गरुड़ पुराण तीसरा अध्याय: यम यातना का संपूर्ण वर्णन (Garud Puran Adhyay 3 All 80 Slokas)

गरुड़ पुराण अध्याय 3 नरक लोक और यातनाओं का चित्रण


गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान विष्णु से पूछते हैं कि यमलोक पहुँचकर पापी जीव किस प्रकार दंड और यातनाएँ भोगता है। इसके उत्तर में श्रीहरि यमराज के दरबार, श्रवण नामक गुप्तचरों, शाल्मली वृक्ष तथा नरक के भयंकर दंडों का वर्णन करते हैं।

गरुड़ पुराण तृतीय अध्याय: 1 से 80 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद

श्लोक 1

गरुड़ उवाच

यममार्गं समासाद्य यमस्य भवनं गतः।

पापी भुङ्क्ते च याश्चोग्रा यातनास्तद्वद प्रभो॥१॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी ने कहा—हे प्रभु! यममार्ग की यात्रा पूरी करके यमराज के भवन में पहुँचकर पापी जीव जिस प्रकार की उग्र यातनाएँ भोगता है, वह मुझे बतलाइए।

श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच

शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि यातनाः पाप कर्मणाम्।

याश्च भुञ्जन्ति नरके दारुणाः पापकारिणः॥२॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें पापियों को नरक में मिलने वाली उन भयंकर यातनाओं का वर्णन सुनाता हूँ।

श्लोक 3

बहुभीतिकपुरादग्रे चतुश्चत्वारिंशद्योजनम्।

यमस्य नगरं रम्यं यत्रास्ते धर्मराट् स्वयम्॥३॥

  • हिंदी अनुवाद: बहुभीतिकपुर के आगे 44 योजन में फैला हुआ धर्मराज यम का विशाल नगर है, जहाँ स्वयं धर्मराज विराजमान हैं।

श्लोक 4

तत्र गत्वा तु पापिष्ठो हाहाकारं करोत्यसौ।

तस्य क्रन्दं समाकर्ण्य दूता ज्ञापयन्ति यमम्॥४॥

  • हिंदी अनुवाद: वहाँ पहुँचकर पापी जीव भयंकर हाहाकार करने लगता है। उसके रोने की आवाज़ सुनकर यमदूत यमराज को उसके आने की सूचना देते हैं।

श्लोक 5

धर्मध्वजो नाम तत्र प्रतीहारो महामतिः।

चित्रगुप्ताय तद् सर्वं पापपुण्यं निवेदयेत्॥५॥

  • हिंदी अनुवाद: यमपुरी के द्वार पर 'धर्मध्वज' नामक द्वारपाल रहता है, जो जीव के सभी शुभ और अशुभ कर्मों का विवरण चित्रगुप्त जी को देता है।

श्लोक 6

ततः चित्रगुप्तोऽपि धर्मराजाय भाषते।

सर्वज्ञो धर्मराजस्तु सर्वं जानाति तत्त्वतः॥६॥

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद चित्रगुप्त जी धर्मराज से निवेदन करते हैं। यद्यपि सर्वज्ञ धर्मराज स्वयं सब कुछ जानते हैं...

श्लोक 7

तथापि चित्र गुप्तं च श्रवणान् पृच्छति प्रभुः।

श्रवणा नाम ये सन्ति ब्रह्माङ्गसमुद्भवाः॥७॥

  • हिंदी अनुवाद: फिर भी यमराज चित्रगुप्त से और 'श्रवणों' से पूछते हैं। ये श्रवण ब्रह्मा जी के अंगों से उत्पन्न हुए गुप्तचर हैं।

श्लोक 8

स्वर्गे भूमौ च पाताले चरन्ति बहुचारिणः।

दूरश्रुतिदृशश्चैव प्राणिनां सर्वकर्मिणाम्॥८॥

  • हिंदी अनुवाद: ये श्रवण स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में निरंतर विचरण करते हैं। ये दूर से ही जीवों के सभी कर्मों को देख और सुन लेते हैं।

श्लोक 9

मनसा कर्मणा वाचा यत्किञ्चित कुरुते नरः।

तद् सर्वं वेत्ति ते तार्क्ष्य चित्रगुप्ताय शंसति॥९॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मनुष्य मन, वचन और कर्म से जो कुछ भी करता है, श्रवण उन सबको जानकर चित्रगुप्त जी को बता देते हैं।

