गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीहरि गरुड़ जी को पापी आत्मा के शरीर छोड़ने के बाद यमलोक के 86,000 योजन लंबे मार्ग, रास्ते में पड़ने वाले 16 नगरों, वैतरणी नदी और विभिन्न प्रकार की यातनाओं का संपूर्ण विवरण सुनाते हैं।
गरुड़ पुराण द्वितीय अध्याय: 1 से 100 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
श्लोक 1
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि यममार्गं सुदारुणम्।
येन गच्छन्ति पापात्मा यमलोकं सुदुःखिताः॥१॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें अत्यंत कठिन और भयानक यमलोक के मार्ग का वर्णन सुनाता हूँ, जिस पर पापी जीव अत्यंत दुःखी होकर यमपुरी की यात्रा करते हैं।
श्लोक 2
म्रियमाणे तथा देहे पापिनां पातकैः कृतैः।
यमदूताः समायान्ति भयं कराः सुदारुणाः॥२॥
हिंदी अनुवाद: जब पापी मनुष्य का अंतिम समय आता है, तब उसके घोर पापों के कारण अत्यंत भयंकर और डरावने रूप वाले यमदूत उसे लेने आते हैं।
श्लोक 3
पाशहस्ता महाकाया दंष्ट्राकरालवदनाः।
कृष्णवर्णा महात्मानो नखशस्त्रधराश्च ह॥३॥
हिंदी अनुवाद: वे यमदूत हाथों में पाश (रस्सी) लिए रहते हैं, उनका शरीर बहुत विशाल होता है, बड़े-बड़े भयानक दाँत, काला रंग और नुकीले नाखून ही उनके हथियार होते हैं।
श्लोक 4
ततो देहात्समुत्कृत्य यातनादेहसंयुतम्।
पाशेन बद्ध्वा गच्छन्ति ताडयन्तो मुहुर्मुहुः॥४॥
हिंदी अनुवाद: वे दूत उस जीव के यातना (सूक्ष्म) शरीर को स्थूल शरीर से बाहर खींच लेते हैं और गले में पाश बाँधकर उसे बार-बार पीटते हुए ले जाते हैं।
श्लोक 5
हा हा कृत्वा रुदंतं च ताडयन्ति ततो दूतः।
क्रोशमात्रं ततो गत्वा हाहाकारं करोत्यसौ॥५॥
हिंदी अनुवाद: वह जीव डर के मारे 'हा-हा' करता हुआ रोता है, परंतु यमदूत उसे मारते-पीटते हैं। एक कोस आगे बढ़ते ही वह जीव महादुःख से हाहाकार करने लगता है।
श्लोक 6
तप्तबालुकसंकीर्णं तप्तताम्रसमं तथा।
दह्यमानं पदैः पापैः गच्छत्यार्तस्वरं नदन्॥६॥
हिंदी अनुवाद: यमलोक का मार्ग अत्यंत तपती हुई बालू (रेत) और गर्म तांबे जैसी भूमि से ढका होता है। उस पर नंगे पैर चलते हुए जीव के पैर जलने लगते हैं और वह चिल्लाता हुआ आगे बढ़ता है।
श्लोक 7
न च च्छाया न विश्रामो न च पानीयमेव च।
सूर्यरश्मिभिराप्तोऽसौ यमलोकं प्रपद्यते॥७॥
हिंदी अनुवाद: रास्ते में न कहीं कोई छाया है, न विश्राम की जगह और न ही पानी। सूरज की भयंकर धूप में तपता हुआ वह जीव यमलोक की ओर धकेला जाता है।
श्लोक 8
श्वभिः क्रौञ्चैश्च काकैश्च भक्ष्यमाणो मुहुर्मुहुः।
कंटकैर्भिन्नसर्वाङ्गो गच्छत्येव सुदुःखितः॥८॥
हिंदी अनुवाद: रास्ते में यमलोक के भयानक कुत्ते, गिद्ध और कौए उस पापी जीव के मांस को नोच-नोच कर खाते हैं और कांटों से उसका पूरा शरीर बिंध जाता है।
श्लोक 9
असिपत्रवनं नाम तत्र वर्तति दारुणम्।
पत्रैः खड्गसमैस्तत्र छिद्यन्ते तस्य चांगकम्॥९॥
