अध्याय 10 का विवरण (Chapter Description)
गरुड़ पुराण सारोद्धार के दशम अध्याय (सपिंडीकरण और एकादशाह विधान) में मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों का विस्तृत वर्णन किया गया है:
सपिंडीकरण का विधान: ग्यारवें दिन (या निर्धारित समय पर) प्रेत शरीर की निवृत्ति और पितृगणों में जीव के मिलन के लिए सपिंडता कर्म का विधान।
पिंड विभाजन और संयोजन: चार पिंडदानों की रचना—एक प्रेत का और तीन पितरों (पिता, दादा, परदादा) के लिए, तथा प्रेत पिंड को पितृ पिंडों में मिलाने की प्रक्रिया (मंत्रपूत जल के साथ)।
दान और कर्म: यममार्ग की शांति के लिए वैतरणी नदी के निमित्त गौदान, शैया दान, वस्त्र दान और ब्राह्मण भोजन का महत्व।
प्रेतत्व से मुक्ति: इस संस्कार के संपन्न होने से जीव का प्रेत योनि से छूटकर शाश्वत पितृलोक को प्राप्त होने का वर्णन।
[श्लोक 1]
गरुड़ उवाच
श्रुतं मया महाविष्णो दशगात्रस्य वै विधिम्।
सपिण्डीकरणं ब्रूहि कथमस्य च लक्षणम् ॥१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने दशगात्र की विधि सुन ली। अब सपिंडीकरण का विधान और उसका लक्षण विस्तार से बताइए।
[श्लोक 2]
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डीकरणं शुभम्।
यत्कृतेन नरो याति पितृलोकं स शाश्वतम् ॥२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं शुभ सपिंडीकरण की विधि कहता हूँ, जिसके करने से मनुष्य शाश्वत पितृलोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 3]
एकादशेऽहनि प्राप्ते कर्तव्यं तु सपिण्डनम्।
येन प्रेतत्वमुत्सृज्य पितृत्वं लभते नरः ॥३॥
हिंदी अनुवाद: ग्यारवां दिन प्राप्त होने पर सपिंडन (सपिंडीकरण) कर्म करना चाहिए, जिससे जीव प्रेतत्व को छोड़कर पितृत्व को प्राप्त करता है।
[श्लोक 4]
चत्वारः पिण्डकाः कार्याः श्रुत्योक्तविधानतः।
प्रेतस्य चैव पितॄणां च पृथक् पृथक् विभागशः ॥४॥
हिंदी अनुवाद: श्रुति के बताए विधान के अनुसार चार पिंडदान करने चाहिए—एक प्रेत का और तीन पितरों (पिता, दादा, परदादा) के अलग-अलग विभाग करके।
[श्लोक 5]
प्रेतपिण्डं द्विधा कृत्वा पितृपिण्डेषु योजयेत्।
ततः सपिण्डता क्रियते मन्त्रपूतेन वारिणा ॥५॥
हिंदी अनुवाद: प्रेत के पिंड को दो भाग करके पितरों के पिंडों में मिला देना चाहिए। इसके पश्चात मंत्रपूत जल से सपिंडता की जाती है।
[श्लोक 6]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 7]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 8]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 9]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 10]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 11]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥११॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 12]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 13]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 14]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 15]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 16]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 17]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 18]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 19]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥१९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 20]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 21]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 22]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 23]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 24]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 25]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 26]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 27]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 28]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 29]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥२९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 30]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 31]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 32]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 33]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 34]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 35]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 36]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 37]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 38]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 39]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥३९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 40]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 41]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 42]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 43]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 44]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 45]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 46]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 47]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 48]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 49]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥४९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 50]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 51]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 52]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 53]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 54]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 55]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 56]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 57]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 58]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 59]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥५९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 60]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 61]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 62]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 63]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 64]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 65]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 66]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 67]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 68]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 69]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥६९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 70]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 71]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 72]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 73]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७३॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 74]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 75]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 76]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 77]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 78]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 79]
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि सपिण्डनविधिं परम्।
येन प्रेतो विमुच्येत याति लोकं पितुः शुभम् ॥७९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! सुनो, अब मैं उस उत्तम सपिंडन विधि को कहता हूँ, जिससे प्रेत मुक्त होकर अपने पिता के शुभ लोक को प्राप्त होता है।
[श्लोक 80]
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे सपिण्डीकरणविधानं नाम दशमोऽध्यायः ॥८०॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'सपिंडीकरण और एकादशाह विधान' नामक दसवां अध्याय संपूर्ण हुआ।