गरुड़ पुराण चौथा अध्याय: पापों का फल और नरक वर्णन (Garud Puran Adhyay 4 All 90 Slokas)

 

गरुड़ पुराण चौथा अध्याय पापकर्म विपाक और विभिन्न नरकों का वर्णन

गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान श्रीहरि से पूछते हैं कि कौन-कौन से विशिष्ट पापों के कारण जीव को कौन-कौन से नरक भोगने पड़ते हैं और नरक भोगने के बाद वह पृथ्वी पर किन-किन योनियों में जन्म लेता है।

गरुड़ पुराण चतुर्थ अध्याय: 1 से 90 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद

श्लोक 1

गरुड़ उवाच

केन केनेह पापेन पतन्ति नरकेषु च।

या याश्च यातना भुङ्क्त्वा जायन्ते केषु जन्तुषु॥१॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे प्रभु! इस संसार में किन-किन पापों को करने से जीव नरकों में गिरते हैं? और वहाँ यातनाएँ भोगने के बाद वे किन-किन जीवों की योनियों में जन्म लेते हैं?

श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच

शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि पापकर्मविपाकजम्।

यैः पापैः यान्ति नरकान् योनिश्चैव पृथक् पृथक्॥२॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें पाप कर्मों के फल और उनके परिणाम का वर्णन सुनाता हूँ, जिनके कारण पापी जीव अलग-अलग नरकों में जाते हैं और फिर विभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 3

ब्रह्मघ्नश्च सुरापायी गोघ्नश्च बालघातकः।

स्त्रीघाती गर्भवक्ता च महापातकिनश्च ते॥३॥

  • हिंदी अनुवाद: ब्राह्मण की हत्या करने वाला, मदिरापान करने वाला, गोहत्यारा, बालक की हत्या करने वाला, स्त्री की हत्या करने वाला और गर्भ गिराने वाला—ये सभी 'महापापी' कहलाते हैं।

श्लोक 4

परद्रव्यापहारी च परस्त्रीगामी तथैव च।

सुहृद्द्रोही कृतघ्नश्च महापातकिसंज्ञिताः॥४॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों का धन हड़पने वाला, पराई स्त्री के साथ गमन करने वाला, मित्र से द्रोह करने वाला और किए गए उपकार को न मानने वाला (कृतघ्न)—ये भी महापापियों की श्रेणी में आते हैं।

श्लोक 5

ते पतन्ति महाघोरे रौरवे नरके भृशम्।

यावत्कल्पं प्रपच्यन्ते यमदूतैः प्रताडिताः॥५॥

  • हिंदी अनुवाद: ऐसे महापापी जीव अत्यंत भयानक 'रौरव' नरक में गिरते हैं और यमदूतों द्वारा पीटे जाते हुए कल्पों तक यातना सहते हैं।

श्लोक 6

ततो निष्क्रम्य नरकात् पश्चात् तिर्यक् त्वमाप्नुयुः।

ब्रह्महा क्षयरोगी स्यात् गोघ्नश्चापि च पंगुकः॥६॥

  • हिंदी अनुवाद: नरक भोगने के बाद वे पशु-पक्षी आदि योनियों में जाते हैं। इसके बाद जब मनुष्य बनते हैं, तो ब्रह्मघाती टीबी (क्षयरोग) का रोगी और गोहत्यारा लंगड़ा/अपाहिज होता है।

श्लोक 7

कन्याघाती भवेत् कुष्ठी सुरापायी श्यावदन्तकः।

स्त्रीघाती च भवेद्रोगी गर्भवक्ता च हिंस्रकः॥७॥

  • हिंदी अनुवाद: कन्या की हत्या करने वाला कुष्ठ रोगी, शराब पीने वाला काले दाँतों वाला, स्त्री की हत्या करने वाला निरंतर रोगी और गर्भपात कराने वाला क्रूर हिंसक पशु बनता है।

श्लोक 8

परद्रव्यापहारी तु दरिद्रो भृशमुद्विग्नः।

परस्त्रीगामी पुरुषाः क्लीबतां यान्ति जन्मनि॥८॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों का धन चुराने वाला अत्यंत दरिद्र और दुःखी होता है, तथा पराई स्त्री से व्यभिचार करने वाला पुरुष अगले जन्म में नपुंसक (क्लीव) बनता है।

