गरुड़ पुराण के द्वादश अध्याय (बारहवें अध्याय) में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान श्रीहरि से यमपुरी के मार्ग, यमराज के दिव्य नगर और उनकी न्याय सभा (धर्म सभा) के स्वरूप के विषय में पूछते हैं। भगवान श्रीहरि यमलोक के विस्तार, चित्रगुप्त के भवन, चार द्वारों वाली यम सभा और धर्मात्माओं तथा पापियों के लिए यमराज के विभिन्न दर्शनों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
गरुड़ पुराण बारहवां अध्याय: 1 से 90 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
श्लोक 1
गरुड़ उवाच
यमपुरी मार्गं तु श्रुतं देव मया प्रभो।
नगरं यमराजस्य सभां च वद मे विभो॥१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे प्रभु! हे विभो! यमपुरी के मार्ग का वर्णन मैंने सुन लिया। अब आप कृपा करके यमराज के नगर और उनकी सभा का वर्णन कीजिए।
श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि यमस्य नगरं महत्।
यद् दृष्ट्वा कम्पन्ते सर्वे पापिनां भयवर्धनम्॥२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें यमराज के उस महान नगर का वर्णन सुनाता हूँ, जिसे देखकर सभी पापी थर-थर कांपने लगते हैं।
श्लोक 3
चतुरस्रं महाभाग यमस्य नगरं शुभम्।
योजनानां सहस्रैश्च चतुर्भिस्तु परिष्कृतम्॥३॥
हिंदी अनुवाद: हे महाभाग! यमराज का वह नगर चारों दिशाओं में चार-चार हजार योजन के विस्तार वाला एक विशाल वर्गाकार नगर है।
श्लोक 4
वैदूर्यमणिखचितं स्वर्णप्राकारसंवृतम्।
सौधैश्च विविधैश्चैव प्रासादैश्चोपशोभितम्॥४॥
हिंदी अनुवाद: वह नगर वैदूर्य मणियों से जड़ा हुआ है, सोने की विशाल चारदीवारी से घिरा है और उसमें भांति-भांति के दिव्य महल उपशोभित हैं।
श्लोक 5
तत्र वै चित्रगुप्तस्य विशालं गृहमुत्तमम्।
योजनानां सहस्रैस्तु मण्डितं सर्वतो दिशम्॥५॥
हिंदी अनुवाद: उस नगर के मध्य में भगवान चित्रगुप्त का एक अत्यंत उत्तम और विशाल महल है, जो हजारों योजन तक फैला हुआ है।
श्लोक 6
चित्रगुप्तस्य गेहे तु लिख्यन्ते सर्वदेहिनाम्।
शुभाशुभानि कर्माणि आयुर्मानादि सर्वशः॥६॥
हिंदी अनुवाद: चित्रगुप्त के उस भवन में संसार के सभी प्राणियों के शुभ-अशुभ कर्मों का लेखा-जोखा तथा उनकी आयु का परिमाण लिखा जाता है।
श्लोक 7
न तत्र मिथ्या भवति न च भ्रान्तिः कथञ्चन।
सर्वं प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा लिख्यते चित्रगुप्तकैः॥७॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ कोई झूठ या भ्रम नहीं होता। चित्रगुप्त जी सभी प्राणियों के कर्मों को प्रत्यक्ष देखकर सटीक रूप से अंकित करते हैं।
श्लोक 8
तत्र वै धर्माधिकारी यमराजः प्रतापनः।
धर्माधर्मप्रमाणज्ञो दण्डपाणिः समास्थितः॥८॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ धर्म और अधर्म का सत्य न्याय करने वाले, हाथ में दण्ड धारण किए हुए सर्वप्रतापी यमराज विराजमान रहते हैं।