श्लोक 10

तथैव तासां नार्यश्च श्रवण्यश्च पृथक् पृथक्।

स्त्रीणां सर्वं च चेष्टितं जानन्ति तत्त्वतः॥१०॥

  • हिंदी अनुवाद: इसी प्रकार उनकी पत्नियाँ 'श्रवणियाँ' होती हैं, जो स्त्रियों द्वारा किए गए गुप्त और प्रकट कर्मों का पूरा हिसाब रखती हैं।

श्लोक 11

आदित्यचन्द्रावनिलो नलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।

अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम्॥११॥

  • हिंदी अनुवाद: सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यमराज, दिन, रात, प्रातः-सायं संध्या और धर्म—ये 13 साक्षी मनुष्य के कर्मों को देखते हैं।

श्लोक 12

एते कर्मणि पश्यन्ति मनुष्याणां शुभाशुभम्।

ततः चित्रगुप्तो वाक्यं प्रोवाच पापिनं प्रति॥१२॥

  • हिंदी अनुवाद: ये सभी जीव के पाप-पुण्य के साक्षी हैं। इसके बाद चित्रगुप्त जी उस पापी से कठोर वचन कहते हैं।

श्लोक 13

किमर्थं पातकं त्वया कृतं मूढेन चेतसा।

कामलोभभयाद्वापि नाकरोर्धर्ममव्ययम्॥१३॥

  • हिंदी अनुवाद: चित्रगुप्त कहते हैं—'हे मूर्ख! तूने काम, क्रोध, लोभ या भय के वश में होकर पाप क्यों किए? तुमने अक्षय पुण्य देने वाले धर्म का पालन क्यों नहीं किया?'

श्लोक 14

हर्षेण कृतवान् पापं यातनां भुङ्क्ष्व साम्प्रतम्।

कर्मणां स्वकृतानां च फलदाता न चापरः॥१४॥

  • हिंदी अनुवाद: 'जिस प्रकार तुमने बड़ी खुशी से पाप कर्म किए थे, अब उसी प्रकार उनकी यातना भोगो। अपने किए कर्मों का फल भुगतने के लिए तुम्हारे सिवा कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है।'

श्लोक 15

मूर्खो वा पंडितो वापि दरिद्रो वा धनी तथा।

यमस्य समवर्तीत्वं सर्वप्राणिषु निश्चितम्॥१५॥

  • हिंदी अनुवाद: चाहे कोई मूर्ख हो या विद्वान, दरिद्र हो या धनी—यमराज के दरबार में सभी प्राणियों के साथ बिना किसी पक्षपात के समान न्याय होता है।

श्लोक 16

तच्छ्रुत्वा पापिनः सर्वे तूष्णीं तिष्ठन्ति कातराः।

कर्मणि स्मरमाणाश्च कम्पन्ते यमशासने॥१६॥

  • हिंदी अनुवाद: चित्रगुप्त के ऐसे कठोर वचन सुनकर वे पापी अपने पापों को याद करके भयभीत हो जाते हैं और चुपचाप कांपने लगते हैं।

श्लोक 17

ततो यमः समाज्ञाप्य दूतैस्ताडयते भृशम्।

नयन्तु नरके घोरे यत्रास्ते यातना महती॥१७॥

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद यमराज की आज्ञा पाकर यमदूत उन पापियों को बुरी तरह पीटते हुए घोर यातना वाले नरकों की ओर ले जाते हैं।

श्लोक 18

प्रचण्डचण्डकाद्याश्च दूता यमवशानुगाः।

पाशेन बद्ध्वा गच्छन्ति नरकं प्रति पापिनम्॥१८॥

  • हिंदी अनुवाद: प्रचंड और चंडक नाम के क्रूर यमदूत पापी को पाश में बाँधकर नरक की ओर घसीटते हैं।

श्लोक 19

तत्रास्ते शाल्मली वृक्षः पञ्चयोजनमुच्छ्रितः।

ज्वलदग्निसमप्रभः कंटकैः सुसमावृतः॥१९॥

  • हिंदी अनुवाद: रास्ते में 5 योजन ऊँचा 'शाल्मली' (सेमल) का वृक्ष आता है, जो आग की लपटों से धधक रहा होता है और तीखे कांटों से भरा होता है।