श्लोक 9

सुहृद्द्रोही च उलूकः स्यात् कृतघ्नः कृमिरेव च।

मृषावादी च मूकः स्याच्छ्रोता काणस्तथैव च॥९॥

  • हिंदी अनुवाद: मित्र से द्रोह करने वाला उल्लू, कृतघ्न कीड़ा, झूठी गवाही देने वाला या झूठ बोलने वाला गूंगा और पाप की बातें सुनने वाला काना होता है।

श्लोक 10

विषदाता भवेत् सर्पो जगद्धाती च सूकरः।

अन्नहारी च मूषकः स्थानापहारी च पिपीलिका॥१०॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों को विष देने वाला ज़हरीला सांप, जगत् का अहित करने वाला सूअर, अन्न चुराने वाला चूहा और दूसरों की ज़मीन या घर हड़पने वाला चींटी बनता है।

श्लोक 11

जलहारी प्लवो ज्ञेयो धान्यहारी च मर्कटः।

कांस्यहारी च हंसः स्यात् वस्त्रहारी च श्वित्रिकः॥११॥

  • हिंदी अनुवाद: जल की चोरी करने वाला जलपक्षी, अनाज चुराने वाला बंदर, कांसा चुराने वाला हंस और वस्त्र चुराने वाला सफेद कुष्ठ रोगी होता है।

श्लोक 12

तैलहारी तैलपः स्यात् फलहारी च मर्कटः।

काष्ठहारी च कीटः स्यात् पुष्पहा भ्रामरो भवेत्॥१२॥

  • हिंदी अनुवाद: तेल चुराने वाला तेलचट्टा (तिलचट्टा), फल चुराने वाला बंदर, लकड़ी चुराने वाला घुन/कीड़ा और फूल चुराने वाला भौंरा बनता है।

श्लोक 13

उपानद्धारी सर्पः स्यात् शाकहारी च शुकः स्मृतः।

गन्धहारी च छुच्छुन्द्री गृहहारी च वृश्चिकः॥१३॥

  • हिंदी अनुवाद: जूते-चप्पल चुराने वाला सांप, हरी सब्जियाँ चुराने वाला तोता, सुगंधित वस्तुएँ चुराने वाला छछूंदर और दूसरों का घर छीनने वाला बिच्छू बनता है।

श्लोक 14

एवमादि सुगंधेषु पापिष्ठाः पापकारिणः।

पतन्ति नरके घोरे भुञ्जते यातना भृशम्॥१४॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार पाप कर्म करने वाले सभी पापी जीव घोर नरकों में गिरकर अत्यंत भयंकर यातनाएँ भोगते हैं।

श्लोक 15

कुम्भीपाके च पच्यन्ते तप्ततैलघटेषु च।

ताड्यन्ते मुद्गरैश्चैव यमदूतैः सुदारुणैः॥१५॥

  • हिंदी अनुवाद: उन्हें 'कुंभीपाक' नरक में उबलते हुए तेल के पात्रों में पकाया जाता है और क्रूर यमदूतों द्वारा भारी गदाओं से पीटा जाता है।

श्लोक 16

असिपत्रवने चापि पत्रैश्छिद्यन्ति चाङ्गकम्।

कालसूत्रे च पात्यन्ते ताड्यन्ते शस्त्रकोटिभिः॥१६॥

  • हिंदी अनुवाद: असिपत्रवन में तीखे पत्तों से उनके अंग काटे जाते हैं और कालसूत्र नरक में उन पर करोड़ों तीखे अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार किया जाता है।

श्लोक 17

अंधतमिस्रे पात्यन्ते गाढतामिस्रसंवृते।

दश्यन्ते क्रिमिभिश्चैव सूचामुखैः सुदारुणैः॥१७॥

  • हिंदी अनुवाद: घने अंधेरे से ढके 'अंधतमिस्र' नरक में पापियों को फेंका जाता है, जहाँ सुई जैसे मुख वाले भयानक कीड़े उन्हें डसते हैं।

श्लोक 18

तप्तलोहशलाकाभिर्बिध्यन्ते सर्वसन्धिषु।

ज्वलदग्नौ पात्यन्ते ताड्यन्ते यमकिङ्करैः॥१८॥

  • हिंदी अनुवाद: उनके शरीर के सभी जोड़ों में गर्म लोहे की सलाखें चुभोई जाती हैं और यमदूत उन्हें धधकती हुई आग में पटककर मारते हैं।