श्लोक 9
सभा तु यमराजस्य शतयोजनविस्तृता।
तेजोमयी महाभाग सर्वकामसमन्विता॥९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! यमराज की वह सभा सौ योजन में फैली हुई है। वह अत्यंत तेजोमयी और समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली है।
श्लोक 10
न शोको न जरा तत्र न क्षुधार्तिर्न च व्यथा।
धर्मात्मनां सुखाधारा पापिनां भयदायिनी॥१०॥
हिंदी अनुवाद: उस सभा में न शोक है, न बुढ़ापा, न भूख-प्यास की पीड़ा और न ही कोई दुःख। वह सभा धर्मात्माओं को आनंद देने वाली और पापियों को भय देने वाली है।
श्लोक 11
तस्यां सभायामासीनः सूर्यपुत्रो यमो बली।
मुनिभिः सिद्धसङ्घैश्च स्तूयमानः समन्ततः॥११॥
हिंदी अनुवाद: उस सभा में महाबली सूर्यपुत्र यमराज विराजमान रहते हैं, जिनकी स्तुति चारों ओर से महर्षि और सिद्धगण करते हैं।
श्लोक 12
सामगा योगिनश्चैव तपस्विन जितेन्द्रियाः।
तत्र तिष्ठन्ति धर्मज्ञाः पूजयन्तो यमं प्रभुम्॥१२॥
हिंदी अनुवाद: सामवेद का गान करने वाले, योगी, जितेंद्रिय तपस्वी और धर्मशास्त्रज्ञ वहाँ उपस्थित होकर यमराज की पूजा करते हैं।
श्लोक 13
चतुर्द्वारसमाकीर्णा यमस्य सा सभा शुभा।
दक्षिणैश्चोत्तरैश्चैव पूर्वपश्चिमतस्तथा॥१३॥
हिंदी अनुवाद: यमराज की वह पावन सभा पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण—इन चारों दिशाओं में चार विशाल द्वारों से युक्त है।
श्लोक 14
पूर्वद्वारेण गच्छन्ति धर्मात्मानो महाधियः।
दानधर्मरताश्चैव विष्णुभक्तिपरायणाः॥१४॥
हिंदी अनुवाद: पूर्व द्वार से परम बुद्धिमान धर्मात्मा, दान-धर्म में लीन रहने वाले और भगवान विष्णु के भक्त प्रवेश करते हैं।
श्लोक 15
उत्तरद्वारेण गच्छन्ति वेदाध्ययनतत्पराः।
सत्यव्रताश्च मुनयो गंगास्नानपरानराः॥१५॥
हिंदी अनुवाद: उत्तर द्वार से वेदों का अध्ययन करने वाले, सत्यव्रती मुनि और पवित्र गंगाजी में स्नान करने वाले जन प्रवेश करते हैं।
श्लोक 16
पश्चिमद्वारेण गच्छन्ति ज्ञानिनो ब्रह्मवादिनः।
इष्टपूर्तरताश्चैव तपसा क्षीणकल्मषाः॥१६॥
हिंदी अनुवाद: पश्चिम द्वार से तत्त्वज्ञानी, ब्रह्मवादी, सामाजिक सेवा (इष्टपूर्त) करने वाले तथा तपस्या से पापमुक्त हुए जीव जाते हैं।
श्लोक 17
दक्षिणद्वारेण गच्छन्ति पापिष्ठाः क्रूरकर्मिणः।
असिपत्रवनादीनां यातनानां च भागिनः॥१७॥
हिंदी अनुवाद: दक्षिण द्वार से केवल महापापी और क्रूर कर्म करने वाले जीव जाते हैं, जो असिपत्रवन आदि भयंकर नरकों की यातनाएँ भोगते हैं।
श्लोक 18
पापिनां दर्शनं यस्य यमस्य चातिभीषणम्।
अञ्जनाद्रिसङ्काशं महिषस्थं महाबलम्॥१८॥
हिंदी अनुवाद: पापियों को यमराज का रूप अत्यंत भयानक दिखाई देता है—वे काजल के पर्वत के समान काले, विशाल भैंसे पर सवार और महाबली रूप में दिखते हैं।
श्लोक 19
पाशहस्तं महादंष्ट्रं रक्ताक्षं भयानकम्।
दृष्ट्वा पापेन सन्तप्ताः प्रकम्पन्ते भयतुराः॥१९॥
