गरुड़ पुराण पांचवां अध्याय: कुयोनि और पुनर्जन्म वर्णन (Garud Puran Adhyay 5 All 75 Slokas)

 

गरुड़ पुराण पांचवां अध्याय कुयोनि वर्णन और पापकर्मों के अनुसार पुनर्जन्म चक्र


गरुड़ पुराण के पंचम अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान श्रीहरि से पूछते हैं कि नरक की यातनाएँ भोगने के बाद पापी जीव किस प्रकार नीच (कुयोनियों) में जन्म लेते हैं और उनके पापों के चिन्ह किस प्रकार प्रकट होते हैं।

गरुड़ पुराण पंचम अध्याय: 1 से 75 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद

श्लोक 1

गरुड़ उवाच

नरकेषु तु भुक्त्वा तु यातनाः पापकारिणः।

जायन्ते केषु जन्तुषु केषु लक्षण लक्षिताः॥१॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे प्रभु! पापी जीव नरकों में यातनाएँ भोगने के बाद किन-किन योनियों में जन्म लेते हैं और उनके शरीर में कौन-कौन से पाप के लक्षण दिखाई देते हैं?

श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच

शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि योनयो पाप कर्मणाम्।

लैंगिका च तथा व्याधिः जायते पापशेषतः॥२॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें पापियों की योनियों का वर्णन सुनाता हूँ और यह भी बताता हूँ कि बचे हुए पापों से उनके शरीर में कौन से लक्षण व बीमारियाँ होती हैं।

श्लोक 3

महापातकजाहैवे तिर्यग्योनिषु सर्वशः।

भ्रमन्ति सुचिरं कालं स्थावरेषु च सर्वशः॥३॥

  • हिंदी अनुवाद: महापाप करने वाले जीव लंबे समय तक पशु, पक्षी, जलचर, थलचर और पेड़-पौधों आदि स्थावर योनियों में बार-बार भटकते रहते हैं।

श्लोक 4

ब्रह्महा कुक्कुरो जायते सूकरश्च सुरापः।

स्वर्णस्तेयी क्रिमिर्जन्तुरध्यात्मा गुरुतल्पगः॥४॥

  • हिंदी अनुवाद: ब्राह्मण की हत्या करने वाला कुत्ता, शराब पीने वाला सूअर, सोने की चोरी करने वाला कीड़ा और गुरुपत्नी से कुकर्म करने वाला गिरगिट बनता है।

श्लोक 5

पितृमातृघाती चैव गर्दभो जायते ध्रुवम्।

पतिघाती भवेत् सर्पी स्त्रीघाती च पिपीलिका॥५॥

  • हिंदी अनुवाद: माता-पिता का वध करने वाला निश्चित ही गधा बनता है, पति की हत्या करने वाली स्त्री सर्पिणी और स्त्री की हत्या करने वाला चींटी बनता है।

श्लोक 6

कन्याघाती भवेत् मण्डूकः सुहृद्द्रोही च वृश्चिकः।

विश्वासघाती मस्यः स्यात् सर्व पाप समावृतः॥६॥

  • हिंदी अनुवाद: कन्या की हत्या करने वाला मेढक, मित्र से द्रोह करने वाला बिच्छू और विश्वासघात करने वाला जीव जल की मछली बनता है।

श्लोक 7

धान्यहारी भवेन्मूषः ककुद्मी गोवृषध्वजः।

तिलहारी भवेत् काकः गन्धहारी च छुच्छुन्द्री॥७॥

  • हिंदी अनुवाद: अनाज चुराने वाला चूहा, तिलों की चोरी करने वाला कौआ और सुगंधित वस्तुओं को चुराने वाला छछूंदर बनता है।

श्लोक 8

रसहारी भवेत् श्वा च मांसहारी च गृध्रकः।

लवणाहारी पिपीलिका वस्त्रहारी च श्वित्रिकः॥८॥

  • हिंदी अनुवाद: रसों (दूध-घी आदि) की चोरी करने वाला कुत्ता, मांस चुराने वाला गिद्ध, नमक चुराने वाला चींटी और वस्त्र चुराने वाला सफेद कुष्ठ का रोगी होता है।