हिंदी अनुवाद: आगे 'असिपत्रवन' नामक भयंकर जंगल आता है, जहाँ के पत्ते तलवार के समान धारदार होते हैं। हवा चलने पर वे पत्ते गिरते हैं और जीव के अंगों को काट डालते हैं।
श्लोक 10
वैतरणी नाम नदी तत्र वर्तति दारुणा।
पूयशोणितपूर्णा च दुर्गन्धा भयं करा॥१०॥
हिंदी अनुवाद: उस मार्ग में अत्यंत भयानक 'वैतरणी नदी' बहती है, जो मवाद (पस), खून और हड्डियों से भरी होती है तथा घोर दुर्गंध देती है।
श्लोक 11
मग्नस्तत्र च पापिष्ठो भक्ष्यते जलचरैर्भृशम्।
असिधारोपमा ज्वाला दहते तस्य चांगकम्॥११॥
हिंदी अनुवाद: पापी जीव उस वैतरणी नदी में गिर पड़ता है, जहाँ जहरीले जलचर जीव उसे काटते हैं और नदी की लपटें उसके शरीर को जलाती हैं।
श्लोक 12
अहर्निशं क्रन्दमानो यमदूतैश्च ताडितः।
षडशीतिसहस्राणि योजनानां प्रगच्छति॥१२॥
हिंदी अनुवाद: दिन-रात रोता-चिल्लाता और यमदूतों की मार सहता हुआ वह जीव कुल 86,000 योजन लंबा यमलोक का मार्ग तय करता है।
श्लोक 13
पुत्रैर्दत्तं च यद्दानं पिण्डदानं च पावनम्।
तेन जीवेन लब्धेन पंथानं याति दुःखितः॥१३॥
हिंदी अनुवाद: पृथ्वी पर उसके पुत्र या परिवार द्वारा जो पिंडदान और दान दिया जाता है, उसी से जीव को यममार्ग में चलने की थोड़ी शक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 14
यैस्तु दानं न दत्तं च पिण्डदानं न कारितम्।
ते यान्ति नरकं घोरं यमदूतैस्तु ताडिताः॥१४॥
हिंदी अनुवाद: जिसके निमित्त कोई दान या पिंडदान नहीं किया जाता, वह जीव भूखा-प्यासा रहकर यमदूतों की मार खाता हुआ सीधे घोर नरक में गिरता है।
श्लोक 15
ततो गत्वा यमपुरीं यमं पश्यति दारुणम्।
चित्रगुप्तं तथा तत्र पापनाशकमेव च॥१५॥
हिंदी अनुवाद: यमलोक पहुँचने के बाद वह जीव यमराज के भयंकर रूप के दर्शन करता है और वहीं चित्रगुप्त जी को देखता है, जो पाप-पुण्य का हिसाब रखते हैं।
श्लोक 16
चित्रगुप्तोऽपि तस्यायुः पाप पुण्यं च पश्यति।
ततो यमाज्ञां सम्प्राप्य क्षिप्यन्ते नरकेषु च॥१६॥
हिंदी अनुवाद: चित्रगुप्त उस जीव के जीवनभर के पापों और पुण्यों का ब्योरा यमराज के सामने रखते हैं, जिसके बाद यमराज की आज्ञा से उसे नरक में फेंक दिया जाता है।
श्लोक 17
तत्र यमपुरीमध्ये पुराणि षोडश सन्ति च।
तेषु स्थानेषु दुःखानि भुङ्क्ते पापी सुदारुणम्॥१७॥
हिंदी अनुवाद: उस यमपुरी के मार्ग में 16 भयंकर नगर आते हैं, जहाँ-जहाँ रुककर पापी जीव को अत्यंत भयंकर दुःख भोगने पड़ते हैं।
श्लोक 18
सौम्यं सौरीपुरं चैव नगरेन्द्र भवनं तथा।
गन्धर्वं शैलगामं च क्रौञ्चं पुरमथापि च॥१८॥
हिंदी अनुवाद: वे 16 नगर इस प्रकार हैं—सौम्यपुर, सौरीपुर, नगरेन्द्रभवन, गन्धर्वपुर, शैलगाम और क्रौञ्चपुर...
श्लोक 19
क्रूरं विचित्रभवनं बहुवापदमेव च।
दुःखदं नानाक्रन्दं च सुतप्तं रौद्रमेव च॥१९॥
हिंदी अनुवाद: क्रूरपुर, विचित्रभवन, बहुवापदपुर, दुःखदपुर, नानाक्रंदपुर, सुतप्तपुर और रौद्रपुर...