हिंदी अनुवाद: हाथ में पाश (फंदा) लिए, भयानक बड़े-बड़े दाँतों वाले और लाल आँखों वाले यमराज को देखकर पापी जीव भय से कांपने लगते हैं।
श्लोक 20
धर्मात्मनां तु दृश्येत यमः सौम्यमनोहरः।
चतुर्भुजः शङ्खचक्रगदापद्मधरो हरिः॥२०॥
हिंदी अनुवाद: परंतु धर्मात्माओं को यमराज का रूप अत्यंत सौम्य, सुंदर तथा शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए श्रीहरि के समान शांत दिखाई देता है।
श्लोक 21
तत्र कालश्च मृत्युश्च चित्रगुप्तश्च पार्षदाः।
स्वस्वकार्ये नियुक्ताश्च सर्वलोकानुशासिनः॥२१॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ काल, मृत्यु, चित्रगुप्त और यमराज के दूत अपने-अपने कार्यों में तत्पर रहकर समस्त लोकों पर शासन करते हैं।
श्लोक 22
श्रवणैश्च महाभाग दूतैः सर्वत्र संवृतः।
कुर्वन्ति सर्वभूतानां पापपुण्यपरीक्षणम्॥२२॥
हिंदी अनुवाद: हे महाभाग! 'श्रवण' नामक यमदूत सब जगह फैले रहते हैं, जो सभी प्राणियों के पाप और पुण्य का परीक्षण करते हैं।
श्लोक 23
श्रवणा नाम ये दूता सूर्यपुत्रस्य धीमतः।
चरन्ति पृथिवीं सर्वां मरुतो वायुवत् तथा॥२३॥
हिंदी अनुवाद: बुद्धिमान यमराज के 'श्रवण' नामक दूत वायु की भांति समस्त पृथ्वी पर निरंतर भ्रमण करते हैं।
श्लोक 24
मनसा कर्मणा वाचा यत्करोति शुभाशुभम्।
तत्सर्वं चित्रगुप्ताय कथयन्ति न संशयः॥२४॥
हिंदी अनुवाद: मनुष्य मन, वाणी और कर्म से जो भी शुभ या अशुभ करता है, वे दूत बिना किसी संदेह के सब कुछ चित्रगुप्त जी को बता देते हैं।
श्लोक 25
श्रवणीश्च तथा नारी दूत्यश्चैव समाहिताः।
स्त्रीणां चेष्टितं सर्वं जानन्ति ताः निरन्तरम्॥२५॥
हिंदी अनुवाद: इसी प्रकार 'श्रवणी' नाम की स्त्री यमदूतियाँ स्त्रियों के संपूर्ण आचरण और चेष्टाओं पर निरंतर दृष्टि रखती हैं।
श्लोक 26
तस्मात् पापं न कुर्वीत मनसा कर्मणापि वा।
सर्वं पश्यति धर्मज्ञो यमः सूर्यसुतो विभुः॥२६॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए मनुष्य को मन या कर्म से कभी पाप नहीं करना चाहिए, क्योंकि सूर्यपुत्र यमराज सब कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं।
श्लोक 27
यथा कर्म कृतं लोके यादृशं शुभमशुभम्।
तादृशं फलमश्नाति यमलोके गतो नरः॥२७॥
हिंदी अनुवाद: मनुष्य इस संसार में जैसा भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, यमलोक जाने पर उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है।
श्लोक 28
पुण्यात्मा पुण्यरूपेण सुखं प्राप्नोति तत्र वै।
पापी पापस्य पाकेन दुःखं प्राप्नोति दारुणम्॥२८॥
हिंदी अनुवाद: पुण्यात्मा जीव अपने पुण्यों के प्रभाव से वहाँ परम सुख प्राप्त करता है, जबकि पापी अपने पापों के फल स्वरूप भयंकर दुःख भोगता है।
श्लोक 29
दीर्घध्वनिं प्रकुर्वन्तः क्रन्दमानाः समन्ततः।
पापिनो यातनां भुक्त्वा यान्ति तिर्यक्त्वमादिषु॥२९॥