श्लोक 9

कांस्यहारी च हंसः स्यात् सुवर्णहारी च क्रिमिः।

रजतहारी भवेत् कीटो दधिहारी च बकः स्मृतः॥९॥

  • हिंदी अनुवाद: कांसा चुराने वाला हंस, सोना चुराने वाला कीड़ा, चांदी चुराने वाला घुन और दही चुराने वाला बगुला बनता है।

श्लोक 10

फलहारी भवेत् मर्कटो पुष्पहारी च भ्रामरः।

काष्ठहारी भवेत् घुनो जलहारी च जलप्लवः॥१०॥

  • हिंदी अनुवाद: फल चुराने वाला बंदर, फूल चुराने वाला भौंरा, लकड़ी चुराने वाला घुन और पानी की चोरी करने वाला जलपक्षी बनता है।

श्लोक 11

गृहहारी भवेत् सर्पो भूमिहारी च पिपीलिका।

अग्निवारी भवेत् खद्योत उष्ट्रश्चापि च वाहनः॥११॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों का घर हड़पने वाला सांप, ज़मीन छीनने वाला चींटी और आग चुराने वाला जुगनू या ऊँट बनता है।

श्लोक 12

विषदाता भवेत् व्यालो जगद्धाती च वृश्चिकः।

सीमाहारी च गर्तस्तः क्रिमिर्जायेत दारुणः॥१२॥

  • हिंदी अनुवाद: विष देने वाला अजगर, जगत् का अहित करने वाला बिच्छू और खेत की सीमा दबाने वाला गड्ढे का जहरीला कीड़ा बनता है।

श्लोक 13

अतिथिं वञ्चयित्वा यो भुङ्क्ते स्वे गृहे नरः।

स जायते वृकः क्रूरो वनमध्ये निरन्तरम्॥१३॥

  • हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति अतिथि को भूखा रखकर स्वयं भोजन कर लेता है, वह जंगल में भटकने वाला क्रूर भेड़िया बनता है।

श्लोक 14

अदत्तदानाः पापिष्ठा केवलं स्वोदरं भराः।

ते यान्ति प्रेततां घोरां तृषाक्षुत्परिपीडिताः॥१४॥

  • हिंदी अनुवाद: दान न देने वाले केवल अपना पेट भरने वाले पापी जीव भूख-प्यास से पीड़ित होकर भयंकर प्रेत योनि में जाते हैं।

श्लोक 15

वेदनिन्दकश्च नास्तिकः शास्त्रविनाशकः।

स जायते शशश्चैव जम्बूको वा वनान्तरे॥१५॥

  • हिंदी अनुवाद: वेदों की निंदा करने वाला और शास्त्रों का अपमान करने वाला नास्तिक मनुष्य जंगल में खरगोश या सियार बनता है।

श्लोक 16

वृथा पशुघ्नः पापिष्ठो मांसकामी निरंकुशः।

स जायते व्याघ्रश्चैव हिंस्रकश्च वनान्तरे॥१६॥

  • हिंदी अनुवाद: अपने स्वाद के लिए पशुओं की हत्या करने वाला पापी जीव जंगल में हिंसक बाघ (शेर) बनता है।

श्लोक 17

परदारप्रसक्त धीः परद्रव्यापहारी च।

स जायते खरश्चैव गृध्रश्चापि च काककः॥१७॥

  • हिंदी अनुवाद: पराई स्त्री में आसक्त और दूसरों का धन हड़पने वाला व्यक्ति गधा, गिद्ध या कौआ बनता है।

श्लोक 18

एवमादि बहुविधे तिर्यग्योनिषु सर्वशः।

भ्रमित्वा सर्वपापिष्ठा जन्तुतां यान्ति मानुषीम्॥१८॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार भाँति-भाँति की नीच योनियों में भटकने के बाद पापी जीव पुनः मनुष्य योनि में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 19