श्लोक 20
पयोवर्षणमेवाथ शीतढ्यं बहुभीतिकम्।
यमस्य नगरं रम्यं यत्रास्ते चित्रगुप्तकः॥२०॥
हिंदी अनुवाद: पयोवर्षणपुर, शीताढ्यपुर और बहुभीतिकपुर। इसके बाद अंत में यमराज की विशाल नगरी आती है।
श्लोक 21
प्रतिमासं च तत्रैव पिण्डदानं ददाति यः।
तेन पिण्डेन जीवोऽसौ तुष्टो याति शनैः शनैः॥२१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपने पितरों के लिए प्रतिमास पिंडदान करता है, उस भोजन से तृप्त होकर वह जीव यममार्ग में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।
श्लोक 22
मासिके तु प्रदानेन लभते तत्र विश्रमम्।
अन्यथा तु निराहारः क्रन्दते भृशमुद्विग्नः॥२२॥
हिंदी अनुवाद: मासिक पिंडदान देने से उस जीव को मार्ग में विश्राम प्राप्त होता है, अन्यथा वह बिना भोजन के व्याकुल होकर रोता है।
श्लोक 23
पादौ तस्य बध्यन्ते पाशेन यमदूतकैः।
कर्षन्तो नीयते भूमौ पतमानो मुहुर्मुहुः॥२३॥
हिंदी अनुवाद: जिन जीवों का पिंडदान नहीं होता, उनके पैरों को यमदूत पाश से बाँधकर ज़मीन पर घसीटते हुए ले जाते हैं।
श्लोक 24
तप्तलोहशलाकाभिस्ताडयन्ते च ताडकाः।
कंटकैः क्रकचैश्चैव छिद्यन्ते तस्य चांगकम्॥२४॥
हिंदी अनुवाद: यमदूत उन्हें गर्म लोहे की छड़ों से पीटते हैं तथा आरी और नुकीले कांटों से उनके अंगों को चीरते हैं।
श्लोक 25
अग्निकुण्डेषु पात्यन्ते ताड्यन्ते मुद्गरैस्तथा।
तप्ततैलघटैश्चैव सिच्यन्ते च मुहुर्मुहुः॥२५॥
हिंदी अनुवाद: पापी जीवों को धधकते हुए अग्निकुंडों में फेंका जाता है और उन पर उबलता हुआ तेल डाला जाता है।
श्लोक 26
उष्ट्रैर्वृषैश्च सिंहैश्च भक्ष्यन्ते च वृकैस्तथा।
वृश्चिकैर्दंशकैश्चैव दृश्यन्ते भयं करैः॥२६॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ भयंकर सिंह, भेड़िए, बिच्छू और जहरीले कीड़े पापी जीवों को काटते हैं।
श्लोक 27
पापिनो यातनां भुक्त्वा यममार्गस्य दारुणाम्।
संवत्सरेण प्राप्नोति यमस्य नगरं शुभम्॥२७॥
हिंदी अनुवाद: यममार्ग की भयंकर यातनाओं को भोगता हुआ पापी जीव पूरे एक वर्ष की कठिन यात्रा के बाद यमराज के नगर पहुँचता है।
श्लोक 28
तत्र यमस्य भवनं द्वात्रिंशद्योजनायतम्।
मण्डितं मणिरत्नैश्च स्वर्णस्तम्भैश्च शोभितम्॥२८॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ यमराज का महल 32 योजन में फैला हुआ है, जो मणियों और सोने के खंभों से सुशोभित है।
श्लोक 29
तत्र सिंहासने आसीनं यमं धर्मभृतां वरम्।
पश्यन्ति पापेन युताः क्रूररूपं भयं करम्॥२९॥
हिंदी अनुवाद: उस महल में सिंहासन पर विराजमान यमराज को पापी जीव अत्यंत भयंकर रूप में देखते हैं।
श्लोक 30
धार्मिकास्तु नराः पश्यन्ति सौम्यरूपं जगत्पतिम्।
चतुर्भुजं शंखचक्र गदापद्मधरा शुभम्॥३०॥
हिंदी अनुवाद: इसके विपरीत, पुण्यात्मा जीव यमराज को शांत और चार भुजाओं वाले विष्णु रूप में देखते हैं।
श्लोक 31
प्रथमे याम्यनगरे सौम्यनाम्नि सुदुःखितः।
विश्रामं कुरुते जीवः पिंडदानप्रभावतः॥३१॥
हिंदी अनुवाद: यममार्ग के पहले 'सौम्यपुर' नगर में पापी जीव पृथ्वी पर दिए गए पहले पिंडदान के प्रभाव से थोड़ा विश्राम पाता है।
श्लोक 32
सौरीपुरं ततो गत्वा यमदूतैः प्रताडितः।
