गरुड़ पुराण के षष्ठ अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान श्रीहरि से पूछते हैं कि जो जीव धर्म-कर्म से हीन होते हैं, वे यमलोक में जाकर किस प्रकार की भयंकर दुर्गति भोगते हैं। इसके उत्तर में भगवान विष्णु यमलोक की यातनाओं और प्रेत योनि का करुण दृश्य बतलाते हैं।
गरुड़ पुराण षष्ठ अध्याय: 1 से 60 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
श्लोक 1
गरुड़ उवाच
अधुना श्रोतुमिच्छामि दुर्गतिं पापकर्मणाम्।
यमलोके च यां भुङ्क्ते पापी जीवः सुदुःखितः॥१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे प्रभु! अब मैं पाप कर्म करने वाले जीवों की उस भयंकर दुर्गति के बारे में सुनना चाहता हूँ, जिसे वे यमलोक में अत्यंत दुःखी होकर भोगते हैं।
श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि पापिनां या दुर्गतिर्भवेत्।
यमदूतैः प्रपीड्यन्ते ये नराः पापकारिणः॥२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें पापियों की उस दुर्गति का वर्णन सुनाता हूँ, जिसमें पाप कर्म करने वाले मनुष्य यमदूतों द्वारा निरंतर प्रताड़ित किए जाते हैं।
श्लोक 3
अदत्तदानाः पापिष्ठाः केवलं स्वोदरं भराः।
ते यान्ति यमलोकं तु हाहाकारं प्रकुर्वते॥३॥
हिंदी अनुवाद: जो पापी जीवन में कभी दान नहीं देते और केवल अपना पेट भरते हैं, वे हाहाकार करते हुए यमलोक की ओर जाते हैं।
श्लोक 4
पाशेन बद्धा दूतास्तं कशाभिस्ताडयन्ति च।
तप्तबालुकसंकीर्णे यममार्गे नयन्ति तम्॥४॥
हिंदी अनुवाद: यमदूत उन्हें पाश (रस्सी) में बाँधकर कोड़ों से मारते हैं और गर्म बालू (रेत) से भरे हुए यममार्ग पर घसीटते हुए ले जाते हैं।
श्लोक 5
तृषाक्षुत्परिपीडिताः क्रन्दन्ते यमशासने।
न लभन्ते जलं क्वापि न चाहारं खगेश्वर॥५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! यमराज के शासन में वे जीव भूख और प्यास से तड़पते हुए रोते हैं, किंतु रास्ते में उन्हें कहीं न पीने को जल मिलता है और न खाने को अन्न।
श्लोक 6
असिपत्रवनं प्राप्य छिन्नभिन्नाङ्गका भृशम्।
पतन्ति भूमौ मूच्छिता ताड्यन्ते यमकिङ्करैः॥६॥
हिंदी अनुवाद: 'असिपत्रवन' में पहुँचकर तलवार जैसे तीखे पत्तों से उनके अंग-प्रत्यंग कट जाते हैं; वे बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ते हैं और यमदूत उन्हें पुनः मारते हैं।
श्लोक 7
वैतरणीं समासाद्य ज्वलन्तीं मज्जाशोणिताम्।
दृष्ट्वा भीता भृशं तार्क्ष्य क्रन्दन्ते पापकारिणः॥७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मवाद, रक्त और आग की लपटों से उबलती हुई वैतरणी नदी को देखकर पापी जीव अत्यंत भयभीत होकर चिल्लाने लगते हैं।
श्लोक 8
अगौदानस्य पापिष्ठो पतत्यस्यां महानद्याम्।
मज्जयते भृशं तत्र क्रिमिभिश्चैव दश्यते॥८॥
हिंदी अनुवाद: जिसने जीवन में गोदान नहीं किया, वह पापी उस भयानक नदी में गिर पड़ता है, जहाँ वह उबलता है और ज़हरीले कीड़े उसे डसते हैं।
श्लोक 9
हा हा कृत्वा क्रन्दमानं ग्राहैश्चापि प्रपीड्यते।
न तीरो दृश्यते तस्याः सहस्रयोजनविस्तृता॥९॥
हिंदी अनुवाद: 'हा-हा' करके रोते हुए जीव को नदी के जलचर जलजंतु और मगरमच्छ नोचते हैं। हज़ार योजन में फैली उस नदी का कोई किनारा नज़र नहीं आता।
श्लोक 10
एवं बहुविधे दुःखैः पीड्यमानाः सुदारुणैः।
प्राप्नुवन्ति यमपुरीं पापिनो यमशासनात्॥१०॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार अनेक भयंकर दुःखों से पीड़ित होते हुए वे पापी यमराज की आज्ञा से यमपुरी पहुँचते हैं।
श्लोक 11
तत्र चित्रगुप्तः प्राह पापिष्ठं प्रति कोपतः।
किमर्थं न कृतं पुण्यं मर्त्यलोके त्वया मूढ॥११॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ चित्रगुप्त उस पापी से क्रोधपूर्वक कहते हैं—'हे मूर्ख! तूने मृत्युलोक (पृथ्वी) में रहते हुए धर्म और पुण्य क्यों नहीं किया?'