श्लोक 20

अधोमुखं तु बद्ध्वा तं ताडयन्ति यमकिङ्कराः।

ज्वलदग्नौ पतन्तं च रोदिति भृशमुद्विग्नः॥२०॥

  • हिंदी अनुवाद: यमदूत पापी को उस पेड़ पर उल्टा लटकाकर लोहे की सांकलों से बाँध देते हैं और आग से जलते हुए जीव को बुरी तरह पीटते हैं।

श्लोक 21

हा हा कृत्वा क्रन्दमानं ताडयन्ति च मुद्गरैः।

पट्टिशैर्भिन्नसर्वाङ्गं खादन्ति श्वापदास्तथा॥२१॥

  • हिंदी अनुवाद: जीव 'हा-हा' करके चिल्लाता है, पर दूत उसे मुद्गरों और कुल्हाड़ों से मारते हैं तथा हिंसक पशु उसके अंगों को काटते हैं।

श्लोक 22

अरे दुरात्मन् पापिष्ठ किमर्थं न कृतं शुभम्।

न दत्तं जलमन्नं च न कृतं हरिपूजनम्॥२२॥

  • हिंदी अनुवाद: यमदूत डांटकर कहते हैं—'ओ दुरात्मा पापी! तूने कभी धर्म क्यों नहीं किया? किसी भूखे को अन्न-जल क्यों नहीं दिया और भगवान विष्णु की पूजा क्यों नहीं की?'

श्लोक 23

न कृतं पितृतर्पणं न कृतं चातिथ्यपूजनम्।

तस्मात् पापेन युक्तेन भुङ्क्ष्व दंड सुदारुणम्॥२३॥

  • हिंदी अनुवाद: 'न तुमने पितरों का तर्पण किया और न अतिथियों का सत्कार! इसलिए अब अपने पापों का यह भयानक दंड भोगो।'

श्लोक 24

एवमुक्त्वा तु ते दूताः पातयन्ति द्रुमात्ततः।

पत्रैः असिसमैश्छिन्नाः खादन्ते यमकुक्कुराः॥२४॥

  • हिंदी अनुवाद: ऐसा कहकर यमदूत उसे पेड़ से नीचे पटक देते हैं, जहाँ गिरते ही वृक्ष के धारदार पत्ते उसके शरीर को काट डालते हैं और यमलोक के कुत्ते उसे नोचते हैं।

श्लोक 25

मुखे पांशुं प्रक्षिपन्ति ताडयन्ति च मुद्गरैः।

क्रकचैश्छिद्यते कश्चित् भूमौ पातित एव च॥२५॥

  • हिंदी अनुवाद: रोते हुए पापी के मुँह में यमदूत धूल भर देते हैं, मुद्गरों से पीटते हैं और कुछ को ज़मीन पर पटककर आरी से काट डालते हैं।

श्लोक 26

कुठारैश्छिद्यते कश्चित् खातौ खात्वा च निखन्यते।

इक्षुदण्ड इवाप्यन्यः पीड्यते यन्त्रमध्यगः॥२६॥

  • हिंदी अनुवाद: कुछ पापियों को कुल्हाड़ी से टुकड़े-टुकड़े किया जाता है, कुछ को गड्ढे में आधा गाड़ दिया जाता है और कुछ को गन्ने की तरह कोल्हू में पेरा जाता है।

श्लोक 27

उल्मुकैर्धक्ष्यते कश्चित् तप्तलोहपिण्डैस्तथा।

तप्ततैलकठारेषु तच्यन्ते च मुहुर्मुहुः॥२७॥

  • हिंदी अनुवाद: कुछ को जलती लकड़ी और गर्म लोहे के गोलों से दागा जाता है तथा कुछ को उबलते हुए तेल के कड़ाहों में पकोड़ों की तरह तला जाता है।

श्लोक 28

मत्तगजैः सम्मर्द्यन्ते निखाताश्च महीतले।

अधोमुखाः पात्यन्ते कूपेषु विषपूरिते॥२८॥

  • हिंदी अनुवाद: कुछ पापियों को ज़मीन में गाड़कर मस्त हाथियों से कुचलवाया जाता है और कुछ को जहरीले कुओं में उल्टा फेंक दिया जाता है।