चित्रसेनं नृपं पश्येद्यमदूतैः समावृतम्॥३२॥
हिंदी अनुवाद: इसके बाद 'सौरीपुर' पहुँचकर यमदूतों से पिटता हुआ जीव राजा चित्रसेन की नगरी को देखता है।
श्लोक 33
तत्र भुङ्क्ते महादुःखं क्षुधावृष्टिसमुद्भवम्।
तृषार्तो रोदिति जीवो न लभेज्जलविन्दुना॥३३॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ जीव भूख, प्यास और भयंकर बारिश से महादुःख भोगता है। प्यास से व्याकुल होकर रोने पर भी उसे पानी की एक बूंद नहीं मिलती।
श्लोक 34
ततो गच्छति गन्धर्वं नगरं भयवर्द्धनम्।
पुत्रदत्तेन पिण्डेन तुष्टः स्वल्पं सुखी भवेत्॥३४॥
हिंदी अनुवाद: फिर वह भय बढ़ाने वाले 'गन्धर्वपुर' में जाता है, जहाँ पुत्र द्वारा दिए गए पिंडदान से थोड़ा संतुष्ट होकर क्षणभर का सुख पाता है।
श्लोक 35
शैलगामं ततो गत्वा पर्वतान् घोररूपिणः।
पाषाणवृष्टिं सहते यमदूतैः प्रताडितः॥३५॥
हिंदी अनुवाद: 'शैलगाम' नगर पहुँचकर जीव घोर पर्वतों के बीच यमदूतों की मार सहते हुए पत्थरों की बारिश में झुलसता है।
श्लोक 36
क्रौञ्चपुरं ततो याति क्रौञ्चवन्मुञ्चति स्वरम्।
दुःखेन महता युक्तो यमदूतैस्तु ताडितः॥३६॥
हिंदी अनुवाद: इसके बाद वह 'क्रौञ्चपुर' जाता है और यमदूतों की मार से दुःखी होकर पक्षी की तरह चीखता है।
श्लोक 37
क्रूरपुरं ततो गत्वा क्रूरैः सत्त्वैश्च भक्षितः।
छिन्नभिन्नशरीरश्च रोदिति भृशमुद्विग्नः॥३७॥
हिंदी अनुवाद: 'क्रूरपुर' पहुँचकर खूंखार जानवर जीव के शरीर को नोचते हैं, जिससे वह छिन्न-भिन्न होकर रोता है।
श्लोक 38
चित्रभवनं ततो गत्वा पश्यति चित्रमुत्तमम्।
विचित्रगुप्तभवनं यमलोकस्य भूपतेः॥३८॥
हिंदी अनुवाद: फिर 'विचित्रभवन' में पहुँचकर वह चित्रगुप्त के अद्भुत और विशाल महल को देखता है।
श्लोक 39
तत्र वैतरणी नाम नदी घोरतरा शुभा।
ताम् दृष्ट्वा भयभीतोऽसौ पतत्येव हि शोणिते॥३९॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ भयानक वैतरणी नदी को देखकर भयभीत हुआ पापी जीव सीधे रक्त और मवाद के कुएँ में गिर पड़ता है।
श्लोक 40
यैर्दत्ता कपिला धेनुर्ब्राह्मणाय महात्मने।
ते तरन्ति नदीं तां तु सुखेन खगसत्तम॥४०॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपने जीवनकाल में योग्य ब्राह्मण को काली या कपिला गाय का दान करते हैं, वे उस वैतरणी नदी को सुखपूर्वक पार कर लेते हैं।
श्लोक 41
अदत्तदानाः पापिष्ठा मज्जन्ते तत्र शोणिते।
कण्टकैः क्रकचैश्चैव बाध्यन्ते यमकिङ्करैः॥४१॥
हिंदी अनुवाद: दान न देने वाले पापी जीव उस रक्त में डूबते हैं और यमदूतों द्वारा आरी और कांटों से काटे जाते हैं।
श्लोक 42
बहुवापदपुरं गत्वा श्वापदैर्भक्षितो भृशम्।
हाहाकारं प्रकुरुते यातनाभिः प्रताडितः॥४२॥
हिंदी अनुवाद: 'बहुवापदपुर' पहुँचकर जंगली हिंसक पशु जीव को नोचते हैं और वह यातनाओं से हाहाकार करता है।
श्लोक 43
दुःखदं नगरं गत्वा दुःखं प्राप्नोति दारुणम्।
पादहीन करहीनश्च कर्षितो यमकिङ्करैः॥४३॥
हिंदी अनुवाद: 'दुःखदपुर' में पहुँचकर जीव को अत्यंत भयंकर कष्ट मिलता है। हाथ-पैर टूट जाने पर भी यमदूत उसे घसीटते हैं।
श्लोक 44
नानाक्रन्दं ततो याति यत्र क्रन्दन्ति पापिनः।
