र वर्तति दारुणम्।

पत्रैः खड्गसमैस्तत्र छिद्यन्ते तस्य चांगकम्॥३२॥

  • हिंदी अनुवाद: आगे 'असिपत्रवन' नामक जंगल आता है, जहाँ पत्तियाँ तलवार की तरह धारदार होती हैं, जो जीव के शरीर के टुकड़े कर देती हैं।

श्लोक 33

वैतरणी नाम नदी तत्र वर्तति दारुणा।

पूयशोणितपूर्णा च दुर्गन्धा भयं करा॥३३॥

  • हिंदी अनुवाद: वहीं पर अत्यंत भयानक 'वैतरणी नदी' बहती है, जो मवाद और खून से भरी होती है और घोर दुर्गंध देती है।

श्लोक 34

तामवतीर्य पापिष्ठो मज्जते जलचराकुले।

ज्वलदग्नि समे तीरे ताड्यते यमकिङ्करैः॥३४॥

  • हिंदी अनुवाद: उस नदी में पापी जीव डूबता है और यमदूत किनारे पर उसे आग की लपटों के बीच पीटते हैं।

श्लोक 35

अहर्निशं क्रन्दमानो यमदूतैश्च ताडितः।

षडशीतिसहस्राणि योजनानां प्रगच्छति॥३५॥

  • हिंदी अनुवाद: दिन-रात रोता-चिल्लाता जीव पूरे 86,000 योजन लंबा परलोक का मार्ग तय करता है।

श्लोक 36

तत्र यमपुरीमध्ये पुराणि षोडश सन्ति च।

तेषु स्थानेषु दुःखानि भुङ्क्ते पापी सुदारुणम्॥३६॥

  • हिंदी अनुवाद: परलोक के इस मार्ग में 16 नगर आते हैं, जहाँ पापी जीव को रुक-रुक कर भारी दुःख भोगने पड़ते हैं।

श्लोक 37

सौम्यं सौरीपुरं चैव नगरेन्द्र भवनं तथा।

गन्धर्वं शैलगामं च क्रौञ्चं पुरमथापि च॥३७॥

  • हिंदी अनुवाद: सौम्यपुर, सौरीपुर, नगरेन्द्रभवन, गन्धर्वपुर, शैलगाम और क्रौञ्चपुर...

श्लोक 38

क्रूरं विचित्रभवनं बहुवापदमेव च।

दुःखदं नानाक्रन्दं च सुतप्तं रौद्रमेव च॥३८॥

  • हिंदी अनुवाद: क्रूरपुर, विचित्रभवन, बहुवापदपुर, दुःखदपुर, नानाक्रंदपुर, सुतप्तपुर और रौद्रपुर...

श्लोक 39

पयोवर्षणमेवाथ शीतढ्यं बहुभीतिकम्।

एतानि षोडश पुराणि यमलोकस्य वर्त्मनि॥३९॥

  • हिंदी अनुवाद: पयोवर्षणपुर, शीताढ्यपुर और बहुभीतिकपुर—ये 16 नगर यमलोक के मार्ग में स्थित हैं।

श्लोक 40

मासिके तु प्रदानेन लभते तत्र विश्रमम्।

अन्यथा तु निराहारः क्रन्दते भृशमुद्विग्नः॥४०॥

  • हिंदी अनुवाद: मर्त्यलोक से परिजनों द्वारा दिए गए मासिक पिंडदान से जीव को इन नगरों में विश्राम मिलता है, वरना वह भूखा ही रोता रहता है।

श्लोक 41

संवत्सरेण प्राप्नोति यमस्य नगरं शुभम्।

यत्रास्ते धर्मराजश्च चित्रगुप्तश्च धीमान्॥४१॥

  • हिंदी अनुवाद: पूरे एक वर्ष की यात्रा के बाद जीव यमराज के नगर पहुँचता है, जहाँ धर्मराज यम और चित्रगुप्त विराजमान हैं।