श्लोक 29

सूचामुखैः क्रिमिश्रैश्च दश्यन्ते भृशमुद्विग्नाः।

मांसं स्वकीयमेवाद्य दाप्यन्ते यमकिङ्करैः॥२९॥

  • हिंदी अनुवाद: सुई जैसे मुख वाले जहरीले कीड़े उन्हें डसते हैं और यमदूत पापी को उसी का मांस नोचकर खाने पर मजबूर करते हैं।

श्लोक 30

ऋणिनः प्रार्थयन्त्यन्ये देहि मे द्रव्यमर्पितम्।

यमलोके मया दृष्टस्त्वया गृहीतमंबकम्॥३०॥

  • हिंदी अनुवाद: जिन लोगों का धन चुराया या मारा गया था, वे प्रेत वहाँ आकर चिल्लाते हैं—'मेरा धन वापस दो! तुमने मर्त्यलोक में मेरा हक़ मारा था।'

श्लोक 31

ततो दूतैस्तयोर्मांसं सन्दंशैश्च विपाट्यते।

दाप्यते च तदा तस्मै यमदण्डस्य शासनात्॥३१॥

  • हिंदी अनुवाद: तब यमदूत संड़ासी से पापी का मांस नोच-नोच कर उन लेनदारों को देते हैं।

श्लोक 32

एवमादि बहुविधे नरकेषु सुदारुणे।

पच्यन्ते पापिनः सर्वे यावत्कल्पं खगेश्वर॥३२॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! इस प्रकार विभिन्न भयानक नरकों में पापी जीव लंबे समय तक अपने कर्मों की यातना भोगते हैं।

श्लोक 33

तमिस्रश्चान्धतमिस्रं महारौरवरौरवौ।

कालसूत्रं कुम्भीपाकं संप्रतापनाविलोहितौ॥३३॥

  • हिंदी अनुवाद: तमिस्र, अंधतमिस्र, रौरव, महारौरव, कालसूत्र, कुंभीपाक, संप्रतापन और अविलोहित...

श्लोक 34

सूकरं खट्वांगं च असिपत्रवनं तथा।

कृमिभोजनमेवाथ कालसूत्रं तथैव च॥३४॥

  • हिंदी अनुवाद: सूकरमुख, खट्वांग, असिपत्रवन, कृमिभोजन और कालसूत्र...

श्लोक 35

एते चान्ये च नरकाः सन्ति तार्क्ष्य सहस्रशः।

तेषु पतन्ति पापिष्ठाः नानादुःखसमन्विताः॥३५॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! ऐसे-ऐसे हज़ारों नरक यमलोक में स्थित हैं, जिनमें पापी जीव गिरकर भाँति-भाँति के कष्ट सहते हैं।

श्लोक 36

परस्त्रीगामी पुरुषाः परद्रव्यापहारीणः।

पतन्ति रौरवे घोरे क्रन्दमानाः सुदुःखिताः॥३६॥

  • हिंदी अनुवाद: पराई स्त्री पर बुरी नज़र रखने वाले और दूसरों का धन हड़पने वाले पुरुष 'रौरव' नरक में गिरकर चिल्लाते हैं।

श्लोक 37

मातापितृघाती चैव ब्रह्मघ्नश्च सुरापायी।

कालसूत्रे पच्यन्ते यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥३७॥

  • हिंदी अनुवाद: माता-पिता, ब्राह्मण और गुरु की हत्या करने वाले तथा मदिरापान करने वाले जीव सूर्य और चंद्रमा के रहने तक 'कालसूत्र' नरक में जलते हैं।

श्लोक 38

अतिथिं वञ्चयित्वा तु स्वयं भुङ्क्ते च यो नरः।

कृमिभोज्ये पात्यतेऽसौ क्रिमिभिः भक्ष्यते भृशम्॥३८॥

  • हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति अतिथि को धोखा देकर स्वयं भोजन कर लेता है, वह 'कृमिभोजन' नरक में गिरता है और कीड़े उसे खाते हैं।

श्लोक 39

मित्रद्रोही कृतघ्नश्च साक्ष्यं वदति यः मृषा।

असिपत्रवने सोऽपि छिद्यते यमकिङ्करैः॥३९॥

  • हिंदी अनुवाद: मित्र से द्रोह करने वाला, उपकार न मानने वाला (कृतघ्न) और झूठी गवाही देने वाला 'असिपत्रवन' में तलवार जैसे पत्तों से काटा जाता है।