श्लोक 19

यदा पापं क्षयं याति नरकेष्वेव भुञ्जताम्।

तदा ते तिर्यगाद्येषु जायन्ते पापशेषतः॥१९॥

  • हिंदी अनुवाद: जब नरक में यातना भोगते-भोगते पापों का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाता है, तब बचे हुए पापों का फल भुगतने के लिए वे जीव पशु-पक्षियों की योनियों में आते हैं।

श्लोक 20

पशुपक्षिमृगाद्येषु भ्रामयित्वा पुनः पुनः।

मानुषं दुर्लभं देहं लभन्ते भाग्ययोगतः॥२०॥

  • हिंदी अनुवाद: पशु, पक्षी और जंगली जानवरों की विभिन्न योनियों में बार-बार भटकने के बाद, किसी बड़े भाग्य से उन्हें पुनः अत्यंत दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त होता है।

श्लोक 21

तत्रापि पापशेषेण भवन्ति विकलांगिनः।

अंधा बधिरा मूकाश्च दरिद्रा व्याधिपीडिताः॥२१॥

  • हिंदी अनुवाद: मनुष्य जन्म मिलने पर भी बचे हुए पाप कर्मों के कारण वे अंगहीन, अंधे, बहरे, गूंगे, अत्यंत दरिद्र और भांति-भांति के रोगों से पीड़ित होते हैं।

श्लोक 22

वेदनिन्दकश्च नास्तिकः धर्मशास्त्रविनाशकः।

स याति नरकं घोरम् अंधतमिस्रसंज्ञितम्॥२२॥

  • हिंदी अनुवाद: वेदों की निंदा करने वाला, ईश्वर को न मानने वाला (नास्तिक) और धर्मशास्त्रों का अपमान करने वाला जीव भयानक 'अंधतमिस्र' नरक में जाता है।

श्लोक 23

देवता गुरु विप्राणां निंदां कुर्वन्ति ये नराः।

ते पच्यन्ते नरके घोरे यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥२३॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य देवता, गुरु और ब्राह्मणों की निंदा करते हैं, वे सूर्य और चंद्रमा की स्थिति तक घोर नरक में पकाए जाते हैं।

श्लोक 24

मातापितृभ्यां यः कुर्यात् द्रोहमप्रियमेव च।

स पात्यते कुम्भीपाके यमदूतैः प्रताडितः॥२४॥

  • हिंदी अनुवाद: जो अपने माता-पिता से द्रोह करता है या उनका दिल दुखाता है, उसे यमदूतों द्वारा पीटते हुए 'कुंभीपाक' नरक में डाला जाता है।

श्लोक 25

सत्यं त्यक्त्वा तु यो मर्त्यो मृषा वदति सर्वदा।

तस्य जिह्वा छिन्नभिन्ना क्रकचैः क्रियते भृशम्॥२५॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सत्य का त्याग करके सदा झूठ बोलता है, उसकी जीभ को यमलोक में आरी से काट-काटकर अलग किया जाता है।

श्लोक 26

वृथा पशून यो हन्ति स्वमांसपुष्टये नरः।

स पात्यते सूकरमुखे भक्ष्यते क्रूरजन्तुभिः॥२६॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य केवल अपने मांस और शरीर के पोषण के लिए बेज़ुबान पशुओं की हत्या करता है, वह 'सूकरमुख' नरक में खूंखार जानवरों द्वारा खाया जाता है।

श्लोक 27

विश्वासघाती यो मर्त्यो मित्रद्रोही तथैव च।

तस्य देहात् मांसखण्डैः भक्ष्यन्ते यमकुक्कुरैः॥२७॥

  • हिंदी अनुवाद: विश्वासघात करने वाले और मित्र को धोखा देने वाले मनुष्य के शरीर के मांस के टुकड़ों को यमलोक के भयंकर कुत्ते नोचकर खाते हैं।

श्लोक 28

साधूनां दूषणं कुर्यात् सज्जनानां च वञ्चकः।

स याति रौरवं घोरं यत्रास्ते यातना महती॥२८॥

  • हिंदी अनुवाद: संतों-साधुओं में दोष निकालने वाला और सज्जनों को ठगने वाला व्यक्ति घोर 'रौरव' नरक में जाता है, जहाँ अपार यातनाएँ हैं।

श्लोक 29

अग्निदः गरदश्चैव तथा चैव ह्युपपाती।

एते यान्ति नरकं घोरं यावदाहूतसंप्लवम्॥२९॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों के घर में आग लगाने वाला, विष देने वाला और दूसरों पर अत्याचार करने वाला—ये महाप्रलय तक घोर नरकों में जलते हैं।