रुदद्भिश्च समाकीर्णं तन्नगरं सुदारुणम्॥४४॥
हिंदी अनुवाद: फिर वह 'नानाक्रंदपुर' जाता है, जो रोते-चिल्लाते हुए पापियों की आवाज़ों से भरा होता है।
श्लोक 45
सुतप्तं नगरं गत्वा तप्तलोहेषु पात्यते।
दह्यमानोऽग्निकल्पेन क्रन्दते भृशमुद्विग्नः॥४५॥
हिंदी अनुवाद: 'सुतप्तपुर' पहुँचकर जीव को दहकते हुए गर्म लोहे की पत्तलों पर पटक दिया जाता है।
श्लोक 46
रौद्रपुरं ततो गत्वा रौद्रैः शस्त्रैश्च छिद्यते।
यमदूतैः सुसंरब्धैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः॥४६॥
हिंदी अनुवाद: 'रौद्रपुर' में यमदूत क्रोधित होकर तीखे अस्त्र-शस्त्रों से जीव को बार-बार काटते हैं।
श्लोक 47
पयोवर्षणं गत्वा वृष्टिं सहति घोरतराम्।
अंगारवृष्टिं पाषाणं सहते पापकृत नरः॥४७॥
हिंदी अनुवाद: 'पयोवर्षणपुर' में पापी जीव पर अंगारों, बर्फ और पत्थरों की भयंकर वर्षा होती है।
श्लोक 48
शीताढ्यं नगरं गत्वा शीतवेगेन कम्पते।
न लभेत् उष्णवस्त्रं च कातरेणाक्ष्णा प्रपश्यति॥४८॥
हिंदी अनुवाद: 'शीताढ्यपुर' पहुँचकर जीव अत्यधिक ठंड के कारण कांपता है, पर उसे कोई गर्म वस्त्र नहीं मिलता।
श्लोक 49
बहुभीतिकपुरं गत्वा भीतिं प्राप्नोति दारुणाम्।
चित्रगुप्तस्य दूताश्च भयमुत्पादयान्ति हि॥४९॥
हिंदी अनुवाद: 'बहुभीतिकपुर' में चित्रगुप्त के दूत जीव को विभिन्न प्रकार के भयंकर रूप दिखाकर डराते हैं।
श्लोक 50
एतानि षोडश पुराणि भुक्त्वा दुःखं सुदारुणम्।
संवत्सरस्यान्ते जीवो यमलोकं प्रपद्यते॥५०॥
हिंदी अनुवाद: इन 16 नगरों के भीषण दुखों को भोगने के बाद पूरे एक वर्ष के अंत में जीव यमराज की मुख्य नगरी में प्रवेश करता है।
श्लोक 51
तत्र वैवस्वतं देवं धर्मराजं महाद्युतिम्।
पश्यत्युग्रम उग्राक्षं दण्डहस्तं भयं करम्॥५१॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ पापी जीव महातेजस्वी धर्मराज (सूर्यपुत्र यम) को उग्र रूप, लाल आँखों और हाथ में कालदंड लिए देखता है।
श्लोक 52
चित्रगुप्तश्च तत्रास्ते सर्वप्राणिमते स्थितः।
आयुः प्रमाणं पापं च पुण्यं च गणयत्यसौ॥५२॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ चित्रगुप्त भी उपस्थित रहते हैं, जो सभी प्राणियों की आयु, पाप और पुण्य का सटीक हिसाब रखते हैं।
श्लोक 53
आहूय पापिनं प्रोचे चित्रगुप्तो यमाज्ञया।
किमर्थं न कृतं पाप नाशनं धर्ममद्भुतम्॥५३॥
हिंदी अनुवाद: यमराज की आज्ञा से चित्रगुप्त पापी को बुलाकर पूछते हैं—'हे मूढ़! तुमने पृथ्वी पर रहते हुए पापों का नाश करने वाला धर्म क्यों नहीं किया?'
श्लोक 54
मर्त्यलोके त्वया प्राप्तं दुर्लभं मानुषं वपुः।
तत्रापि विषयैः सक्तो नाकरोर्हरिपूजनम्॥५४॥
हिंदी अनुवाद: तुम्हें मर्त्यलोक में अत्यंत दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला था, फिर भी तुमने केवल विषयों में लिप्त रहकर श्रीहरि की पूजा क्यों नहीं की?
श्लोक 55
नाकरोर्दीपदानं च न कृतं तिलतर्पणम्।
न दत्तं कपिलाधेनुः न कृतं विष्णुकीर्तनम्॥५५॥
हिंदी अनुवाद: तुमने न दीपदान किया, न तिलों से तर्पण किया, न कपिला गाय का दान दिया और न ही कभी विष्णु का संकीर्तन किया!