हिंदी अनुवाद: पापी जीव चारों ओर चीत्कार करते हुए भयंकर यातनाएँ भोगते हैं और तत्पश्चात् पशु-पक्षी आदि नीच योनियों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 30
ये पुनर्दत्तदानाश्च परोपकारिणो नराः।
ते यान्ति दिव्ययानैस्तु यमस्य नगरं शुभम्॥३०॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य दान देते हैं और परोपकार में रत रहते हैं, वे दिव्य विमानों पर बैठकर यमराज के पावन नगर में जाते हैं।
श्लोक 31
पुष्पकैश्च विमानैश्च गन्धर्वैर्गीयमानकैः।
पूजिता यमराजेन विशन्ति सुकृतालयाम्॥३१॥
हिंदी अनुवाद: गंधर्वों के गायन और पुष्पक विमानों के साथ पूजित होकर वे पुण्यत्मा यमराज द्वारा सम्मानित होते हैं और सुखद लोकों में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 32
तस्माद् धर्मं समाचरेत् सर्वदा मानवो भुवि।
धर्म एव सुहृद्बन्धुः परलोके सहायकृत्॥३२॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए मनुष्य को पृथ्वी पर सदा धर्म का आचरण करना चाहिए; क्योंकि परलोक में केवल धर्म ही सच्चा मित्र और बंधु बनकर सहायता करता है।
श्लोक 33
नाग्निर्न वायुर्न च बन्धुवर्गो न पुत्रदारा न च वित्तसञ्चयः।
परत्र गन्तुं पुरुषस्य सङ्गी धर्मो हि एकोऽनुगच्छति जन्तुम्॥३३॥
हिंदी अनुवाद: परलोक जाते समय न अग्नि, न वायु, न बंधु-बांधव, न स्त्री-पुत्र और न ही संचित धन साथ जाता है; केवल अकेला धर्म ही जीव के पीछे-पीछे जाता है।
श्लोक 34
धर्मेण लभते सर्वं धर्मेण लभते सुखम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्मं कुर्यात् सदा नरः॥३४॥
हिंदी अनुवाद: धर्म से सब कुछ प्राप्त होता है, धर्म से ही सुख मिलता है; अतः मनुष्य को सदा सर्वप्रयत्न करके धर्म का पालन करना चाहिए।
श्लोक 35
अहिंसा परमो धर्मस्तथा सत्यं परं तपः।
दया च परमो धर्मो दानं धर्मः सनातनः॥३५॥
हिंदी अनुवाद: अहिंसा परम धर्म है, सत्य परम तप है, दया परम धर्म है और दान ही सनातन धर्म माना गया है।
श्लोक 36
एष ते कथितं तार्क्ष्य यमस्य नगरं महत्।
सभा च धर्मराजस्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥३६॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! मैंने तुम्हें यमराज के विशाल नगर और उनकी धर्म सभा का वर्णन सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 37
गरुड़ उवाच
श्रुतं मया महाविष्णो यमस्य नगरं शुभम्।
सभा च धर्मराजस्य पापिनां भयकारिणी॥३७॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने यमराज के शुभ नगर और पापियों को भय देने वाली धर्मराज की सभा का वृत्तांत सुन लिया।
श्लोक 38
कथं पाैः प्रमुच्येत यमदण्डं न पश्यति।
तन्मे ब्रूहि कृपासिन्धो सर्वलोकाभयं प्रदे॥३८॥
हिंदी अनुवाद: हे कृपासिंधु! अब मुझे वह उपाय बताइए, जिससे मनुष्य सब पापों से छूट जाए और उसे कभी यमराज के दण्ड का सामना न करना पड़े?