श्लोक 30

पञ्चसूनाकृता पापाः गृहिणां ये च नित्यशः।

तेषां शान्त्यै प्रकुर्वीत पञ्चयज्ञान् नरोत्तमः॥३०॥

  • हिंदी अनुवाद: गृहस्थ जीवन में चूल्हा, चक्की, झाड़ू, ओखली और पानी के घड़े से नित्य जो जाने-अनजाने 5 प्रकार की हिंसा (पाप) होती हैं, उनकी शांति के लिए प्रतिदिन 'पंचमहायज्ञ' करने चाहिए।

श्लोक 31

अकृत्वा पञ्चयज्ञांश्च भुङ्क्ते यो केवलं स्वयं।

स याति कृमिभोज्यं च पच्यते यमशासने॥३१॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य पंचमहायज्ञ किए बिना केवल अपने लिए भोजन पकाता और खाता है, वह यमराज के शासन में 'कृमिभोज्य' नरक में पकाया जाता है।

श्लोक 32

अतिथिं विमुखं कृत्वा यो भुङ्क्ते स्वे गृहे नरः।

तस्यान्नं विष्ठासमं ज्ञेयं जलं मूत्रसमं तथा॥३२॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपने द्वार से अतिथि को भूखा मोड़कर स्वयं भोजन करता है, उसका अन्न विष्ठा (मल) के समान और जल मूत्र के समान बन जाता है।

श्लोक 33

तस्मादतिथिं पूजयेत् सर्वभावेन मानवः।

अतिथिपूजनेनैव तुष्यन्ते सर्वदेवताः॥३३॥

  • हिंदी अनुवाद: इसलिए मनुष्य को पूरे भाव से अतिथि का सत्कार करना चाहिए; क्योंकि अतिथि के पूजन से सभी देवता प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 34

अदत्तदानाः पापिष्ठाः केवलं स्वोदरं भराः।

ते यान्ति नरकं घोरं निराहारा सुदुःखिताः॥३४॥

  • हिंदी अनुवाद: दान न देने वाले केवल अपना पेट भरने वाले पापी जीव यमलोक के घोर नरकों में अत्यंत भूखे-प्यासे रहकर तड़पते हैं।

श्लोक 35

ये तु दानं प्रकुर्वन्ति ब्राह्मणेषु तपस्विषु।

ते यान्ति देवयानेन विष्णुलोकं सनातनम्॥३५॥

  • हिंदी अनुवाद: परंतु जो मनुष्य योग्य ब्राह्मणों और तपस्वियों को दान देते हैं, वे देवयान मार्ग से सनातन विष्णुलोक जाते हैं।

श्लोक 36

गौदानं च तिलदानं च भूमिदानं तथैव च।

एतानि पापनाशाय प्रकुर्वीत विचक्षणः॥३६॥

  • हिंदी अनुवाद: बुद्धिमान मनुष्य को अपने पापों के नाश के लिए गोदान, तिलदान और भूमिदान अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 37

विद्यादानं महादानं सर्वदानेभ्य उत्तमम्।

तेन दानेन लभते परमं पदमव्ययम्॥३७॥

  • हिंदी अनुवाद: विद्या का दान सभी दानों में श्रेष्ठ और महादान माना गया है; इस दान से जीव परम अविनाशी पद प्राप्त करता है।

श्लोक 38

अभयदानं च यो दद्यात् सर्वभूतेषु मानवः।

न तस्य यमभीतिश्च न च नरकपातनम्॥३८॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य समस्त प्राणियों को अभय दान (दया और जीवनदान) देता है, उसे न यमराज का भय होता है और न ही वह नरक में गिरता है।

श्लोक 39

यथा वृक्षस्य सम्पुष्पैः फलं प्राप्नोति मानवः।

तथा धर्मस्य करणे सुखं प्राप्नोति सर्वदा॥३९॥

  • हिंदी अनुवाद: जैसे वृक्ष पर फूल आने के बाद फल मिलता है, वैसे ही धर्म का आचरण करने से मनुष्य को सदा सच्चा सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 40