श्लोक 56
तस्माद्यमदण्डं घोरं भुङ्क्ष्व पापस्य तत्फलम्।
इत्युक्त्वा यातनाकुण्डे क्षिप्यन्ते यमकिङ्करैः॥५६॥
हिंदी अनुवाद: 'अब अपने पापों का फल भोगो!' ऐसा कहकर यमदूत उस जीव को यातना कुंडों में फेंक देते हैं।
श्लोक 57
रौरवे महारौरवे च तमिस्रे चान्धतमिस्रके।
कालसूत्रे तथा चोरे निपातयति पापिनः॥५७॥
हिंदी अनुवाद: पापियों को रौरव, महारौरव, तमिस्र, अंधतमिस्र और कालसूत्र जैसे घोर नरकों में गिराया जाता है।
श्लोक 58
कुम्भीपाके च ताप्रैश्च पतन्ति पापकारिणः।
छिन्नभिन्नाश्च क्रन्दन्ति यावत्पापं न क्षीयते॥५८॥
हिंदी अनुवाद: पापी जीव कुंभीपाक नरक में उबलते हुए तेल में पकाए जाते हैं और जब तक उनके पाप नष्ट नहीं होते, वे कटते-छंटते रहते हैं।
श्लोक 59
असिधार वने चापि पत्रैश्छिद्यन्ति चाङ्गकम्।
श्वभिः क्रौञ्चैः शृगालैश्च भक्ष्यन्ते भृशमुद्विग्नाः॥५९॥
हिंदी अनुवाद: असिपत्रवन में तीखे पत्तों से उनके अंग कटते हैं और कुत्ते तथा सियार उन्हें नोच-नोच कर खाते हैं।
श्लोक 60
सूचामुखैः कीटैश्च दश्यन्ते पापिनां तदा।
तप्तलोहशलाकाभिर्बिध्यन्ते सर्वसन्धिषु॥६०॥
हिंदी अनुवाद: सुई जैसे मुख वाले जहरीले कीड़े पापियों को डसते हैं और उनके जोड़ों में गर्म लोहे की सलाखें चुभोई जाती हैं।
श्लोक 61
वृश्चिकैर्दंशकैश्चैव खाद्यन्ते पापिनां तदा।
उष्ट्रैर्वृषैश्च सिंहैश्च भक्ष्यन्ते यमशासने॥६१॥
हिंदी अनुवाद: यमराज के शासन में भयानक बिच्छू, ऊँट, बैल और सिंह पापियों का मांस खाते हैं।
श्लोक 62
अग्निकुण्डेषु पात्यन्ते ताड्यन्ते मुद्गरैस्तथा।
तप्ततैलघटैश्चैव सिच्यन्ते च मुहुर्मुहुः॥६२॥
हिंदी अनुवाद: उन्हें अग्निकुंडों में फेंका जाता है, भारी गदाओं से पीटा जाता है और उन पर उबलता तेल डाला जाता है।
श्लोक 63
पिण्डदानेन ये पूतास्ते न यान्ति यमालयम्।
विष्णुलोके महाभागा मोदन्ते विष्णुना सह॥६३॥
हिंदी अनुवाद: जो जीव पुत्रों द्वारा किए गए पिंडदान से पवित्र हो जाते हैं, वे यमलोक की यातना में नहीं जाते, बल्कि विष्णुलोक में आनंद प्राप्त करते हैं।
श्लोक 64
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।
तस्मात्पुत्रमुत्पादयेत् सर्वथा धर्मसाधनम्॥६४॥
हिंदी अनुवाद: पुत्रहीन व्यक्ति को उत्तम गति और स्वर्ग नहीं मिलता, इसलिए धर्म पालन और कुल की रक्षा हेतु पुत्रोत्पत्ति आवश्यक मानी गई है।
श्लोक 65
दौहित्रो वा सुतो वापि यदि कुर्यात् सपिण्डनम्।
तेनैव लभते स्वर्गं मुच्यते यमयातनात्॥६५॥
हिंदी अनुवाद: यदि बेटा न हो तो नाती (दौहित्र) भी पिंडदान करे, तो भी जीव यमलोक की यातना से छूटकर स्वर्ग प्राप्त करता है।
श्लोक 66
वृषोत्सर्गं च यो कुर्यात् पितॄणामुद्दिश्य च।
स तारयति तत्सर्वं कुलमेकोत्तरं शतम्॥६६॥
हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति अपने पितरों के निमित्त 'वृषोत्सर्ग' (सांड छोड़ना) करता है, वह अपनी 101 पीढ़ियों को तार देता है।
श्लोक 67
दीपदानं प्रकुर्वीत यममार्गस्य शान्तये।
अन्धकारे तु यममार्गे दीपस्य जायते प्रकाशः॥६७॥
हिंदी अनुवाद: यममार्ग के अंधेरे को दूर करने के लिए दीपदान करना चाहिए; इससे जीव को मार्ग में प्रकाश प्राप्त होता है।
श्लोक 68
छत्रं च उपानहौ दद्याद्विप्रायान्नं तथोदकम्।
तेन सुखेन गच्छेत यममार्गं सुदारुणम्॥६८॥
हिंदी अनुवाद: जो जीवनकाल या अंत समय में छाता, जूते, अन्न और जल दान करता है, वह यममार्ग की भयंकर धूप और गर्मी से बचकर सुख से यात्रा करता है।
श्लोक 69
शय्यादानं च यो दद्याद्ब्राह्मणाय सुसंस्कृताम्।
स याति देवयानेन नरो विष्णुपुरं शुभम्॥६९॥
हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति ब्राह्मण को सुंदर शय्या (बिस्तर) दान करता है, वह देवयान मार्ग से सीधा विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 70
गवां ग्रासं च यो दद्यादन्त्यकाले तु मानवः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत यमदण्डं न पश्यति॥७०॥
हिंदी अनुवाद: जो अंत समय में गाय को ग्रास देता है, वह सब पापों से छूटकर यमराज का दंड नहीं देखता।