तत्रापि पापशेषेण भवन्ति व्याधिपीडिताः।

चिह्नानि च प्रवक्ष्यामि शृणु तार्क्ष्य समाहितः॥१९॥

  • हिंदी अनुवाद: मनुष्य बनने पर भी बचे हुए पापों के कारण वे रोगों से ग्रस्त रहते हैं। हे गरुड़! अब मैं उनके शारीरिक लक्षणों को बतलाता हूँ, ध्यान से सुनो।

श्लोक 20

ब्रह्महा क्षयरोगी स्यात् गोघ्नश्चापि च पंगुकः।

कन्याघाती भवेत् कुष्ठी सुरापायी श्यावदन्तकः॥२०॥

  • हिंदी अनुवाद: ब्रह्मघाती टीबी (क्षयरोग) से पीड़ित, गोहत्यारा लंगड़ा, कन्या की हत्या करने वाला कुष्ठ रोगी और शराबी काले दाँतों वाला होता है।

श्लोक 21

मातृहा पितृहा चैव मूकः अंधश्च जायते।

स्त्रीघाती च भवेद्रोगी गर्भवक्ता च बालघातकः॥२१॥

  • हिंदी अनुवाद: माता-पिता का वध करने वाला गूंगा और अंधा होता है; स्त्री की हत्या करने वाला रोगी और गर्भपात कराने वाला संतानहीन होता है।

श्लोक 22

परद्रव्यापहारी तु दरिद्रो भृशमुद्विग्नः।

अग्निकर्त्ता च खलतिः स्वर्णस्तेयी नखी भवेत्॥२२॥

  • हिंदी अनुवाद: दूसरों का धन चुराने वाला अत्यंत दरिद्र, दूसरों के घर में आग लगाने वाला गंजा और सोने का चोर ख़राब नाखूनों वाला होता है।

श्लोक 23

पुस्तकं हरते यस्तु जात्यन्धो जायते नरः।

विद्यानिन्दकश्च मूर्खः स्याच्छ्रोता काणस्तथैव च॥२३॥

  • हिंदी अनुवाद: ज्ञान-पुस्तक की चोरी करने वाला जन्मांध (पैदाइशी अंधा), विद्या की निंदा करने वाला मूर्ख और पाप सुनने वाला काना होता है।

श्लोक 24

साक्ष्यं वदति यः मृषा स मूक जायते नरः।

पानघाती च तृषितो विषदश्चापि मुूर्च्छितः॥२४॥

  • हिंदी अनुवाद: झूठी गवाही देने वाला मनुष्य गूंगा, जल स्रोतों को सुखाने वाला सदा प्यासा और विष देने वाला बार-बार मूर्छित होने वाला होता है।

श्लोक 25

परस्त्रीगामी पुरुषाः क्लीबतां यान्ति जन्मनि।

गुरुपत्नीगामी यस्तु सोऽपि कुष्ठी भवेद् ध्रुवम्॥२५॥

  • हिंदी अनुवाद: पराई स्त्री से व्यभिचार करने वाला पुरुष नपुंसक बनता है और गुरुपत्नी से कुकर्म करने वाला निश्चित ही कोढ़ी होता है।

श्लोक 26

एवं कर्मविपाकेन जायन्ते व्याधयो नृणाम्।

तस्मात् शान्तिं प्रकुर्वीत प्रायश्चित्तं च सर्वदा॥२६॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार अपने ही कर्मों के परिणाम से मनुष्यों को भयंकर रोग मिलते हैं। इसलिए सदा शांति और प्रायश्चित्त करना चाहिए।

श्लोक 27

दानं दया च जपशौचं होमश्च देवपूजनम्।

पापनाशकराण्येतानि प्रायश्चित्तं तथैव च॥२७॥

  • हिंदी अनुवाद: दान, दया, जप, पवित्रता, हवन, देवपूजन और विधिपूर्वक प्रायश्चित्त—ये सभी कर्म पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 28