अधर्मस्य तु करणे दुःखं प्राप्नोति दारुणम्।

नरकेषु च पात्यन्ते ताड्यन्ते यमकिङ्करैः॥४०॥

  • हिंदी अनुवाद: अधर्म का आचरण करने से मनुष्य को अत्यंत भयंकर दुःख मिलता है और वह नरक में गिरकर यमदूतों से पीटा जाता है।

श्लोक 41

एवमेतन्महाभाग पाप कर्मविपाकजम्।

कथितं ते मया सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥४१॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु बोले—हे महाभाग गरुड़! इस प्रकार मैंने तुम्हें पाप कर्मों के फल और परिणाम का पूरा विवरण सुना दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 42

गरुड़ उवाच

श्रुतं मया महाविष्णो पापकर्मविपाकजम्।

अधुना श्रोतुमिच्छामि प्रायश्चित्तं सुपावनम्॥४२॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! पाप कर्मों के फल को मैंने सुन लिया। अब मैं पापों से मुक्ति दिलाने वाला परम पवित्र प्रायश्चित्त विधान सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 43

येन कृतेन पापिष्ठो मुच्यते सर्वपातकैः।

न याति नरकं घोरं यमदण्डं न पश्यति॥४३॥

  • हिंदी अनुवाद: जिस प्रायश्चित्त को करने से पापी से पापी मनुष्य भी सब पापों से छूट जाता है, नरक नहीं जाता और यमराज का दंड नहीं देखता।

श्लोक 44

श्रीभगवानुवाच

साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया।

प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गरुड़ात्मज॥४४॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! लोक कल्याण की भावना से तुमने बहुत सुंदर प्रश्न पूछा है। अब मैं तुम्हें पापमुक्ति का प्रायश्चित्त सुनाता हूँ, सुनो।

श्लोक 45

प्रायश्चित्तं तु कर्तव्यं पापे जाते तु सर्वथा।

अकृत्वा प्रायश्चित्तं तु याति नरकमनिन्दितम्॥४५॥

  • हिंदी अनुवाद: यदि अनजाने में पाप हो जाए, तो तुरंत विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए। बिना प्रायश्चित्त किए जीव अवश्य ही घोर नरक में जाता है।

श्लोक 46

चान्द्रायणं च कुर्याद्वा प्राजापत्यमथापि वा।

पापक्षयाय मर्त्योऽसौ विशुद्धात्मा भवेत्ततः॥४६॥

  • हिंदी अनुवाद: अपने पापों के नाश के लिए मनुष्य को 'चांद्रायण व्रत' या 'प्राजापत्य व्रत' करना चाहिए; इससे आत्मा पूर्णतः शुद्ध हो जाती है।

श्लोक 47

गायत्रीजपसक्तश्च वेदाभ्यासरतः सदा।

स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥४७॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य निरंतर गायत्री मंत्र का जप करता है और वेदों के अध्ययन में लगा रहता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजनीय होता है।

श्लोक 48

गंगास्नानं च यो कुर्यात् तीर्थयात्रां तथैव च।

तस्य पापं क्षयं याति सूर्योदये तमों यथा॥४८॥

  • हिंदी अनुवाद: जो गंगा स्नान और पवित्र तीर्थों की यात्रा करता है, उसके पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य निकलने पर अंधकार।

श्लोक 49

एकादशीव्रतं यश्च कुर्याद्भक्तिसमन्वितः।

सर्वपापैः प्रमुच्येत विष्णुलोकं च गच्छति॥४९॥

  • हिंदी अनुवाद: जो भक्तिभाव से एकादशी का व्रत रखता है, वह समस्त पापों से छूटकर भगवान विष्णु के परम धाम को जाता है।

श्लोक 50

हरिनामसङ्कीर्तनं च सर्वपापप्रणाशनम्।

कलौ युगे विशेषेण नामेव परमं पदम्॥५०॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान हरि का नाम-संकीर्तन सभी पापों को नष्ट करने वाला है। विशेष रूप से कलयुग में भगवान का नाम ही परम पद देने वाला है।

श्लोक 51

हरिः हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः।

अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येवकतो ह्यनलः॥५१॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान हरि का नाम दुष्ट चित्त से भी लिया जाए तो पापों का नाश करता है; ठीक वैसे ही जैसे बिना इच्छा के भी आग को छूने पर हाथ जल जाता है।

श्लोक 52

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुस्मरणमाचरेत्।

स्मृते सकलकल्याणं लभते मानवो नृप॥५२॥

  • हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए; उनके स्मरण मात्र से मनुष्य को संपूर्ण कल्याण प्राप्त होता है।