श्लोक 71
पापिनो यातनां भुक्त्वा यममार्गस्य दारुणाम्।
पुनरत्र समायाति स्थावरादिषु जन्मसु॥७१॥
हिंदी अनुवाद: यममार्ग की भीषण यातनाओं को भोगने के बाद पापी जीव पुनः पृथ्वी पर आता है और पेड़-पौधों की योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 72
ततः कृमिसरीसृपच्छागेषु च ततो भवेत्।
पक्षित्वं च ततो गत्वा पशुपक्षित्वमेव च॥७२॥
हिंदी अनुवाद: इसके बाद वह कीड़े, सर्प, बकरे, पक्षी और अन्य पशुओं की योनियों में भटकता है।
श्लोक 73
ततो मानुषतां प्राप्य कुष्ठी भवति पातकः।
दरिद्रो व्याधिसंयुक्तो जायते पाप कर्मकृत॥७३॥
हिंदी अनुवाद: जब उसे पुनः मनुष्य जन्म मिलता है, तब वह अपने पापों के कारण कुष्ठ रोगी, दरिद्र और गंभीर रोगों से ग्रस्त होता है।
श्लोक 74
स्त्रीघाती च भवेद्रोगी गोग्नस्तु विकलो भवेत्।
ब्रह्मज्ञाती च क्षयी स्यात् सर्वपापस्य लक्षणम्॥७४॥
हिंदी अनुवाद: स्त्री हत्यारा रोगी, गोहत्यारा अपाहिज और ब्रह्मघाती टीबी का रोगी बनता है।
श्लोक 75
चौर्यं कृत्वा तु हेमादिं नखी भवति मानवः।
मद्यपो श्यावदन्तश्च तैलचौरो तु तैलपः॥७५॥
हिंदी अनुवाद: सोना चुराने वाले के नाखून विकृत होते हैं, शराब पीने वाले के दाँत काले होते हैं और तेल चुराने वाला कीड़ा बनता है।
श्लोक 76
धान्यचौरो भवेन्मूषकः कांस्यचौरो हंसो भवेत्।
वस्त्रचौरो भवेच्छ्वेती जलचौरो प्लवो भवेत्॥७७॥
हिंदी अनुवाद: अनाज चुराने वाला चूहा, कांसा चुराने वाला हंस, कपड़ा चुराने वाला श्वेतकुष्ठ रोगी और जल चुराने वाला जलपक्षी बनता है।
श्लोक 77
तस्मात्सर्वप्रत्नेन पापानि परिवर्जयेत्।
धर्ममेव प्रकुर्वीत धर्मो हि परमं धनम्॥७७॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए मनुष्य को हर संभव प्रयत्न से पापों का त्याग करके केवल धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि धर्म ही सच्चा धन है।
श्लोक 78
धर्मेण लभते स्वर्गं धर्मेण लभते सुखम्।
धर्मेण मुच्यते पापादतः धर्मं समाचरेत्॥७८॥
हिंदी अनुवाद: धर्म से स्वर्ग, धर्म से सुख और धर्म से ही पापों से मुक्ति मिलती है; अतः सदा धर्म का आचरण करें।
श्लोक 79
दानं दद्याद्विजातिभ्यः पितृभ्यश्च तथा अन्नकम्।
गवां ग्रासं प्रदातव्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥७९॥
हिंदी अनुवाद: ब्राह्मणों को दान दें, पितरों के नाम अन्नदान करें और गाय को ग्रास दें, इससे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 80
सत्यं वदेद्धर्मं चरेद्गुरुं विश्रम्भयेत्तथा।
मातापितृभ्याम् शुश्रूषां कुर्यात् सर्वप्रयत्नतः॥८०॥
हिंदी अनुवाद: सदा सत्य बोलें, धर्म का आचरण करें, गुरु का आदर करें और पूरे प्रयत्न से माता-पिता की सेवा करें।
श्लोक 81
अतिथिं पूजयेन्नित्यं विष्णुभाव समन्विता।
एते धर्मभृतां श्रेष्ठा न यान्ति यमशासनम्॥८१॥
हिंदी अनुवाद: जो अतिथि का विष्णु भाव से नित्य पूजन करते हैं, ऐसे श्रेष्ठ धार्मिक जन यमराज के शासन में नहीं जाते।
श्लोक 82
एतत्किञ्चित्समाख्यातं यममार्गस्य लक्षणम्।
पापिनां यातनाश्चैव किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥८२॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु बोले—हे गरुड़! मैंने तुम्हें यममार्ग का लक्षण और पापियों की यातनाओं का पूरा विवरण सुना दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 83
गरुड़ उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मे प्रोक्तं त्वया प्रभो।
यममार्गस्य यातना सर्वलोकभयावहा॥८३॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे प्रभु! आपकी कृपा से मैं धन्य हुआ, जो आपने मुझे इस लोक-भयकारी यममार्ग की कथा सुनाई।
श्लोक 84
पुनश्च श्रोतुमिच्छामि दानस्य च विधिं शुभम्।
येन दत्तेन मुच्यन्ते यममार्गस्य यातनात्॥८४॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी ने कहा—हे प्रभु! अब मैं उन शुभ दानों की विधि सुनना चाहता हूँ, जिनसे जीव यममार्ग की यातनाओं से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 85