श्लोक 12
न दत्तं जलमन्नं च न कृतं देवपूजनम्।
तत्सर्वं भुङ्क्ष्व पापिष्ठ स्वकृतानां फलं भृशम्॥१२॥
हिंदी अनुवाद: 'न तूने कभी भूखे को अन्न-जल दिया और न ईश्वर की पूजा की। अब अपने ही किए हुए पापों का भयंकर फल भुगत!'
श्लोक 13
इत्युक्त्वा पातयन्त्येव नरकेषु सुदारुणे।
रौरवे चापि कुम्भीपाके कालसूत्रे तथैव च॥१३॥
हिंदी अनुवाद: ऐसा कहकर यमदूत उन्हें रौरव, कुंभीपाक और कालसूत्र जैसे भयानक नरकों में पटक देते हैं।
श्लोक 14
तप्ततैलकठारेषु तच्यन्ते च मुहुर्मुहुः।
क्रकचैश्छिद्यते कश्चित् भूमौ पातित एव च॥१४॥
हिंदी अनुवाद: उन्हें उबलते हुए तेल के कड़ाहों में बार-बार तला जाता है और कुछ पापियों को ज़मीन पर पटककर आरी से काटा जाता है।
श्लोक 15
मुद्गरैस्ताड्यन्ते केचित् सूचामुखैश्च दश्यते।
मांसं स्वकीयमेवाद्य दाप्यन्ते यमकिङ्करैः॥१५॥
हिंदी अनुवाद: कुछ को लोहे की गदाओं से पीटा जाता है, कुछ को सुई जैसे मुँह वाले कीड़े डसते हैं और यमदूत उन्हें उन्हीं का मांस खाने पर मजबूर करते हैं।
श्लोक 16
एवं कल्पशतं यावत् पच्यन्ते नरकेषु च।
पापक्षयात् ततो यान्ति प्रेतत्वं सुदारुणम्॥१६॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार सैकड़ों कल्पों तक नरक में पचने के बाद, जब पापों का कुछ भाग क्षीण होता है, तब वे भयंकर प्रेत योनि प्राप्त करते हैं।
श्लोक 17
प्रेतरूपं समासाद्य तृषाक्षुत्परिपीडिताः।
भ्रमन्ति सर्वदिग्भागे वायुभूता निरंतराः॥१७॥
हिंदी अनुवाद: प्रेत रूप धारण करके वे जीव भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होकर वायु रूप में दसों दिशाओं में निरंतर भटकते रहते हैं।
श्लोक 18
न लभन्ते जलं किञ्चित् न चाहारं कथञ्चन।
मलमूत्रं तथा विष्ठां भक्षयन्ति सुदुःखिताः॥१८॥
हिंदी अनुवाद: उन्हें पीने को जल और खाने को अन्न नहीं मिलता; अत्यंत दुःखी होकर वे प्रेत मल, मूत्र और गंदगी खाने को विवश होते हैं।
श्लोक 19
पुत्राणां च स्वे गृहे गत्वा रोदयन्ति सुदारुणम्।
पीडयन्ति स्ववंशं च दुःखमग्ना निरन्तरम्॥१९॥
हिंदी अनुवाद: वे प्रेत अपने पुत्रों के घर जाकर रोते हैं और दुःखी होकर अपने ही वंश के लोगों को कष्ट व पीड़ा देते हैं।
श्लोक 20
वृथा तस्य भवेत् जन्म यो न करोति पितृक्रियाम्।
प्रेतत्वं तस्य पितरः प्राप्नुवन्ति न संशयः॥२०॥
हिंदी अनुवाद: उस मनुष्य का जन्म व्यर्थ है जो अपने मृत माता-पिता का श्राद्ध कर्म नहीं करता; उसके पितृ निश्चित रूप से प्रेत योनि में पड़े रहते हैं।
श्लोक 21
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन और्ध्वदैहिकमाचरेत्।
पिण्डदानं च दानं च प्रेतत्व विनिवृत्तये॥२१॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए अपने पितरों को प्रेत योनि से मुक्त करने के लिए पुत्र को हर संभव प्रयत्न करके और्ध्वदैहिक (श्राद्ध), पिंडदान और दान करना चाहिए।
श्लोक 22
गौदानं च तिलदानं च भूमिदानं तथैव च।
एतानि सर्वदानानि प्रेतमुक्ति कराणि च॥२२॥