श्लोक 53

तुलसीपत्रदानेन पूजनेन हरेस्तथा।

पापकोटिसहस्राणि नश्यन्त्येव न संशयः॥५३॥

  • हिंदी अनुवाद: तुलसी पत्र अर्पित करके भगवान श्रीहरि की पूजा करने से हज़ारों-करोड़ों पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 54

दीर्घकालकृतं पापं क्षणार्धेन विनश्यति।

वासुदेवस्य भक्तानां नास्ति किञ्चिद्भयं क्वचित्॥५४॥

  • हिंदी अनुवाद: लंबे समय से किए गए पाप भी वासुदेव की भक्ति से आधे क्षण में नष्ट हो जाते हैं। भगवान वासुदेव के भक्तों को कहीं कोई भय नहीं होता।

श्लोक 55

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥५५॥

  • हिंदी अनुवाद: (श्रीहरि कहते हैं) 'सब धर्मों और आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।'

श्लोक 56

एतद्रहस्यं परमं पापमुक्तिप्रदायकम्।

कथितं ते मया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया॥५६॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! लोक कल्याण के लिए मैंने तुम्हें पापों से मुक्ति देने वाला यह परम गोपनीय रहस्य सुना दिया है।

श्लोक 57

य इदं पठते नित्यं प्रायश्चित्तविधिं शुभम्।

स सर्वपापविमुक्तो विष्णुलोके महीयते॥५७॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस पावन प्रायश्चित्त विधि का नित्य पाठ करता है, वह सब पापों से छूटकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 58

अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो लभते धनम्।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो गरुड़स्य प्रसादतः॥५८॥

  • हिंदी अनुवाद: इसके प्रभाव और गरुड़ जी की कृपा से पुत्रहीन को पुत्र, दरिद्र को धन मिलता है और मनुष्य समस्त पापों से छूट जाता है।

श्लोक 59

श्रोता च वक्ता च उभौ याति विष्णोः परं पदम्।

नरकस्य भयं नास्ति यमदण्डं न पश्यति॥५९॥

  • हिंदी अनुवाद: इस कथा का श्रोता और वक्ता दोनों विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं। उन्हें नरक का भय नहीं होता और न ही यमदण्ड देखना पड़ता है।

श्लोक 60

इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे पापफल-नरकवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥६०॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'पापफल और नरक वर्णन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ।

श्लोक 61

हरिः ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु॥६१॥

  • हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब ब्रह्म को समर्पित है।

श्लोक 62

नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥६२॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को नमस्कार है।

श्लोक 63

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।

प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥६३॥

  • हिंदी अनुवाद: वसुदेवपुत्र भगवान श्रीकृष्ण, श्रीहरि, परमात्मा और शरण में आए भक्तों के क्लेश नष्ट करने वाले गोविंद को बारंबार प्रणाम है।

श्लोक 64

यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।

तस्माच्छुभेन भावेन भजेत् सर्वेश्वरं हरिम्॥६४॥

  • हिंदी अनुवाद: मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे वैसे ही सिद्धि प्राप्त होती है। इसलिए शुभ और पवित्र भाव से परमेश्वर श्रीहरि का भजन करना चाहिए।

श्लोक 65

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः।

त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥६५॥

  • हिंदी अनुवाद: 'हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्म करने वाला हूँ, मेरी आत्मा पाप से युक्त है; आप मेरे समस्त पापों को हरकर मेरी रक्षा करें।'

श्लोक 66

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।

तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥६६॥

  • हिंदी अनुवाद: 'हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई अन्य सहारा नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए करुणा भाव से मेरी रक्षा करें, रक्षा करें।'

श्लोक 67

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।

गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥६७॥

  • हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से पृथ्वी का पालन करें, गायों और विद्वानों का नित्य शुभ हो तथा समस्त लोक सुखी हों।

श्लोक 68

काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।

देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥६८॥

  • हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न से परिपूर्ण रहे, यह देश उपद्रव से रहित हो और सज्जन निर्भय रहें।

श्लोक 69

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥६९॥

  • हिंदी अनुवाद: सब सुखी हों, सब निरोगी रहें, सब मंगल देखें और कोई दुःखी न हो।

श्लोक 70

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥७०॥

  • हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की पूर्ण शांति हो।

श्लोक 71

विष्णुः सर्वेश्वरः श्रीमान् सर्वभूतहितैषिणः।

तस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥७१॥

  • हिंदी अनुवाद: सर्वेश्वर, श्रीमान और समस्त प्राणियों का हित चाहने वाले भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 72

