गरुड़ पुराण के सप्तम अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान श्रीहरि से पूछते हैं कि मृत जीव की परलोक यात्रा में कौन से दान और कर्म सबसे अधिक सहायक होते हैं।
गरुड़ पुराण सप्तम अध्याय: 1 से 85 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
श्लोक 1
गरुड़ उवाच
शुरुतं मया महाविष्णो पापिनां च दुर्गतिम्।
केनोपायेन मुच्यन्ते तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने पापियों की दुर्गति का वर्णन सुन लिया। अब हे जनार्दन! मुझे वह उपाय बताइए जिससे वे इस दुर्गति से मुक्त हो सकें।
श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि और्ध्वदैहिकमुत्तमम्।
येन दत्तेन दानेन प्रेतो याति परं पदम्॥२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें उत्तम और्ध्वदैहिक (श्राद्ध-संस्कार) और उन दानों का विधान बताता हूँ, जिनके देने से प्रेत आत्मा भी परम पद को प्राप्त करती है।
श्लोक 3
पुत्रेण क्रियते यस्तु पिण्डदानं दिने दिने।
दशपिण्डाः प्रदातव्याः प्रेतदेहस्य तृप्तये॥३॥
हिंदी अनुवाद: पुत्र द्वारा प्रतिदिन पिंडदान किया जाना चाहिए। प्रेत शरीर की तृप्ति के लिए शुरुआती दिनों में दस पिंडदान दिए जाने का विधान है।
श्लोक 4
प्रथमे अहनि पिण्डो वै द्वितीयोऽपि तथैव च।
तृतीये चतुर्थे चैव पञ्चमे षष्ठमे तथा॥४॥
हिंदी अनुवाद: पहला पिंड, दूसरा पिंड, इसी प्रकार तीसरे, चौथे, पांचवें और छठे दिन भी पिंडदान करना चाहिए।
श्लोक 5
सप्तमेऽष्टमे चैव नवमे दशमे तथा।
प्रेतदेहस्य पुष्ट्यर्थं दत्ता वै दश पिण्डकाः॥५॥
हिंदी अनुवाद: सातवें, आठवें, नौवें और दसवें दिन—इस प्रकार प्रेत के नए शरीर की पुष्टि के लिए कुल दस पिंडदान दिए जाते हैं।
श्लोक 6
दशपिण्डप्रदानेन शरीरं जायते खग।
अङ्गुष्ठमात्रकस्यैव यममार्गे प्रगच्छतः॥६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! इन दस पिंडों के प्रदान करने से यममार्ग पर जाने वाले अंगूठे के बराबर आकार वाले प्रेत का शरीर बनता है।
श्लोक 7
एकादशे द्वादशे च तथैव त्रयोदशे।
वृषोत्सर्गस्तथा कार्यो ब्राह्मणभोजनं तथा॥७॥
हिंदी अनुवाद: इसके बाद ग्यारवें, बारहवें और तेरवें दिन वृषोत्सर्ग (सांड छोड़ना) तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाना चाहिए।
श्लोक 8
वृषोत्सर्गसमं दानं न भूतं न भविष्यति।
येन दत्तेन वै प्रेतो याति विष्णुगतिं ध्रुवम्॥८॥
हिंदी अनुवाद: वृषोत्सर्ग के समान न कोई दान हुआ है और न होगा, जिसके करने से प्रेत निश्चित रूप से विष्णुगति को प्राप्त होता है।
श्लोक 9
जलकुम्भप्रदानं च शय्यादानं तथैव च।
वस्त्रदानं च धान्यं च प्रेतमुक्तिकरं भवेत्॥९॥
हिंदी अनुवाद: जल से भरा घड़ा (जलकुम्भ), शय्या (बिस्तर), वस्त्र और अन्न (धान्य) का दान प्रेत को मुक्ति दिलाने वाला होता है।
श्लोक 10
यथा तृषार्तो लभते जलं वै सुमहत्तरम्।
तथा जलकुम्भेनापि प्रेतः तृप्यति निश्चितम्॥१०॥
हिंदी अनुवाद: जिस प्रकार प्यासा व्यक्ति जल पाकर तृप्त होता है, उसी प्रकार जलकुम्भ के दान से प्रेत निश्चित रूप से तृप्त होता है।
श्लोक 11
आतपे च प्रगच्छन्तं प्रेतं घोरं यममार्गे।
च्छत्रदानं च दद्यातु तस्य प्रीतिकरं भवेत्॥११॥
हिंदी अनुवाद: यममार्ग के भयंकर धूप और कष्टों के बीच चल रहे प्रेत के लिए छाता (छत्र) का दान अत्यंत सुखद और प्रीतिकर होता है।
श्लोक 12
पादत्राणप्रदानं च मार्गकण्टकनाशकम्।
उपायनं च दातव्यं प्रेतप्रीतये सदा॥१२॥
हिंदी अनुवाद: रास्ते के कांटों को दूर करने के लिए जूतों (पादत्राण) का दान और अन्य उपयोगी वस्तुएँ प्रेत की प्रसन्नता के लिए दी जानी चाहिए।
श्लोक 13
सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च।
महादानानि चत्वारि प्रेतपापहराणि च॥१३॥
हिंदी अनुवाद: स्वर्ण दान, गोदान, भूमिदान और तिल दान—ये चारों महादान प्रेत के समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 14