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि दानानां विधिमुत्तमम्।
वैतरण्याश्च तरणम् सर्वपापप्रणाशनम्॥८५॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें उत्तम दानों की विधि बताता हूँ, जिससे वैतरणी नदी पार होती है और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 86
तिला लोहं हिरण्यं च कापासो लवणं तथा।
सप्त धान्यानि भूमिश्च छागश्चैव महादानम्॥८६॥
हिंदी अनुवाद: तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सात प्रकार के अनाज, भूमि और बकरा—ये महादान कहलाते हैं।
श्लोक 87
एतानि महादानानि यः करोति मुदान्वितः।
स मुच्यते यमभयात् विष्णुलोकं च गच्छति॥८७॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य प्रसन्नचित्त होकर इन महादानों को करता है, वह यम के भय से मुक्त होकर सीधे विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 88
कातुरस्यान्त्यकाले तु दानं दद्यात् सुपुत्रकः।
तेन दानेन जीवोऽसौ सुखी याति यमालयम्॥८८॥
हिंदी अनुवाद: मरणासन्न व्यक्ति के अंतिम समय में सुयोग्य पुत्र द्वारा दिए गए दान से जीव सुखपूर्वक यमलोक जाता है।
श्लोक 89
इति यममार्गस्य कथं शृणुयाद्यः समाहितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत न सोऽपि नरकं व्रजेत्॥८९॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस यममार्ग का वर्णन सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और कभी नरक में नहीं जाता।
श्लोक 90
श्रोता च वक्ता च उभौ विष्णुलोकं प्रपद्यतः।
गरुड़स्य प्रसादेन सर्वमंगलमाप्नुयात्॥९०॥
हिंदी अनुवाद: इस कथा को सुनने वाला और सुनाने वाला दोनों विष्णुलोक प्राप्त करते हैं और गरुड़ जी की कृपा से सब मंगल होता है।
श्लोक 91
एतद्गरुड़पुराणं तु सर्वशास्त्रोत्तमं शुभम्।
पठनाच्छ्रवणाच्चैव सर्वकामप्रदायकम॥९१॥
हिंदी अनुवाद: यह गरुड़ पुराण सभी शास्त्रों में उत्तम और शुभ है। इसके पढ़ने और सुनने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
श्लोक 92
धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं परमं मतम्।
तस्मात्सर्वप्रत्नेन पठितव्यं नरोत्तमैः॥९२॥
हिंदी अनुवाद: यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों का साधन है; इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 93
यत्र गरुड़पुराणस्य पाठो भवति नित्यशः।
तत्र नश्यन्ति पापानि यमदूता भयं कुतः॥९३॥
हिंदी अनुवाद: जहाँ प्रतिदिन गरुड़ पुराण का पाठ होता है, वहाँ के पाप नष्ट हो जाते हैं और यमदूतों का भय दूर हो जाता है।
श्लोक 94
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे यममार्गनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः संपूर्णः॥९४॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'यममार्गनिरूपण' नामक द्वितीय अध्याय संपूर्ण हुआ।
श्लोक 95
हरिः ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु॥९५॥
हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब ब्रह्म को समर्पित है।
श्लोक 96
नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥९६॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार प्रणाम है।
श्लोक 97
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥९७॥
हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्यायपूर्वक पृथ्वी का पालन करें, गायों और ब्राह्मणों का सदा शुभ हो तथा समस्त लोक सुखी हों।
श्लोक 98
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।
देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥९८॥
हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न-धन से परिपूर्ण रहे, देश उपद्रव रहित हो और सज्जन पुरुष निर्भय रहें।
श्लोक 99
शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥९९॥
हिंदी अनुवाद: तीनों तापों की पूर्ण शांति हो।
श्लोक 100
॥ इति शुभम् ॥१००॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ और मंगलकारी हो।