तपसा कर्मणा वापि दानेन नियमैस्तथा।

क्षीयते सर्वपापानि विष्णुस्मरणतस्तथा॥२८॥

  • हिंदी अनुवाद: तप, शुभ कर्म, दान, नियमों के पालन और भगवान विष्णु के स्मरण से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।

श्लोक 29

एकादशीव्रतं यश्च करोति भक्तिभावतः।

स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकं च गच्छति॥२९॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य भक्तिभाव से एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से छूटकर सीधे विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 30

तुलसीदलतोयेन यो करोति हरिमर्चनम्।

तस्य पापं क्षयं याति सूर्योदये तमों यथा॥३०॥

  • हिंदी अनुवाद: जो तुलसी पत्र और जल से श्रीहरि का पूजन करता है, उसके पाप सूर्य निकलने पर अंधकार की तरह नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 31

गंगा स्नानं च यो कुर्यात् सर्वपापप्रणाशनम्।

पुनाति सकलं लोकं विष्णुपादोद्भवा नदी॥३१॥

  • हिंदी अनुवाद: विष्णु के चरणों से निकली गंगाजी में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और जीव पवित्र हो जाता है।

श्लोक 32

विष्णुनामसङ्कीर्तनं सर्वपापप्रणाशनम्।

कलौ युगे विशेषेण नामेव परमं पदम्॥३२॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु का नाम-संकीर्तन सब पापों को नष्ट करता है; कलयुग में नाम जप ही परम पद पाने का मुख्य साधन है।

श्लोक 33

म्रियमाणो हरेर्नाम गृह्णाति यदि कश्चन।

पापकोटिसहस्राणि दहत्येव न संशयः॥३३॥

  • हिंदी अनुवाद: मरते समय यदि मनुष्य के मुख से एक बार भी 'हरि' नाम निकल जाए, तो हज़ारों-करोड़ों पाप जलकर भस्म हो जाते हैं।

श्लोक 34

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्।

संसारतारिणी भक्तिः सर्वदुःखविनाशिनी॥३४॥

  • हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए, क्योंकि भक्ति ही संसार से तारने वाली है।

श्लोक 35

एतत् ते कथितं तार्क्ष्य कुयोनि वर्णनं शुभम्।

पापिनां या गतिश्चैव किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥३५॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान बोले—हे गरुड़! मैंने तुम्हें कुयोनियों और पापियों की गतियों का वर्णन सुना दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 36

गरुड़ उवाच

श्रुतं मया महाविष्णो कुयोनि वर्णनं महत्।

येन शृत्वा मनः कम्पो जायते मे जनार्दन॥३६॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! नीच योनियों का यह भयानक वर्णन सुनकर मेरा मन कांप उठा है।

श्लोक 37

कथं पुनर्जन्मपाशात् मुच्यते मानवो भुवि।

तन्मे ब्रूहि कृपासिन्धो सर्वलोकाभयं प्रदे॥३७॥

  • हिंदी अनुवाद: हे कृपासिंधु! अब मुझे वह उपाय बताइए, जिससे मनुष्य पृथ्वी पर इस पुनर्जन्म के बंधन से सदा के लिए मुक्त हो जाए?

श्लोक 38

श्रीभगवानुवाच

साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया।

संसारमोचनं तत्त्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे॥३८॥

  • हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! तुमने सब लोकों के हित के लिए बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अब मैं तुम्हें संसार-बंधन से मुक्ति देने वाला तत्व सुनाता हूँ।

श्लोक 39

सत्यं शौचं दया क्षान्तिः सन्तोषो धर्म एव च।

एतैर्युक्तो नरो नित्यं मुच्यते जन्मबन्धनात्॥३९॥

  • हिंदी अनुवाद: सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, संतोष और धर्म—इन गुणों से युक्त मनुष्य पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 40

