गरुड़ पुराण एकादश अध्याय: संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
श्लोक 1
गरुड़ उवाच एकादशेऽह्नि यत्कृत्यं सपिण्डीकरणं तथा। तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि ब्रूहि मे पुरुषोत्तम॥१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे पुरुषोत्तम! ग्यारहवें दिन किए जाने वाले कृत्य तथा सपिंडीकरण संस्कार के विषय में मैं सुनना चाहता हूँ, कृपया मुझे बतलाइए।
श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डीकरणं शुभम्। येन भुक्त्वा प्रेतभावं मुच्यते सर्वपातकैः॥२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं शुभ सपिंडीकरण संस्कार का वर्णन करता हूँ, जिससे जीव प्रेतभाव से मुक्त होकर सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 3
अशौचाद् व्यतीपाते तु दशमेऽह्नि समापिते। एकादशेऽह्नि कुर्वीत वृषोत्सर्गं सपिण्डनम्॥३॥
हिंदी अनुवाद: दस दिनों का अशौच (सूतक) समाप्त होने पर, ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग और सपिंडीकरण संस्कार करना चाहिए।
श्लोक 4
एकादशेऽह्नि प्राप्त तु स्नात्वा नद्यां तटाकके। स्रानं कृत्वा विधानेन प्रेतस्य निष्कृतिं चरेत्॥४॥
हिंदी अनुवाद: ग्यारहवें दिन नदी या तालाब में स्नान करके, शास्त्रीय विधान से प्रेत की मुक्ति के लिए सभी कर्म करने चाहिए।
श्लोक 5
एकान्नविंशतिं पिण्डान् दद्यात्प्रेतस्य मुक्तये। एकादशेऽह्नि कर्तव्यं विधानं शृणु तार्क्ष्य मे॥५॥
हिंदी अनुवाद: प्रेत की मुक्ति के लिए कुल उन्नीस पिंड देने चाहिए। हे गरुड़! ग्यारहवें दिन किए जाने वाले विधान को मुझसे सुनो।
श्लोक 6
एकोद्दिष्टं च कर्तव्यं प्रेतमुद्दिश्य सर्वदा। एकः पिण्डो विधातव्यो ह्येकोद्दिष्टे विधानतः॥६॥
हिंदी अनुवाद: प्रेत को उद्देश्य करके एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिए। एकोद्दिष्ट विधि में केवल एक ही पिंड विधानपूर्वक दिया जाता है।
श्लोक 7
आवाहनं च नार्घ्यं च नाग्नौकरणमेव च। एकोद्दिष्टे न कुर्वीत विश्वांदेवांश्च तर्पणे॥७॥
हिंदी अनुवाद: एकोद्दिष्ट श्राद्ध में आवाहन, अर्घ्य, अग्नौकरण और विश्वेदेवों का तर्पण नहीं किया जाता।
श्लोक 8
ततस्तु द्वादशेऽह्नि प्राप्ते सपिण्डीकरणं स्मृतम्। संवत्सरे वा कुर्वीत पूर्णेषु दिवसेषु च॥८॥
हिंदी अनुवाद: इसके पश्चात् बारहवें दिन सपिंडीकरण करना चाहिए, अथवा एक वर्ष पूरा होने पर (या इच्छानुसार छह माह/तीन माह पर) इसे किया जा सकता है।
श्लोक 9
सपिण्डीकरणं यावत् न क्रियते नरैः क्वचित्। तावत्प्रेतो भवेद् जन्तुः न च पितृगणं व्रजेत्॥९॥
हिंदी अनुवाद: जब तक मनुष्य सपिंडीकरण संस्कार नहीं करता, तब तक जीव प्रेत रूप में रहता है और पितृगणों में सम्मिलित नहीं हो पाता।
श्लोक 10
सपिण्डीकरणे जाते प्रेतभावः प्रणश्यति। पितृलोकं ततो याति पूज्यते पितृभिः सह॥१०॥
हिंदी अनुवाद: सपिंडीकरण संपन्न हो जाने पर जीव का प्रेतभाव नष्ट हो जाता है। तत्पश्चात् वह पितृलोक जाता है और पितरों के साथ पूजित होता है।
श्लोक 11
चत्वार्युदकपात्राणि पात्रान्ते विनियोजयेत्। त्रिभिः पितॄणां पात्रैस्तु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत्॥११॥
हिंदी अनुवाद: पूजन में चार जलपात्र स्थापित करें। उनमें से तीन पात्र (पिता, पितामह, प्रपितामह) पितरों के होते हैं और चौथे प्रेतपात्र के जल को उन तीनों में मिला दिया जाता है।
श्लोक 12
ये समाना इति द्वाभ्यां मन्त्रāb्यां च सेचयेत्। सपिण्डीकरणं कार्यं प्रेतस्य पितृभिः सह॥१२॥
हिंदी अनुवाद: 'ये समाना' इत्यादि दो मंत्रों का उच्चारण करते हुए प्रेतपात्र के जल को पितृपात्रों में सींचे। इस प्रकार प्रेत का पितरों के साथ सपिंडीकरण करे।