हिंदी अनुवाद: गोदान, तिलदान और भूमिदान—ये सभी दान प्रेत आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने वाले हैं।
श्लोक 23
गयाश्राद्धं च यो कुर्यात् पितॄणां मुक्तिहेतवे।
सद्यो मुच्यति प्रेतत्वात् पितरः तस्य न संशयः॥२३॥
हिंदी अनुवाद: जो पुत्र अपने पितरों की मुक्ति के लिए गया जी में जाकर श्राद्ध करता है, उसके पितृ तुरंत प्रेत योनि से मुक्त होकर परम पद पाते हैं।
श्लोक 24
एकादशीव्रतं यश्च करोति हरिभक्तिमान्।
तस्य वंशे न प्रेतत्वं न च नरकपातनम्॥२४॥
हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति भक्तिभाव से एकादशी का व्रत करता है, उसके कुल व वंश में कभी कोई प्रेत नहीं बनता और न ही नरक में गिरता है।
श्लोक 25
तुलसीदलतोयेन यो करोति हरिमर्चनम्।
तस्य पापं क्षयं याति प्रेतत्वं न च जायते॥२५॥
हिंदी अनुवाद: जो तुलसी के पत्तों और जल से भगवान विष्णु का पूजन करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह कभी प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 26
गंगा स्नानं च यो कुर्यात् मरणकाले विशेषतः।
तस्य प्रेतत्वं नश्येत विष्णुलोकं स गच्छति॥२६॥
हिंदी अनुवाद: जो जीवन में या अंत समय में गंगा स्नान करता है, उसका प्रेतत्व नष्ट हो जाता है और वह सीधे विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 27
विष्णुनामसङ्कीर्तनं प्रेतबाधाविनाशनम्।
यत्र नाम हरेरास्ते न तत्र प्रेतसम्भवः॥२७॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु का नाम-कीर्तन प्रेत बाधा का नाश करने वाला है; जहाँ हरि नाम गूँजता है, वहाँ प्रेतों का वास कभी नहीं हो सकता।
श्लोक 28
म्रियमाणो हरेर्नाम गृह्णाति यदि कश्चन।
सद्यो मुक्तो भवेत् पापादस्तु प्रेतो न जायते॥२८॥
हिंदी अनुवाद: यदि मरते समय मनुष्य के मुख से 'हरि' नाम निकल जाए, तो वह तुरंत पापों से मुक्त हो जाता है और प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 29
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्।
संसारतारिणी भक्तिः सर्वदुःखविनाशिनी॥२९॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए; क्योंकि भक्ति ही संसार-चक्र से तारने वाली है।
श्लोक 30
एतत् ते कथितं तार्क्ष्य पापिनां च दुर्गतिम्।
प्रेतानां च स्वरूपं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥३०॥
हिंदी अनुवाद: भगवान बोले—हे गरुड़! मैंने तुमसे पापी जीवों की दुर्गति और प्रेतों के स्वरूप का वर्णन कर दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 31
गरुड़ उवाच
श्रुतं मया महाविष्णो पापिनां च दुर्गतिम्।
येन शृत्वा मनः कम्पो जायते मे जनार्दन॥३१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! पापियों की इस भयंकर दुर्गति का वर्णन सुनकर मेरा मन कांप उठा है।
श्लोक 32
कथं प्रेतभयात् मुक्तो भवेत् सर्वो जनो भुवि।
तन्मे ब्रूहि कृपासिन्धो सर्वलोकाभयं प्रदे॥३२॥
हिंदी अनुवाद: हे कृपासिंधु! अब मुझे वह उपाय बताइए, जिससे पृथ्वी के सभी मनुष्य इस प्रेत भय और दुर्गति से मुक्त हो सकें?