श्लोक 42

तत्र सिंहासने आसीनं यमं पश्यति पापिष्ठः।

भयं करं महाकायं दंष्ट्राकराललोचनम्॥४२॥

  • हिंदी अनुवाद: पापी जीव वहाँ सिंहासन पर बैठे यमराज को अत्यंत विशाल, भयानक और डरावने रूप में देखता है।

श्लोक 43

धार्मिकस्तु नरो दृष्ट्वा यमं विष्णुसमं प्रभुम्।

सौम्य रूपं चतुर्बाहुं शंखचक्र गदाधरम्॥४३॥

  • हिंदी अनुवाद: परंतु मर्त्यलोक में धर्म करने वाला पुण्यात्मा व्यक्ति यमराज को भगवान विष्णु के समान चार भुजाओं वाले शांत रूप में देखता है।

श्लोक 44

चित्रगुप्तोऽपि तस्यायुः पाप पुण्यं च पश्यति।

मर्त्यलोके कृतं सर्वं लिख्यते येन पुस्तकैः॥४४॥

  • हिंदी अनुवाद: चित्रगुप्त मर्त्यलोक में किए गए जीव के सभी पाप-पुण्य का ब्योरा अपनी पुस्तक से देखकर बताते हैं।

श्लोक 45

आदित्यचन्द्रावनिलो नलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।

अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम्॥४५॥

  • हिंदी अनुवाद: सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यमराज, दिन, रात, दोनों संध्याएँ और धर्म—ये सभी मर्त्यलोक के जीवों के साक्षी हैं।

श्लोक 46

ततः सत्यं समालोक्य यमः सर्वज्ञ ईश्वरः।

दण्डं शास्ति पापिनो यातनासु च पातयेत्॥४६॥

  • हिंदी अनुवाद: सब सत्य देखकर यमराज पापी जीव को उसके अनुसार दंड और नरक में फेंकने का आदेश देते हैं।

श्लोक 47

रौरवे महारौरवे च तमिस्रे चान्धतमिस्रके।

कुम्भीपाके च ताप्रैश्च पतन्ति पापकारिणः॥४७॥

  • हिंदी अनुवाद: पापियों को रौरव, महारौरव, तमिस्र, अंधतमिस्र और कुंभीपाक जैसे घोर नरकों में गिराया जाता है।

श्लोक 48

छिन्नभिन्नाश्च क्रन्दन्ति यावत्पापं न क्षीयते।

तैलकुण्डेषु पच्यन्ते मुद्गरैश्च ताड्यन्ते भृशम्॥४८॥

  • हिंदी अनुवाद: जब तक उनके पाप खत्म नहीं होते, वे तेल के कड़ाहों में उबाले जाते हैं और गदाओं से पीटे जाते हैं।

श्लोक 49

भुक्त्वा तु यातनाः सर्वाः पापिष्ठो खगेश्वर।

पुनरत्र समायाति मर्त्यलोके पुनः पुनः॥४९॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! नरक की यातनाएँ भोगने के बाद वह जीव पुनः मर्त्यलोक में जन्म लेने के लिए आता है।

श्लोक 50

स्थावरेषु च कीटेसु पशुपक्ष्यादिषु क्रमात्।

भ्रमित्वा सर्वयोनिषु ततो मानुषतां व्रजेत्॥५०॥

  • हिंदी अनुवाद: वह पेड़-पौधे, कीड़े-मकोड़े, पशु और पक्षियों की योनियों में भटकने के बाद फिर से मनुष्य योनि को प्राप्त करता है।

श्लोक 51

मर्त्यलोके पुनः प्राप्तः कुष्ठी भवति पातकः।

दरिद्रो व्याधिसंयुक्तो मूको बधिर एव च॥५१॥

  • हिंदी अनुवाद: मर्त्यलोक में दोबारा जन्म लेने पर पापी जीव अपने बचे पापों के कारण कुष्ठ रोगी, दरिद्र, गूंगा या बहरा होता है।