श्लोक 40

विश्वासघाती यो मर्त्यो भृत्यघ्नश्च विशेषतः।

कुम्भीपाके पच्यतेऽसौ तप्ततैलघटैस्तथा॥४०॥

  • हिंदी अनुवाद: विश्वासघात करने वाला और अपने आश्रित (सेवक) को मारने वाला 'कुंभीपाक' नरक में उबलते हुए तेल में पकाया जाता है।

श्लोक 41

देवद्रव्यापहारी च ब्राह्मणस्वं च यो हरेत्।

महारौरवे पात्यते स सर्वक्रूरैः प्रताडितः॥४१॥

  • हिंदी अनुवाद: मंदिर का धन और ब्राह्मण की संपत्ति छीनने वाला 'महारौरव' नरक में भयानक जीवों द्वारा सताया जाता है।

श्लोक 42

कन्याविक्रयी यश्च देवानां निन्दकस्तथा।

अग्निकुण्डे पात्यतेऽसौ दाह्यते च मुहुर्मुहुः॥४२॥

  • हिंदी अनुवाद: कन्या का सौदा (बेचने) करने वाला और ईश्वर-शास्त्रों की निंदा करने वाला अग्निकुंड में बार-बार जलाया जाता है।

श्लोक 43

सीमापहारी क्षेत्रस्य तड़ागस्य विनाशकः।

तप्तबालुकसंकीर्णे यममार्गे प्रताड्यते॥४३॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों के खेत की सीमा दबाने वाला और तालाब-कुएँ को नष्ट करने वाला गर्म रेत पर घसीटा जाता है।

श्लोक 44

वृथा पशुघ्नः पापिष्ठो मांसकामी निरंकुशः।

सूकरमुखे पात्यतेऽसौ तप्तशस्त्रैश्च छिद्यते॥४४॥

  • हिंदी अनुवाद: केवल जीभ के स्वाद के लिए बेज़ुबान पशुओं की हत्या करने वाला 'सूकरमुख' नरक में तीखे शस्त्रों से काटा जाता है।

श्लोक 45

रजोवलां गामिनी यश्च परदारप्रसक्तधीः।

अन्धतमिस्रे पात्यते स तमसा सुसमावृते॥४५॥

  • हिंदी अनुवाद: रजस्वला स्त्री या पराई स्त्री से व्यभिचार करने वाला घने अंधेरे वाले 'अंधतमिस्र' नरक में फेंका जाता है।

श्लोक 46

तस्मात् पापानि सर्वाणि वर्जयेत् मानवः सदा।

यातनार्थं न गच्छेत धर्ममेव समाचरेत्॥४६॥

  • हिंदी अनुवाद: इसलिए मनुष्य को इन यातनाओं से बचने के लिए सभी पापों का त्याग कर सदा धर्म का आचरण करना चाहिए।

श्लोक 47

यथा यथा कृतं कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम्।

तथा तथैव तद्भोक्तुमवश्यमेव लभ्यते॥४७॥

  • हिंदी अनुवाद: मनुष्य जैसा-जैसा शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है; इससे कोई बच नहीं सकता।

श्लोक 48

नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥४८॥

  • हिंदी अनुवाद: सैकड़ों करोड़ कल्प बीत जाने पर भी बिना भोगे कर्म नष्ट नहीं होते। मनुष्य को अपने किए शुभ-अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।

श्लोक 49

पापक्षयाय कर्तव्यं प्रायश्चित्तं यथाविधि।

तपसा दानेन जपेन विष्णुस्मरणेन च॥४९॥

  • हिंदी अनुवाद: अपने पापों के नाश के लिए मनुष्य को जीवित रहते हुए तप, दान, जप और श्रीहरि के स्मरण द्वारा विधिपूर्वक प्रायश्चित्त कर लेना चाहिए।

श्लोक 50

एकादशीव्रतं यश्च करोति हरिभक्तिमान्।

न तस्य यमभीतिश्च न च नरकपातनम्॥५०॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य भक्तिभाव से एकादशी का व्रत रखता है, उसे न तो यमराज का भय होता है और न ही वह कभी नरक में गिरता है।

श्लोक 51

तुलसीदलतोयेन यो करोति हरिमर्चनम्।

स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥५१॥

  • हिंदी अनुवाद: जो तुलसी के पत्तों और जल से भगवान श्रीहरि का पूजन करता है, वह सब पापों से छूटकर सीधे विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 52