श्लोक 33
श्रीभगवानुवाच
साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया।
प्रेतमुक्तिप्रदं यत्नं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे॥३३॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! लोक कल्याण के लिए तुमने बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अब मैं प्रेत बाधा से मुक्ति देने वाले यत्न सुनाता हूँ, सुनो।
श्लोक 34
श्रीमद्भागवतं यश्च शृणोति नित्यमन्वहम्।
तस्य वंशे न प्रेतत्वं मुच्यन्ते पितरः क्षणात्॥३४॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य नित्य श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनता है, उसके कुल में कोई प्रेत नहीं बनता और उसके पितृ एक क्षण में मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 35
गीतापाठं च यो कुर्यात् नित्यं भक्तिसमन्वितः।
स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥३५॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य भक्तिभाव से नित्य श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करता है, वह सब पापों से छूटकर विष्णुलोक प्राप्त करता है।
श्लोक 36
दीपदानं च यो दद्यात् पथि यमस्य शान्तये।
तस्यान्धकारो नश्येत यममार्गे सुदारुणे॥३६॥
हिंदी अनुवाद: जो यमलोक के मार्ग के प्रकाश हेतु दीपदान करता है, यमलोक के भयानक अंधेरे मार्ग में उसके लिए प्रकाश हो जाता है।
श्लोक 37
शय्यादानं वस्त्रदानं अन्नदानं तथोदकम्।
एतानि सर्वदानानि प्रेतमुक्तिकराणि च॥३७॥
हिंदी अनुवाद: शय्या (बिस्तर), वस्त्र, अन्न और जल का दान—ये सभी दान पापी आत्माओं को प्रेतत्व से मुक्ति दिलाने वाले हैं।
श्लोक 38
यथा सूर्योदये तार्क्ष्य तमः नश्यति सर्वशः।
तथा हरिस्मरेणैव प्रेतत्वं नश्यति ध्रुवम्॥३८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! जिस प्रकार सूर्य निकलने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार श्रीहरि के स्मरण से प्रेतत्व निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 39
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥३९॥
हिंदी अनुवाद: (श्रीहरि कहते हैं) 'सब धर्मों और आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें समस्त पापों व दुर्गति से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।'
श्लोक 40
एतद्रहस्यं परमं प्रेतमुक्तिप्रदायकम्।
कथितं ते मया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया॥४०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! लोक कल्याण की भावना से मैंने तुमसे प्रेत योनि से मुक्ति देने वाला यह परम गोपनीय रहस्य कह दिया है।
श्लोक 41
य इदं पठते नित्यं दुर्गतिविनाशनम्।
स सर्वपापविमुक्तो विष्णुलोके महीयते॥४१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य दुर्गति का नाश करने वाले इस पाठ का नित्य अध्ययन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजनीय होता है।
श्लोक 42
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो लभते धनम्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो गरुड़स्य प्रसादतः॥४२॥
हिंदी अनुवाद: इसके प्रभाव और पक्षीराज गरुड़ जी की कृपा से पुत्रहीन को पुत्र, दरिद्र को धन मिलता है और मनुष्य समस्त दुर्गति से छूट जाता है।
श्लोक 43
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे पापिजीवदुर्गतिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥४३॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'पापी जीवों की दुर्गति वर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ।
श्लोक 44
हरिः ॐ तत्सत्कृष्णार्पणमस्तु॥४४॥
हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्रीकृष्ण को समर्पित है।
श्लोक 45
नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥४५॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 46
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥४६॥
हिंदी अनुवाद: वसुदेवपुत्र भगवान श्रीकृष्ण, श्रीहरि, परमात्मा और भक्तों के दुःखों का नाश करने वाले गोविंद को प्रणाम है।
श्लोक 47
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः।
त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥४७॥
हिंदी अनुवाद: 'हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्म करने वाला हूँ; आप मेरे समस्त पापों को हरकर मेरी रक्षा करें।'
श्लोक 48
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥४८॥
हिंदी अनुवाद: 'हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई सहारा नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए दया करके मेरी रक्षा करें।'
श्लोक 49
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥४९॥
हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय या स्वभाव से मैं जो भी कार्य करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।
श्लोक 50
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥५०॥
हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से शासन करें, गो-ब्राह्मणों का नित्य शुभ हो और समस्त लोक सुखी हों।
श्लोक 51
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।
देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥५१॥
हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न से परिपूर्ण रहे, देश उपद्रव रहित हो और सभी मनुष्य निर्भय रहें।
श्लोक 52
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥५२॥
हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सब मंगल देखें और कोई दुःखी न हो।
श्लोक 53
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥५३॥
हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की पूर्ण शांति हो।
श्लोक 54
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥५४॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि सब मंगल करने वाले हैं।
श्लोक 55
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥५५॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में श्यामवर्ण भगवान जनार्दन बसे हैं, उन्हीं का लाभ है, उन्हीं की विजय है; उनकी पराजय कभी नहीं हो सकती।
श्लोक 56
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥५६॥
हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, वैभव और अचल नीति है।
श्लोक 57
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द नामेति सदा जपस्व॥५७॥
हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! हे मेरी जीभ! तू सदा गोविंद नाम के इस अमृत का पान करती रह।
श्लोक 58
गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥५८॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ और श्रवण से जीव सब पापों से मुक्त होकर अंत में परम स्थान विष्णुलोक प्राप्त करता है।
श्लोक 59
॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥५९॥
हिंदी अनुवाद: श्री हरि ही परम सत्य हैं।
श्लोक 60
॥ इति शुभम् ॥६०॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ, मंगलमय और कल्याणकारी हो।