श्लोक 39
श्रीभगवानुवाच
साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य सर्वलोकहितैषिणा।
पापनाशनमुपायं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे॥३९॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! तुमने सब लोकों के हित के लिए बहुत सुंदर प्रश्न पूछा है। अब मैं तुम्हें समस्त पापों को नष्ट करने वाला उपाय बतलाता हूँ, ध्यान से सुनो।
श्लोक 40
हरिभक्तिरतो नित्यं विष्णुनामपरायणः।
न पश्यति यमं घोरं न च यमपुरीं ययौ॥४०॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य नित्य भगवान हरि की भक्ति में लीन रहता है और विष्णु-नाम का जप करता है, वह न कभी भयंकर यमराज को देखता है और न कभी यमपुरी जाता है।
श्लोक 41
तुलसीकाष्ठमालां च धारयेद् यस्तु मानवः।
तस्य देहं न स्पृशति यमदूताः कदाचन॥४१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी की माला धारण करता है, उसके शरीर को यमदूत कभी स्पर्श भी नहीं कर सकते।
श्लोक 42
एकादशीव्रतं यस्तु करोति श्रद्धयाान्वितः।
स याति परमं स्थानं यत्र देवो जनार्दनः॥४२॥
हिंदी अनुवाद: जो श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत करता है, वह सीधे उस परम पद को प्राप्त करता है जहाँ भगवान जनार्दन निवास करते हैं।
श्लोक 43
गंगाजलौघसंसिक्तं शरीरं यस्य मानवः।
स पूतो विष्णुलोकं च गच्छत्येव न संशयः॥४३॥
हिंदी अनुवाद: जिसका शरीर गंगाजी के जल से सिंचित होता है, वह पवित्र होकर निसंदेह विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 44
विष्णुपादौदकं पीत्वा शिरसा धारयेत् तु यः।
तस्य पाप सहस्राणि नश्यन्त्येव न संशयः॥४४॥
हिंदी अनुवाद: जो चरणामृत पीता है और उसे सिर पर धारण करता है, उसके हजारों पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 45
श्रीमद्भागवतं शास्त्रं शृणोति नित्यमन्वहम्।
स मुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥४५॥
हिंदी अनुवाद: जो नित्य श्रीमद्भागवत शास्त्र का श्रवण करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 46
विष्णुनाम संकीर्तनं सर्वपापप्रणाशनम्।
पापिनामुद्धारकरं कल्पकोटिशतैरपि॥४६॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु का नाम-संकीर्तन सब पापों को नष्ट करने वाला है और सैकड़ों कल्पों के पापियों का भी उद्धार करने वाला है।
श्लोक 47
म्रियमाणो हरेर्नाम मुखे यस्य विजायते।
स याति परमं धाम यमदण्डं न पश्यति॥४७॥
हिंदी अनुवाद: अंत समय में जिसके मुख में 'हरि' नाम आता है, वह परम धाम को जाता है और यमदण्ड को कभी नहीं देखता।
श्लोक 48
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्।
संसारतारिणी भक्तिः सर्वदुःखविनाशिनी॥४८॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए; क्योंकि भक्ति ही संसार से तारने वाली है।
श्लोक 49
यमदूतैः न बाध्यन्ते विष्णुभक्ताः महाधियः।
पाशबद्ध न कुर्वन्ति दृष्ट्वा विष्णुचिह्नितम्॥४९॥
हिंदी अनुवाद: विष्णु के महान भक्त यमदूतों द्वारा कभी पीड़ित नहीं किए जाते। शरीर पर विष्णु के चिह्नों को देखकर यमदूत उन्हें कभी पाश में नहीं बांधते।
श्लोक 50
गोपीचन्दनलिप्तांगः तुलसीदलधारकः।
यमलोकं न पश्येत विष्णुलोकं स गच्छति॥५०॥
हिंदी अनुवाद: जो गोपीचंदन से अंग लिप्त रखता है और तुलसीदल धारण करता है, वह यमलोक को नहीं देखता, सीधे विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 51
यस्य हृदि स्थितो विष्णुः सत्यं शौचं दया तथा।
तस्य नश्यन्ति पापानि तमः सूर्योदये यथा॥५१॥
हिंदी अनुवाद: जिसके हृदय में भगवान विष्णु, सत्य, पवित्रता और दया स्थित हैं, उसके पाप सूर्योदय होने पर अंधकार की भांति नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 52
अनायासेन मरणं बिना दैन्येन जीवनम्।
देहि मे कृपया देव त्वयि भक्तिं च निश्चलाम्॥५२॥
हिंदी अनुवाद: हे प्रभु! मुझे बिना कष्ट का मरण, बिना दीनता का जीवन और आपके चरणों में अचल भक्ति प्रदान कीजिए।
श्लोक 53
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे यमपुरीनगरयात्रा-यमसभा वर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥५३॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'यमपुरी नगर यात्रा और यम सभा वर्णन' नामक बारहवां अध्याय पूर्ण हुआ।
श्लोक 54
हरिः ॐ तत्सत्कृष्णार्पणमस्तु॥५४॥
हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब संपूर्ण कर्म श्रीकृष्ण को समर्पित हैं।
श्लोक 55
नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥५५॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 56
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
पितुर्मातु मे सर्वमेवांग्रि युग्मं न जाने जाने न च देवमन्यम्॥५६॥
हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! आपके चरण कमल ही मेरे सब कुछ हैं, मैं आपके सिवा किसी अन्य देव को नहीं जानता।
श्लोक 57
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥५७॥
हिंदी अनुवाद: हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु हैं, आप ही सखा हैं, आप ही विद्या हैं और आप ही मेरा धन हैं।
श्लोक 58
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः।
त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥५८॥
हिंदी अनुवाद: हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्मों से युक्त हूँ; आप मेरे समस्त पापों का नाश करके मेरी रक्षा करें।
श्लोक 59
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥५९॥
हिंदी अनुवाद: हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई आश्रय नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए दया करके मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 60
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥६०॥
हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय या स्वभाव से जो कुछ भी कर्म मैं करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।
श्लोक 61
य इदं पठते नित्यं यमसभा वर्णनं स्तवम्।
न तस्य यमलोकश्च न च नरकपातनम्॥६१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस यम सभा वर्णन का नित्य पाठ करता है, उसे यमलोक की यातना नहीं मिलती और न ही वह नरक में गिरता है।
श्लोक 62
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते॥६२॥
हिंदी अनुवाद: इसके प्रभाव से पुत्रहीन को पुत्र, दरिद्र को धन मिलता है तथा वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजित होता है।
श्लोक 63
विष्णुभक्तिं समाश्रित्य यः करोति शुभां क्रियाम्।
तस्य पापं क्षयं याति पदं प्राप्नोति वैष्णवम्॥६३॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु की भक्ति का आश्रय लेकर जो शुभ कर्म करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और वह परम वैष्णव पद प्राप्त करता है।
श्लोक 64
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥६४॥
हिंदी अनुवाद: हे सर्वमंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला माँ नारायणी! आपको नमस्कार है।
श्लोक 65
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥६५॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि कल्याणप्रद हैं।
श्लोक 66
सर्वथा सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।
येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥६६॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में मंगल के धाम भगवान श्रीहरि बसे हैं, उनके किसी भी कार्य में कभी कोई अमंगल नहीं होता।
श्लोक 67
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥६७॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में श्यामवर्ण भगवान जनार्दन स्थित हैं, उन्हीं की विजय और लाभ है; उनकी कभी पराजय नहीं होती।
श्लोक 68
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥६८॥
हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, वैभव और अचल नीति है।
श्लोक 69
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥६९॥
हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से पृथ्वी का पालन करें, गो-ब्राह्मणों का नित शुभ हो और संपूर्ण संसार सुखी हो।
श्लोक 70
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।
देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥७०॥
हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न से हरी-भरी रहे, यह देश उपद्रव से रहित हो और सभी निर्भय रहें।
श्लोक 71
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥७१॥
हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सब कल्याण देखें और कोई दुःखी न हो।
श्लोक 72
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥७२॥
हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति हो।
श्लोक 73
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥७३॥