श्लोक 13
पिण्डोऽपि च तथैव स्यात् त्रिधा कृत्वा तु प्रेतकम्। पितृपिण्डेषु संयोज्य मन्त्रैः शास्त्रादिदर्शितैः॥१३॥
हिंदी अनुवाद: उसी प्रकार प्रेत के पिंड के तीन भाग करके, शास्त्रोक्त मंत्रों द्वारा उन्हें पिता, पितामह और प्रपितामह के पिंडों में मिला दे।
श्लोक 14
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः। एतैः सह समायोगो ज्ञेयः सपिण्डता बुधैः॥१४॥
हिंदी अनुवाद: पिता, पितामह (दादा) और प्रपितामह (परदादा)—इन तीनों के पिंडों में प्रेत के पिंड का समायोग (मिलन) ही विद्वानों द्वारा सपिंडीकरण कहा गया है।
श्लोक 15
मातामहानां च कार्यं सपिण्डीकरणं तथा। पितृवत्सर्वमेवेह कर्तव्यं तु सुतैः सदा॥१५॥
हिंदी अनुवाद: इसी प्रकार मातामह (नाना-नानी के पक्ष) का भी सपिंडीकरण करना चाहिए। पुत्रों को चाहिए कि वे पितृ पक्ष की भांति ही सब कर्म करें।
श्लोक 16
पुत्रेण तु कृतं कर्म प्रेतस्य सुखावहम्। पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् तदभावे च सोदरः॥१६॥
हिंदी अनुवाद: पुत्र द्वारा किया गया यह कर्म प्रेत के लिए सुखदायक होता है। पुत्र न होने पर पत्नी और पत्नी के अभाव में सगा भाई यह अधिकार रखता है।
श्लोक 17
सपिण्डीकरणे सिद्धे प्रेतः पितृगणं व्रजेत्। विमानं सूर्यसङ्काशं मारुतेन समाहृतम्॥१७॥
हिंदी अनुवाद: सपिंडीकरण सिद्ध होने पर प्रेत पितृगणों में मिल जाता है और वायु द्वारा संचालित, सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर सवार होता है।
श्लोक 18
ततः प्रमुदितो जीवः पितृलोके महीयते। भुङ्क्ते च सर्वभोगांश्च यावदाभूतसम्प्लवम्॥१८॥
हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात् प्रसन्न होकर वह जीव पितृलोक में प्रतिष्ठित होता है और प्रलयकाल तक वहाँ के समस्त दिव्य भोगों को भोगता है।
श्लोक 19
यदि न क्रियते तार्क्ष्य सपिण्डीकरणं खग। सदा प्रेतत्वमापन्नो वनमध्ये निरन्तरम्॥१९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! यदि सपिंडीकरण न किया जाए, तो जीव सदा प्रेत रूप में बना रहता है और जंगल आदि भयानक स्थानों में भटकता रहता है।
श्लोक 20
क्षुत्पिपासासमाक्रान्तो भ्राम्यते जगतीतले। सन्ततानि च दुःखानि लभते ह्यकृतक्रियः॥२०॥
हिंदी अनुवाद: क्रियाहीन जीव भूख और प्यास से पीड़ित होकर इस पृथ्वी पर भटकता है और निरंतर दुखों को प्राप्त करता है।
श्लोक 21
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सपिण्डीकरणं चरेत्। पुत्रेण भ्रातृपुत्रेण सपिण्डेन चापि वा॥२१॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके पुत्र, भतीजे या किसी सपिंड गोत्रज द्वारा सपिंडीकरण संस्कार अवश्य करवाना चाहिए।
श्लोक 22
संवत्सरान्ते यत्कार्यं तत्कुर्याद् द्वादशेऽहनि। अनित्यत्वात्तु मत्यानां कालो ह्यत्र न कारणम्॥२२॥
हिंदी अनुवाद: जो कार्य एक वर्ष बाद करने का विधान है, उसे मनुष्य के जीवन की अनिश्चितता के कारण बारहवें दिन ही कर लेना चाहिए, क्योंकि मृत्यु का कोई भरोसा नहीं है।
श्लोक 23
वृषोत्सर्गं ततः कुर्यात् एकादशेऽह्नि यत्नतः। येन मुच्येत प्रेतत्वं सर्वदुःखाच्च पापिनाम्॥२३॥
हिंदी अनुवाद: ग्यारहवें दिन विशेष यत्नपूर्वक वृषोत्सर्ग (सांड का दान/त्याग) करना चाहिए, जिससे पापियों का भी प्रेतत्व और समस्त दुख दूर हो जाते हैं।
श्लोक 24
नीलवृषं शुभं लक्षणसंयुतम्। पूजयित्वा विधानेन मुञ्चेत्प्रेतस्य मुक्तये॥२४॥
हिंदी अनुवाद: सुंदर लक्षणों से युक्त नील वृषभ का पूजन करके प्रेत की मुक्ति के लिए उसे मुक्त (उत्सर्ग) करना चाहिए।
श्लोक 25