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥७२॥

  • हिंदी अनुवाद: अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ और जानकीनाथ रामचंद्र जी का मैं भजन करता हूँ।

श्लोक 73

नामावलिं इमां नित्यं यः पठेद्भक्तिभावतः।

न तस्य यमभीतिश्च विष्णुलोकं स गच्छति॥७३॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस नामावली का भक्तिभाव से नित्य पाठ करता है, उसे यम का भय नहीं होता और वह विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 74

संसार कूपे पतितं विषयानन्दमोहितम्।

उद्धर त्वं महाविष्णो कृपा दृष्टि प्रपातने॥७४॥

  • हिंदी अनुवाद: हे महाविष्णु! संसार रूपी कुएँ में गिरे और विषय-वासनाओं से मोहित मुझ जीव का अपनी कृपा दृष्टि से उद्धार करें।

श्लोक 75

नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।

तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥७५॥

  • हिंदी अनुवाद: हम नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे भगवान विष्णु हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।

श्लोक 76

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः।

वेद्यैः सांगपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः॥७६॥

  • हिंदी अनुवाद: ब्रह्मा, वरुण, इंद्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रों से जिनकी स्तुति करते हैं तथा सामवेद के गायक सांग-उपनिषदों सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं...

श्लोक 77

ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो।

यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥७७॥

  • हिंदी अनुवाद: योगीजन ध्यान में स्थित होकर अपने अंतःकरण से जिनका दर्शन करते हैं और देवता व असुर जिनके अंत को नहीं जानते, उन परमदेव को नमस्कार है।

श्लोक 78

मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।

मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥७८॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि सब मंगल करने वाले हैं।

श्लोक 79

सर्वथा सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।

येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥७९॥

  • हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में मंगल के धाम भगवान श्रीहरि विराजमान हैं, उनके किसी भी कार्य में कभी कोई अमंगल नहीं होता।

श्लोक 80

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।

येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥८०॥

  • हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में नीलमणि के समान श्यामवर्ण भगवान जनार्दन बसे हैं, उन्हीं का लाभ है, उन्हीं की विजय है; उनकी पराजय कभी नहीं हो सकती।

श्लोक 81

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥८१॥

  • हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, विभूति और अचल नीति है—यह मेरा मत है।

श्लोक 82

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।

करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥८२॥

  • हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय, बुद्धि या प्रकृति के स्वभाव से मैं जो भी कार्य करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।

श्लोक 83

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द नामेति सदा जपस्व॥८३॥

  • हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ! हे नारायण! हे वासुदेव! हे मेरी जीभ! तू सदा गोविंद नाम के इस अमृत का पान करती रह।

श्लोक 84

प्रसीद विश्वेश्वर विश्वरूप प्रसीद नारायण हे कृपालु।

त्वत्पादपद्मे मम भक्तिरस्तु सदा सर्वदा देहि विभो प्रसादम्॥८४॥

  • हिंदी अनुवाद: हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! प्रसन्न होइए। हे कृपालु नारायण! प्रसन्न होइए। हे विभो! आपके चरण कमलों में मेरी सदा भक्ति बनी रहे, ऐसा वरदान दीजिए।

श्लोक 85

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सर्वपापहरणी सर्वकामप्रदायिने नमः॥८५॥

  • हिंदी अनुवाद: सब पापों को हरने वाले और समस्त मनोकामनाओं को पूरा करने वाले भगवान वासुदेव को नमस्कार है।

श्लोक 86

गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।

अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥८६॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ और श्रवण से जीव सब पापों से मुक्त हो जाता है और अंत समय में विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 87

इति चतुर्थोऽध्यायः सम्पूर्णः॥८७॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार गरुड़ पुराण का चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।

श्लोक 88

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥८८॥

  • हिंदी अनुवाद: तीनों प्रकार के दुःखों और तापों की शांति हो।

श्लोक 89

॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥८९॥

  • हिंदी अनुवाद: परम सत्य स्वरूप श्री हरि को नमन।

श्लोक 90

॥ इति शुभम् ॥९०॥

  • हिंदी अनुवाद: सब शुभ, मंगलमय और कल्याणकारी हो।

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