हिंदी अनुवाद: हम नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे भगवान विष्णु हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
श्लोक 74
विष्णुः सर्वेश्वरः श्रीमान् सर्वभूतहितैषिणः।
तस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥७४॥
हिंदी अनुवाद: सर्वेश्वर, श्रीमान और समस्त प्राणियों का हित चाहने वाले भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 75
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥७५॥
हिंदी अनुवाद: अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव और जानकीनाथ रामचंद्र जी का मैं भजन करता हूँ।
श्लोक 76
शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥७६॥
हिंदी अनुवाद: जिनकी आकृति शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवों के देव हैं, संपूर्ण जगत् के आधार हैं, आकाश के समान सर्वव्यापी हैं, मेघ के समान जिनका वर्ण है, जिनके अंग सुंदर हैं, लक्ष्मी के पति हैं, कमल के समान नेत्र वाले हैं, योगियों द्वारा ध्यान में प्राप्त किए जाते हैं, जो संसार के भय को हरने वाले और समस्त लोकों के स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 77
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः॥७७॥
हिंदी अनुवाद: सत्, चित् और आनंद स्वरूप, संपूर्ण संसार की उत्पत्ति आदि के कारण तथा तीनों प्रकार के तापों का नाश करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं।
श्लोक 78
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।
अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा॥७८॥
हिंदी अनुवाद: मनुष्य चाहे पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी दशा में क्यों न हो, जो कमलनेत्र भगवान विष्णु का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से पवित्र हो जाता है।
श्लोक 79
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे॥७९॥
हिंदी अनुवाद: जिनके स्मरण मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के संसार बंधन से मुक्त हो जाता है, उन प्रभावशाली भगवान विष्णु को नमस्कार है।
श्लोक 80
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते॥८०॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव के भक्तों का कहीं भी अमंगल नहीं होता। उन्हें जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारियों का भय कभी नहीं होता।
श्लोक 81
सर्ववेदेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम्।
तत्फलं समवाप्नोति विष्णुनामप्रकीर्तनात्॥८१॥
हिंदी अनुवाद: सब वेदों के पाठ से जो पुण्य और सब तीर्थों के स्नान से जो फल मिलता है, वही फल भगवान विष्णु के नाम-संकीर्तन से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 82
नामावलिं इमां नित्यं यः पठेद्भक्तिभावतः।
न तस्य यमलोके दुःखं विष्णुलोकं स गच्छति॥८२॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस नामावली का भक्ति से नित्य पाठ करता है, उसे यमलोक में दुःख नहीं मिलता और वह सीधे विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 83
गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥८३॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ और श्रवण से जीव सब पापों से मुक्त होकर अंत में परम पद विष्णुलोक प्राप्त करता है।
श्लोक 84
यद् अक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते॥८४॥
हिंदी अनुवाद: हे नारायण! पाठ में जो भी अक्षर, पद या मात्रा की भूल हुई हो, उसे क्षमा करें, आपको बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 85
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥८५॥
हिंदी अनुवाद: हे परमेश्वर! मेरे द्वारा दिन-रात सहस्रों अपराध होते रहते हैं, मुझे अपना दास मानकर क्षमा कीजिए।
श्लोक 86
इति द्वादशोऽध्यायः सम्पूर्णः॥८६॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार गरुड़ पुराण का द्वादश (बारहवां) अध्याय सम्पूर्ण हुआ।
श्लोक 87
॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥८७॥
हिंदी अनुवाद: परम सत्य स्वरूप श्री हरि को नमन।
श्लोक 88
॥ श्रीकृष्णार्यमस्तु ॥८८॥
हिंदी अनुवाद: यह संपूर्ण पाठ श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित है।
श्लोक 89
॥ जगत् कल्याणं भवतु ॥८९॥
हिंदी अनुवाद: संपूर्ण जगत् का कल्याण हो।
श्लोक 90
॥ इति शुभम् ॥९०॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ और कल्याणकारी हो।