वृषस्य लक्षणं तार्क्ष्य शृणुष्व गदतो मम। रक्तवर्णो मुखे पुच्छे पादे श्वेतश्च यो भवेत्॥२५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! वृषभ के लक्षण मुझसे सुनो—जिसका मुख, पूँछ और पैर श्वेत हों तथा शेष शरीर लाल वर्ण का हो, वही नील वृष कहलाता है।
श्लोक 26
एवंविधं वृषं मुक्त्वा प्रेतः स्वर्गतिमाप्नुयात्। तापिताश्चापि पितरस्तस्य यान्ति परां गतिम्॥२६॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार के वृष का उत्सर्ग करने से प्रेत सद्गति को प्राप्त होता है और उसके तपे हुए (दुखी) पितर भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 27
दश सुवर्णानि वा दद्यात् तदर्धं वा तदर्धकम्। तदर्धमपि वा दद्यात् विप्राय वेदविदे तथा॥२७॥
हिंदी अनुवाद: इसके अतिरिक्त वेदपाठी ब्राह्मण को दस सुवर्ण, उसका आधा, उसका भी आधा या शक्ति अनुसार दान देना चाहिए।
श्लोक 28
शय्यां चैव तथा दद्यात् सर्वोपस्करसंयुताम्। सोपधानां सोत्तराच्छेदां हैमं पुरुषसंयुताम्॥२८॥
हिंदी अनुवाद: तकिया, ओढ़ने के वस्त्र और स्वर्णपुरुष (सोने की मूर्ति) से युक्त तथा उपयोग की समस्त वस्तुओं से सुसज्जित शय्या (बिस्तर) दान करनी चाहिए।
श्लोक 29
शय्यादानेन देवेशि प्रेतः स्वर्गतिमाप्नुयात्। न करोति च यः शय्यां तस्य प्रेतत्वमक्षयम्॥२९॥
हिंदी अनुवाद: शय्या दान करने से प्रेत उत्तम लोक में जाता है। जो शय्या दान नहीं करता, उसका प्रेतत्व लंबे समय तक समाप्त नहीं होता।
श्लोक 30
पादुके वसनं छत्रं मुद्रिकां च कमण्डलुम्। ब्राह्मणाय प्रदातव्यं प्रेतस्य तु हिताय वै॥३०॥
हिंदी अनुवाद: प्रेत के कल्याण के लिए जूते, वस्त्र, छाता, अंगूठी और कमंडल ब्राह्मण को दान करने चाहिए।
श्लोक 31
यद्यदिष्टतमं लोके यच्चापि दयितं गृहे। तत्तद्गुणवते देयं प्रेतस्य प्रियमिच्छता॥३१॥
हिंदी अनुवाद: जो वस्तु लोक में अत्यंत प्रिय हो और जो घर में प्रिय लगती हो, प्रेत का प्रिय चाहने वाले को वह सब गुणवान ब्राह्मण को देना चाहिए।
श्लोक 32
अन्नं च बहु प्रदातव्यं जलं च शीतलप्रभम्। तृषार्तानां च प्रेतानां तदा तृप्तिः प्रजायते॥३२॥
हिंदी अनुवाद: प्रचुर मात्रा में अन्न और शीतल जल का दान करना चाहिए, जिससे भूख-प्यास से पीड़ित प्रेत को परम तृप्ति मिलती है।
श्लोक 33
पाथेयं प्रेतमार्गस्य दानमेव न संशयः। अदत्तदानो पापिष्ठो याति दुःखं सुदारुणम्॥३३॥
हिंदी अनुवाद: परलोक के लंबे मार्ग में दान ही प्रेत का पाथेय (मार्ग का भोजन/संबल) बनता है। दान न देने वाला पापी जीव भयंकर दुख पाता है।
श्लोक 34
तस्माद् दानं प्रदातव्यं वित्तशाठ्यं न कारयेत्। अज्ञानेन कृतं पापं दानेन ह्युपशाम्यति॥३४॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए धन का संकोच (कंजूसी) न करते हुए दान देना चाहिए। अज्ञानवश किए गए पाप भी दान से शांत हो जाते हैं।
श्लोक 35
एकादशेऽह्नि यद् दानं ददाति प्रेतमुक्तये। तत्सर्वं सफलं याति प्रेतश्च सुखी भवेत्॥३५॥
हिंदी अनुवाद: ग्यारहवें दिन प्रेत की मुक्ति के लिए जो भी दान दिया जाता है, वह सब सफल होता है और प्रेत सुखी हो जाता है।
श्लोक 36
गरुड़ उवाच सपिण्डीकरणे जाते यत्कर्तव्यं ततो मुने। वर्षमध्ये च यत्कार्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥३६॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे जनार्दन! सपिंडीकरण पूरा हो जाने के बाद तथा वर्ष भर के भीतर जो कार्य करने योग्य हैं, वे मुझे बताइए।
श्लोक 37
श्रीभगवानुवाच सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रतिमासं च मासिकम्। कर्तव्यं विधिना सम्यक् प्रेतस्य तु हिताय वै॥३७॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—सपिंडीकरण के पश्चात् प्रेत के कल्याण के लिए प्रतिमास विधिपूर्वक मासिक श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 38