श्लोक 52

स्त्रीघाती च भवेद्रोगी गोग्नस्तु विकलो भवेत्।

ब्रह्मज्ञाती च क्षयी स्यात् सर्वपापस्य लक्षणम्॥५२॥

  • हिंदी अनुवाद: स्त्री की हत्या करने वाला रोगी, गोहत्या करने वाला अपाहिज और ब्रह्मघाती तपेदिक (टीबी) का रोगी होता है।

श्लोक 53

तस्मात्सर्वप्रत्नेन पापानि परिवर्जयेत्।

मर्त्यलोके स्थितो जीवः कुर्याद्धर्मं सुसन्ततम्॥५३॥

  • हिंदी अनुवाद: इसलिए मर्त्यलोक में रहने वाले मनुष्य को हर संभव प्रयत्न करके पापों को त्याग देना चाहिए और निरंतर धर्म करना चाहिए।

श्लोक 54

दानं दया च सत्यं च शौचं भक्तिश्च विष्णौ।

एतानि सर्वलोकेषु तारयन्ति च पावकम्॥५४॥

  • हिंदी अनुवाद: दान, दया, सत्य, पवित्रता और भगवान विष्णु की भक्ति—ये गुण जीव को परलोक के कष्टों से उबारते हैं।

श्लोक 55

अन्नदानं महादानं तिलदानं तथैव च।

दीपदानं जलदानं परलोके सुखप्रदम्॥५५॥

  • हिंदी अनुवाद: अन्नदान, तिलदान, दीपदान और जलदान—ये सभी दान परलोक की यात्रा में जीव को महान सुख प्रदान करते हैं।

श्लोक 56

गवां ग्रासं च यो दद्यात् पितॄणामुद्दिश्य च।

तस्य यमभयं नास्ति विष्णुलोकं च गच्छति॥५६॥

  • हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति अपने पितरों के निमित्त गाय को ग्रास देता है, उसे यमराज का भय नहीं रहता और वह अंत में विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 57

एतत्ते कथितं सर्वं मर्त्यलोकस्य लक्षणम्।

परलोकस्य यात्रा च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥५७॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु बोले—हे गरुड़! मैंने तुम्हें मर्त्यलोक का लक्षण और परलोक की यात्रा का पूरा वर्णन सुना दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 58

गरुड़ उवाच

कृतार्थोऽहं महाविष्णो त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो।

श्रुतं परलोकगमनं मर्त्यलोकफलानि च॥५८॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे जगद्गुरु श्रीविष्णु! आपकी कृपा से मैं कृतार्थ हो गया। मैंने मर्त्यलोक के कर्म और परलोक यात्रा का यह पावन वर्णन सुन लिया।

श्लोक 59

य इदं पठते नित्यं शृणोति च समाहितः।

सर्वपापैः प्रमुच्येत विष्णुलोके महीयते॥५९॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस अध्याय को नित्य पढ़ता या एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजनीय होता है।

श्लोक 60

पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्।

धर्मार्थी लभते धर्मं मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्॥६०॥

  • हिंदी अनुवाद: इसे पढ़ने से संतान चाहने वाले को संतान, धन चाहने वाले को धन, धर्म चाहने वाले को धर्म और मोक्ष चाहने वाले को मोक्ष मिलता है।

श्लोक 61

इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे मर्त्यलोकपरलोकगमनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥६१॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'मर्त्यलोक और परलोक यात्रा' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ।

श्लोक 62

हरिः ॐ तत्सच्छ्रीकृष्णार्पणमस्तु॥६२॥

  • हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्री हरि-कृष्ण को समर्पित है।

श्लोक 63

नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥६३॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार प्रणाम है।

श्लोक 64

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥६४॥

  • हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी का कल्याण हो और कोई दुःखी न हो।

श्लोक 65

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥६५॥

  • हिंदी अनुवाद: तीनों तापों की शांति हो। सब शुभ हो।

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