गंगा स्नानं च यो कुर्यात् मरणकाले विशेषतः।

तस्य पापं क्षयं याति पदं प्राप्नोति वैष्णवम्॥५२॥

  • हिंदी अनुवाद: जो जीवन में या अंत समय में गंगा स्नान करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह परम पद पाता है।

श्लोक 53

विष्णुनामसङ्कीर्तनं यो करोति सुमानवः।

यमदूताः पलायन्ते तस्य नाम प्रभावतः॥५३॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य निरंतर 'भगवान विष्णु' के नामों का कीर्तन करता है, उस नाम के प्रभाव से यमदूत दूर से ही भाग जाते हैं।

श्लोक 54

म्रियमाणो हरेर्नाम गृह्णाति यदि कश्चन।

पापकोटिसहस्राणि दहत्येव न संशयः॥५४॥

  • हिंदी अनुवाद: यदि मरते समय मनुष्य के मुख से एक बार भी 'हरि' नाम निकल जाए, तो उसके हज़ारों-करोड़ों पाप तुरंत भस्म हो जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 55

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्।

संसारतारिणी भक्तिः सर्वदुःखविनाशिनी॥५५॥

  • हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए, क्योंकि भक्ति ही इस संसार से तारने वाली और दुःखों का नाश करने वाली है।

श्लोक 56

नरकेषु तु यातनाः भुक्त्वा पापिनो खगेश्वर।

क्षीणपापास्ततो यान्ति तिर्यग्योनिषु सर्वशः॥५६॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! जब पापी जीव नरक की यातनाएँ भोगकर अपने पाप क्षीण कर लेता है, तब वह पशु-पक्षी और तिर्यक योनियों में प्रवेश करता है।

श्लोक 57

स्थावराः प्रथमं यान्ति तत कीटसरीसृपाः।

जलचराः पक्षिणश्चैव पशवश्च ततः परम्॥५७॥

  • हिंदी अनुवाद: सबसे पहले वह वृक्ष-पौधे, फिर कीड़े-मकौड़े, जलचर, पक्षी और अंत में चौपाये पशु बनता है।

श्लोक 58

ततो मानुषतां प्राप्य लभते पूर्वजं फलम्।

व्याधितो दरिद्रश्चैव जायते पापशेषतः॥५८॥

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद जब उसे मनुष्य योनि मिलती है, तब बचे हुए पापों के कारण वह रोगी, अभागा और दरिद्र होता है।

श्लोक 59

कुष्ठी च जायते सोऽपि ब्रह्मघ्नश्च क्षयी भवेत्।

मद्यपः श्यावदन्तश्च स्वर्णस्तेयी च नखी भवेत्॥५९॥

  • हिंदी अनुवाद: महापापी कुष्ठ रोगी, ब्रह्मघाती टीबी का रोगी, मद्यप काले दाँतों वाला और सोने का चोर ख़राब नाखूनों वाला होता है।

श्लोक 60

एवं क्रमेण भोक्तव्यं कर्मणां फलमात्मनः।

तस्मात् पुण्यं प्रकुर्वीत य इच्छेच्छुभमात्मनः॥६०॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार जीव को अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे सदा पुण्य कर्म करने चाहिए।

श्लोक 61

दानं दया च दमश्च शौचं भक्तिश्च केशवे।

एतानि सर्वमर्त्यानां तारकाणि भवाम्बुधौ॥६१॥

  • हिंदी अनुवाद: दान, दया, इंद्रिय-संयम, पवित्रता और भगवान केशव में भक्ति—ये गुण ही मनुष्यों को भवसागर से पार उतारने वाले हैं।

श्लोक 62

एतत् ते कथितं तार्क्ष्य यमयातन वर्णनम्।

पापिनां या दुर्गतिश्च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥६२॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान बोले—हे गरुड़! मैंने तुमसे यम यातनाओं और पापियों की दुर्गति का वर्णन कर दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 63

गरुड़ उवाच

श्रुतं मया महाविष्णो यमयातन वर्णनम्।

येन शृत्वा मनः कम्पो जायते मे जनार्दन॥६३॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! यम यातनाओं का यह भयानक वर्णन सुनकर मेरा मन कांप उठा है।

श्लोक 64

कथं नरकमुक्त्वा तु जीवो याति शुभां गतिम्।

तन्मे ब्रूहि कृपासिन्धो सर्वलोकाभयं प्रदे॥६४॥

  • हिंदी अनुवाद: हे कृपासिंधु! अब मुझे कृपा करके वह उपाय बताइए, जिससे जीव नरक की यातनाओं से मुक्त होकर उत्तम गति प्राप्त कर सके?