ऊनषाण्मासिकं चैव तथैव ऊनवार्षिकम्। वर्षे पूर्णे च कर्तव्यं वार्षिकं श्राद्धमुत्तमम्॥३८॥
हिंदी अनुवाद: इसके अलावा ऊनषाण्मासिक (छह माह से पूर्व), ऊनवार्षिक (वर्ष से पूर्व) और वर्ष पूरा होने पर उत्तम वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 39
एवमष्टौ च पिण्डांस्तु दद्यात्प्रेतस्य सर्वदा। ततस्तु पितृभावं च प्राप्नोति नात्र संशयः॥३९॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार वर्ष भर में दिए जाने वाले पिंडों से जीव निश्चित ही पूर्णतः पितृभाव को प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 40
वार्षिके समनुप्राप्ते यः करोति न मानवः। तस्य पितरः सर्वे पतन्ति नरके ध्रुवम्॥४०॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य वर्ष पूरा होने पर वार्षिक श्राद्ध नहीं करता, उसके सभी पितर निश्चित ही नरक में गिरते हैं।
श्लोक 41
पुत्रः पौत्रश्च प्रपौत्रो वापि सहोदरः। श्राद्धं कुर्वन्ति ये प्रेते ते यान्ति परमां गतिम्॥४१॥
हिंदी अनुवाद: पुत्र, पोता, परपोता अथवा सगा भाई—जो भी प्रेत के लिए यह श्राद्ध करते हैं, वे स्वयं भी परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 42
मातापित्रोस्तु यत्कर्तव्यं सुतैः सर्वैश्च सर्वदा। तस्यानृण्यं न गच्छेच्च कल्पकोटिशतैरपि॥४२॥
हिंदी अनुवाद: माता-पिता के लिए पुत्रों को सदैव यह कर्तव्य करना चाहिए; क्योंकि सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी कोई माता-पिता के ऋण से मुक्त नहीं हो सकता।
श्लोक 43
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मातापित्रोः सपिण्डनम्। कर्तव्यं तु सुतैः नित्यं भक्तिभावसमन्वितैः॥४३॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए पुत्रों को चाहिए कि वे भक्तिभाव से युक्त होकर सर्वथा अपने माता-पिता का सपिंडीकरण और श्राद्ध कर्म करें।
श्लोक 44
पितृभक्त्या तु भगवान् विष्णुरिष्यति सर्वदा। तस्मात् पितृसमं नास्ति दैवतं परमं भुवि॥४४॥
हिंदी अनुवाद: पितृभक्ति से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न होते हैं। अतः इस पृथ्वी पर माता-पिता के समान कोई दूसरा बड़ा देवता नहीं है।
श्लोक 45
सपिण्डीकरणं चैव यः शृणोति पठत्यपि। सोऽपि सर्वपापैर्मुक्तो विष्णुलोकं च गच्छति॥४५॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सपिंडीकरण के इस प्रसंग को सुनता है अथवा पढ़ता है, वह भी सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 46
एतत् ते कथितं तार्क्ष्य एकादशाह कृत्यकम्। सपिण्डीकरणं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥४६॥
हिंदी अनुवाद: भगवान बोले—हे गरुड़! मैंने तुम्हें ग्यारहवें दिन के कृत्य और दिव्य सपिंडीकरण का वर्णन सुना दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 47
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे एकादशोऽध्यायः॥४७॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'सपिंडीकरण संस्कार' नामक ग्यारहवां अध्याय पूर्ण हुआ।
श्लोक 48
हरिः ॐ तत्सत्कृष्णार्पणमस्तु॥४८॥
हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्रीकृष्ण को समर्पित है।
श्लोक 49
नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥४९॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 50
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव। पितुर्मातु मे सर्वमेवांग्रि युग्मं न जाने जाने न च देवमन्यम्॥५०॥
हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! आपके चरण कमल ही मेरे माता-पिता और सब कुछ हैं, मैं आपके सिवा किसी अन्य देव को नहीं जानता।
श्लोक 51
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥५१॥
हिंदी अनुवाद: हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु हैं, आप ही सखा हैं, आप ही विद्या हैं और आप ही मेरा धन हैं।
श्लोक 52
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः। त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥५२॥
हिंदी अनुवाद: 'हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्मों से युक्त हूँ, आप मेरे समस्त पापों का नाश करके मेरी रक्षा करें।'
श्लोक 53
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥५३॥
हिंदी अनुवाद: 'हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई आश्रय नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए दया करके मेरी रक्षा कीजिए।'
श्लोक 54
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्। करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥५४॥
हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय या स्वभाव से जो कुछ भी कर्म मैं करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।
श्लोक 55
य इदं पठते नित्यं सपिण्डीकरण स्तवम्। न तस्य प्रेतता कापि पितृलोकं च गच्छति॥५५॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस पाठ का नित्य अध्ययन करता है, वह कभी प्रेत योनि में नहीं पड़ता और सीधे पितृलोक को जाता है।
श्लोक 56
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥५६॥
हिंदी अनुवाद: हे सर्वमंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला माँ नारायणी! आपको नमस्कार है।
श्लोक 57
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः। मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥५७॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि कल्याणप्रद हैं।
श्लोक 58
सर्वथा सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥५८॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में मंगल के धाम भगवान श्रीहरि बसे हैं, उनके किसी भी कार्य में कभी कोई अमंगल नहीं होता।
श्लोक 59
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥५९॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में श्यामवर्ण भगवान जनार्दन स्थित हैं, उन्हीं की विजय और लाभ है; उनकी कभी पराजय नहीं होती।
श्लोक 60
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥६०॥
हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, वैभव और अचल नीति है।
श्लोक 61
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः। गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥६१॥
हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से पृथ्वी का पालन करें, गो-ब्राह्मणों का नित शुभ हो और संपूर्ण संसार सुखी हो।
श्लोक 62
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥६२॥
हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सब कल्याण देखें और कोई दुःखी न हो।
श्लोक 63
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥६३॥
हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति हो।
श्लोक 64
॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥६४॥
हिंदी अनुवाद: परम सत्य स्वरूप श्री हरि को नमन।
श्लोक 65
॥ इति शुभम् ॥६५॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ और कल्याणकारी हो।