गोदानेन तु यः प्रीतो मुच्यते वैतरण्यतः।
न तस्य नरके पातो न च यमभयं क्वचित्॥१४॥
हिंदी अनुवाद: गोदान करने से प्रेत वैतरणी नदी से मुक्त हो जाता है। फिर न उसका नरक में पतन होता है और न उसे कहीं यमराज का भय रहता है।
श्लोक 15
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गोदानं कार्यमन्वहम्।
प्रेतस्य मुक्तये तार्क्ष्य पुत्रेण हि सुसंमता॥१५॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए हे गरुड़! प्रेत की मुक्ति के लिए पुत्र द्वारा हर संभव प्रयत्न करके गोदान अवश्य किया जाना चाहिए।
श्लोक 16
अशौचं च तथा पिण्डं मासश्राद्धं तथैव च।
वार्षिकं च तथा श्राद्धं कर्तव्यं विधिपूर्वकम्॥१६॥
हिंदी अनुवाद: अशौच (सूतक), पिंडदान, मासिक श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध—इन सबको पूरी विधि-विधान के साथ करना चाहिए।
श्लोक 17
मासश्राद्धैर्दशभिश्च प्रेतः पुष्टो भवेद् ध्रुवम्।
एकादशे मासि तथा पिण्डसंयोजनं भवेत्॥१७॥
हिंदी अनुवाद: दस मासिक श्राद्धों से प्रेत निश्चित रूप से पुष्ट होता है और ग्यारवें महीने में सपिंडीकरण (पिंड संयोजन) किया जाता है।
श्लोक 18
सपिण्डीकरणात् प्रेतो मुच्यते प्रेतयोनिedतः।
पितृलोकमवाप्नोति देवैः सह मोदते॥१८॥
हिंदी अनुवाद: सपिंडीकरण के बाद जीव प्रेत योनि से छूटकर पितृलोक को प्राप्त होता है और देवताओं के साथ आनंद मनाता है।
श्लोक 19
यदि पुत्रो न कुरुते श्राद्धं पिण्डं च तर्पणम्।
तदा स प्रेतरूपेण भ्रमति क्षुत्सुपीडितः॥१९॥
हिंदी अनुवाद: यदि पुत्र श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण नहीं करता, तो वह मृत आत्मा भूख-प्यास से पीड़ित होकर प्रेत रूप में भटकती रहती है।
श्लोक 20
तस्मात् पुत्रस्य जन्मैव सफलं पितृतर्पणात्।
न चेत् तस्य कुलं सर्वं व्यर्थमेव गतं खलु॥२०॥
हिंदी अनुवाद: पितरों के तर्पण से ही पुत्र का जन्म सफल होता है; यदि ऐसा न किया जाए, तो उसका पूरा कुल व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 21
गयाश्राद्धं च यो कुर्यात् पितॄणां मुक्तये नरः।
सद्यो मुच्यन्ते पितरः स्वर्गं यान्ति न संशयः॥२१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपने पितरों की मुक्ति के लिए गया जी में जाकर श्राद्ध करता है, उसके पितृ तत्काल मुक्त होकर स्वर्ग जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक 22
गयायाः सदृशं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।
यत्र गत्वा मुच्यन्ते पितरः सर्वपातकात्॥२२॥
हिंदी अनुवाद: गया के समान न कोई तीर्थ हुआ है और न होगा, जहाँ जाकर पितृ समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 23
अक्षयवाटो ग्यायां तु यत्र दत्तं क्षयं न हि।
तत्र पिण्डप्रदानेन अनन्तं फलमाप्नुयात्॥२३॥
हिंदी अनुवाद: गया का अक्षयवट ऐसा स्थान है, जहाँ दिया गया दान कभी नष्ट नहीं होता। वहाँ पिंडदान करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।
श्लोक 24
फाल्गुनीनद्यां तस्नात्वा पिण्डं दद्यात् समाहितः।
कुलकोटिसहस्राणि तारयेत् प्रेतसंभवान्॥२४॥
हिंदी अनुवाद: फल्गु नदी में स्नान करके जो एकाग्रचित्त होकर पिंडदान करता है, वह हज़ारों कुल-कोटि के प्रेत योनि में पड़े पितरों को तार देता है।
श्लोक 25
एतत् ते कथितं तार्क्ष्य और्ध्वदैहिकमुत्तमम्।
दानानां च प्रभावं वै किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥२५॥
हिंदी अनुवाद: भगवान बोले—हे गरुड़! मैंने तुमसे उत्तम और्ध्वदैहिक कर्म और दानों का यह प्रभाव कह दिया। अब तुम आगे क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 26
गरुड़ उवाच
श्रुतं मया महाविष्णो दानमाहात्म्यमुत्तमम्।
येन प्रेताः प्रमुच्यन्ते तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥२६॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने यह उत्तम दान माहात्म्य सुन लिया, जिससे प्रेत मुक्त होते हैं। हे जनार्दन, आगे की कथा कहें।