इन्द्रियाणां दमनं कृत्वा विषयौघं परित्यजेत्।

वासुदेवे मनो न्यस्य मुच्यते सर्वपातकैः॥४०॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपनी इंद्रियों का दमन करके विषय-वासनाओं को त्याग देता है और वासुदेव में मन लगाता है, वह पापों से छूट जाता है।

श्लोक 41

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तो यः स याति परमां गतिम्॥४१॥

  • हिंदी अनुवाद: जो सब प्राणियों में अपनी आत्मा को और अपनी आत्मा में सब प्राणियों को देखता है, वह योगी परम गति को प्राप्त करता है।

श्लोक 42

नाहं देहो न मे देहो जीवो ब्रह्म सनातनः।

इति ज्ञानं यदा जात्ये मुच्यते जन्मसंसृतेः॥४२॥

  • हिंदी अनुवाद: 'मैं शरीर नहीं हूँ, यह शरीर मेरा नहीं है, मैं तो सनातन ब्रह्म हूँ'—ऐसा ज्ञान होते ही जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 43

कर्मणा बध्यते जन्तुः विद्यया तु प्रमुच्यते।

तस्मात् ज्ञानं समभ्यस्येत् मुक्ताये सर्वदा नरः॥४३॥

  • हिंदी अनुवाद: जीव कर्मों से बँधता है और ज्ञान (विद्या) से मुक्त होता है। इसलिए मुक्ति के लिए मनुष्य को सदा आत्मज्ञान का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 44

विष्णुभक्तिरहितस्य सर्वं व्यर्थं नरोत्तम।

तपस्तपो दानमपि तीर्थयात्रा तथैव च॥४४॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! विष्णुभक्ति के बिना मनुष्य का तप, दान और तीर्थयात्रा आदि सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।

श्लोक 45

भक्तिहीनस्य मर्त्यस्य न गतिर्विद्यते क्वचित्।

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्॥४५॥

  • हिंदी अनुवाद: भक्तिहीन मनुष्य की कहीं भी उत्तम गति नहीं होती। इसलिए हर प्रकार से भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए।

श्लोक 46

ये भजन्ति महाविष्णुं सर्वभावान्विता नराः।

न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥४६॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सब भावों से महाविष्णु का भजन करते हैं, उनका सैकड़ों करोड़ कल्पों तक फिर कभी संसार में जन्म नहीं होता।

श्लोक 47

एतत्ते कथितं तार्क्ष्य कुयोनिमोचनं शुभम्।

यः शृणोति पठेच्चैव सर्वपापैः प्रमुच्यते॥४७॥

  • हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे कुयोनियों से मुक्ति देने वाला यह पावन प्रसंग कह दिया। जो इसे सुनता या पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 48

इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे कुयोनि-पुनर्जन्मवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥४८॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'कुयोनि और पुनर्जन्म वर्णन' नामक पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।

श्लोक 49

हरिः ॐ तत्सत्कृष्णार्पणमस्तु॥४९॥

  • हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्रीकृष्ण को समर्पित है।

श्लोक 50

नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥५०॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार नमस्कार है।

श्लोक 51

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।

पितुर्मातु मे सर्वमेवांग्रि युग्मं न जाने जाने न च देवमन्यम्॥५१॥

  • हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! आपके चरण कमल ही मेरे माता-पिता और सब कुछ हैं, मैं आपके सिवा किसी अन्य देव को नहीं जानता।

श्लोक 52

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥५२॥

  • हिंदी अनुवाद: हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु हैं, आप ही सखा हैं, आप ही विद्या हैं और आप ही मेरा धन हैं।

श्लोक 53

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः।

त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥५३॥

  • हिंदी अनुवाद: 'हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्मों से युक्त हूँ, आप मेरे समस्त पापों का नाश करके मेरी रक्षा करें।'

श्लोक 54

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।

तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥५४॥

  • हिंदी अनुवाद: 'हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई आश्रय नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए दया करके मेरी रक्षा कीजिए।'