श्लोक 65

श्रीभगवानुवाच

साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया।

तत्सर्वं ते प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गरुड़ात्मज॥६५॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! तुमने समस्त लोकों के कल्याण के लिए बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अब मैं तुम्हें वह उपाय सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनो।

श्लोक 66

और्ध्वदैहिककार्यं च यः करोति सुपुत्रकः।

पिण्डदानं च दानं च तेन मुक्तो भवेन्मृतः॥६६॥

  • हिंदी अनुवाद: जो सुयोग्य पुत्र अपने मृत माता-पिता का और्ध्वदैहिक (अन्त्येष्टि व श्राद्ध) कर्म, पिंडदान और दान करता है, उससे मृत आत्मा नरक से मुक्त हो जाती है।

श्लोक 67

श्राद्धं च तिलतर्पणं च गवां ग्रासं च यो ददेत्।

पितरस्तस्य तृप्यन्ति मुच्यन्ते यमयातनात्॥६७॥

  • हिंदी अनुवाद: जो पुत्र तिलों से तर्पण, श्राद्ध और गाय को ग्रास देता है, उसके पितृ तृप्त होकर यम की यातनाओं से छूट जाते हैं।

श्लोक 68

गौदानं च तथा कुर्यात् वैतरण्यास्तरीतरे।

स सुखेन नदीं तीर्त्वा याति विष्णुपुरं शुभम्॥६८॥

  • हिंदी अनुवाद: जो वैतरणी पार करने के लिए 'गोदान' करता है, वह वैतरणी नदी को सुखपूर्वक पार करके विष्णुलोक पहुँचता है।

श्लोक 69

दीपदानं च यो दद्यात् पथि यमस्य शान्तये।

तस्यान्धकारो नश्येत यममार्गे सुदारुणे॥६९॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मार्ग के प्रकाश हेतु दीपदान करता है, यमलोक के भयंकर अंधेरे मार्ग में उसका प्रकाश हो जाता है।

श्लोक 70

शय्यादानं वस्त्रदानं अन्नदानं तथोदकम्।

एतानि सर्वदानानि यातनानाशकानि च॥७०॥

  • हिंदी अनुवाद: बिस्तर, वस्त्र, अन्न और जल का दान—ये सभी दान यमलोक की यातनाओं को नष्ट कर देते हैं।

श्लोक 71

इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे यमयातनानिरूपणं नाम तृतीयोऽध्यायः॥७१॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'यमयातनानिरूपण' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ।

श्लोक 72

हरिः ॐ तत्सच्छ्रीकृष्णार्पणमस्तु॥७२॥

  • हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्री कृष्ण को समर्पित है।

श्लोक 73

नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥७३॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को नमस्कार है।

श्लोक 74

य इदं पठते नित्यं शृणोति च समाहितः।

सर्वपापैः प्रमुच्येत विष्णुलोके महीयते॥७४॥

  • हिंदी अनुवाद: जो इस अध्याय का नित्य पाठ करता है या एकाग्र होकर सुनता है, वह सब पापों से छूटकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 75

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥७५॥

  • हिंदी अनुवाद: सब मंगलों का मंगल करने वाली, कल्याणमयी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली माँ गौरी नारायणी! आपको नमस्कार है।

श्लोक 76

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।

करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥७६॥

  • हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय, बुद्धि या स्वभाव से मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब भगवान श्रीमन नारायण को समर्पित करता हूँ।

श्लोक 77

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥७७॥

  • हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी का कल्याण हो और कोई दुःखी न हो।

श्लोक 78

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥७८॥

  • हिंदी अनुवाद: आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तीनों तापों की शांति हो।

श्लोक 79

॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥७९॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री हरि ही परम सत्य हैं।

श्लोक 80

॥ इति शुभम् ॥८०॥

  • हिंदी अनुवाद: सब शुभ और कल्याणकारी हो।

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