श्लोक 55

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।

करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥५५॥

  • हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय या स्वभाव से जो कुछ भी कर्म मैं करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।

श्लोक 56

य इदं पठते नित्यं कुयोनिमोचनं स्तवम्।

न तस्य कुयोनौ जन्म न च नरकपातनम्॥५६॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस पाठ का नित्य अध्ययन करता है, उसका कभी नीच योनियों में जन्म नहीं होता और न ही वह नरक में गिरता है।

श्लोक 57

अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते॥५७॥

  • हिंदी अनुवाद: इसके प्रभाव से पुत्रहीन को पुत्र और दरिद्र को धन की प्राप्ति होती है तथा वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 58

विष्णुभक्तिं समाश्रित्य यः करोति शुभां क्रियाम्।

तस्य पापं क्षयं याति पदं प्राप्नोति वैष्णवम्॥५८॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु की भक्ति का आश्रय लेकर जो शुभ कर्म करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और वह परम वैष्णव पद पाता है।

श्लोक 59

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥५९॥

  • हिंदी अनुवाद: हे सर्वमंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला माँ नारायणी! आपको नमस्कार है।

श्लोक 60

मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।

मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥६०॥

  • हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि कल्याणप्रद हैं।

श्लोक 61

सर्वथा सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।

येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥६१॥

  • हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में मंगल के धाम भगवान श्रीहरि बसे हैं, उनके किसी भी कार्य में कभी कोई अमंगल नहीं होता।

श्लोक 62

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।

येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥६२॥

  • हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में श्यामवर्ण भगवान जनार्दन स्थित हैं, उन्हीं की विजय और लाभ है; उनकी कभी पराजय नहीं होती।

श्लोक 63

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥६३॥

  • हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, वैभव और अचल नीति है।

श्लोक 64

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।

गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥६४॥

  • हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से पृथ्वी का पालन करें, गो-ब्राह्मणों का नित शुभ हो और संपूर्ण संसार सुखी हो।

श्लोक 65

काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।

देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥६५॥

  • हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न से हरी-भरी रहे, यह देश उपद्रव से रहित हो और सभी निर्भय रहें।

श्लोक 66

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥६६॥

  • हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सब कल्याण देखें और कोई दुःखी न हो।

श्लोक 67

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥६७॥

  • हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति हो।

श्लोक 68

नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।

तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥६८॥

  • हिंदी अनुवाद: हम नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे भगवान विष्णु हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।

श्लोक 69

विष्णुः सर्वेश्वरः श्रीमान् सर्वभूतहितैषिणः।

तस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥६९॥

  • हिंदी अनुवाद: सर्वेश्वर, श्रीमान और समस्त प्राणियों का हित चाहने वाले भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 70

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥७०॥

  • हिंदी अनुवाद: अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव और जानकीनाथ रामचंद्र जी का मैं भजन करता हूँ।

श्लोक 71

नामावलिं इमां नित्यं यः पठेद्भक्तिभावतः।

न तस्य कुयोनौ जन्म विष्णुलोकं स गच्छति॥७१॥

  • हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस नामावली का भक्ति से नित्य पाठ करता है, उसका कुयोनि में जन्म नहीं होता और वह विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 72

गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।

अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥७२॥

  • हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ और श्रवण से जीव सब पापों से मुक्त होकर अंत में परम पद विष्णुलोक प्राप्त करता है।

श्लोक 73

इति पञ्चमोऽध्यायः सम्पूर्णः॥७३॥

  • हिंदी अनुवाद: इस प्रकार गरुड़ पुराण का पंचम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।

श्लोक 74

॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥७४॥

  • हिंदी अनुवाद: परम सत्य स्वरूप श्री हरि को नमन।

श्लोक 75

॥ इति शुभम् ॥७५॥

  • हिंदी अनुवाद: सब शुभ और कल्याणकारी हो।

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