श्लोक 27
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि धान्यदानस्य महिमाम्।
यस्य दानेन वै प्रेतो याति स्वर्गं सुदुःखकृत्॥२७॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें धान्य (अन्न) दान की महिमा सुनाता हूँ, जिसके दान से दुःखी प्रेत भी स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 28
अन्नदानसमं दानं न भूतं न भविष्यति।
अन्नेन हि प्रजाः सर्वा जीवन्ति च सुरासुरः॥२८॥
हिंदी अनुवाद: अन्नदान के समान न कभी कोई दान हुआ है और न होगा, क्योंकि अन्न से ही देवता, असुर और समस्त प्रजा जीवित रहती है।
श्लोक 29
बुभुक्षितस्य यो दद्यादन्नं विप्राय भक्तितः।
तस्य पुण्यफलं तार्क्ष्य वक्ता शक्नोति न क्वचित्॥२९॥
हिंदी अनुवाद: जो भूखे ब्राह्मण को भक्तिभाव से अन्न दान करता है, हे गरुड़! उसके पुण्य फल का वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
श्लोक 30
जलदानं तथा घोरग्रीष्मे यः कुरुते नरः।
तस्य तृप्यन्ति पितरः स्वर्गे च प्रमुदन्ति च॥३०॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य भीषण गर्मी के दिनों में प्यासों को जल दान करता है, उसके पितृ तृप्त होते हैं और स्वर्ग में आनंदित होते हैं।
श्लोक 31
शय्यादानं महापुण्यं सर्वसुखप्रदायकम्।
शय्याप्रदानेन प्रेतः शयनं लभते सुखम्॥३१॥
हिंदी अनुवाद: शय्या (बिस्तर) का दान महापुण्य देने वाला और सभी सुखों को देने वाला है। शय्या दान से प्रेत को परलोक में सुखद शयन प्राप्त होता है।
श्लोक 32
वस्त्रदानं च यः कुर्यात् प्रेतप्रीतये सदा।
तस्य न जायते शीतं न च पीडा यममार्गे॥३२॥
हिंदी अनुवाद: जो प्रेत की प्रसन्नता के लिए वस्त्र दान करता है, उसे यममार्ग पर न कभी ठंड लगती है और न ही कोई शारीरिक पीड़ा होती है।
श्लोक 33
दीपदानं प्रकुर्वीत यममार्गान्धकारनुत्।
दीपेन प्रकाशो भवति प्रेतस्य यमवेश्मनि॥३३॥
हिंदी अनुवाद: यममार्ग के अंधकार को दूर करने के लिए दीपदान करना चाहिए। दीपक के प्रकाश से यमलोक के मार्ग में प्रेत को रास्ता दिखाई देता है।
श्लोक 34
उपानहप्रदानं च कंटकनिवारकम्।
पादत्राणेन वै प्रेतो गच्छति सुखतः पथि॥३४॥
हिंदी अनुवाद: जूतों (उपानह) का दान कांटों का निवारण करने वाला है। पादत्राण मिलने से प्रेत मार्ग पर सुखपूर्वक चल पाता है।
श्लोक 35
एतानि सर्वदानानि प्रेतमुक्ति कराणि च।
पुत्रेण कारणीयानि श्रद्धाभक्तिसमन्वितैः॥३५॥
हिंदी अनुवाद: ये सभी दान प्रेत को मुक्ति दिलाने वाले हैं, जिन्हें पुत्र द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ अवश्य किया जाना चाहिए।
श्लोक 36
श्राद्धकाले तु यो विप्रान् भोजयेत् श्रद्धया युतः।
तस्य पितरः प्रमुच्यन्ते नरकोत्तरणेषु च॥३६॥
हिंदी अनुवाद: श्राद्ध काल में जो श्रद्धा के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके पितृ नरक के दुःखों से छूट जाते हैं।
श्लोक 37
ब्राह्मणेषु स्थिता देवा ब्राह्मणाः सर्वदेवताः।
तस्मात् ब्राह्मणपूजैव देवपूजनमुच्यते॥३७॥
हिंदी अनुवाद: ब्राह्मणों में ही देवता स्थित हैं और सभी देवता ब्राह्मण रूप हैं। इसलिए ब्राह्मणों की पूजा ही वास्तव में देवताओं की पूजा है।
श्लोक 38
यथा तृप्यति वै वह्निहुतेन हविषा खग।
तथा तृप्यति वै विप्रभोजनेन पितृगणः॥३८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! जिस प्रकार अग्नि में आहुति देने से देवता तृप्त होते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मणों के भोजन करने से पितृगण तृप्त होते हैं।
श्लोक 39
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणान् भोजयेत् सुधीः।
दक्षिणां च प्रदद्याच्च प्रेतप्रीतये नित्यशः॥३९॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को हर संभव प्रयत्न करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और प्रेत की तृप्ति के लिए दक्षिणा देनी चाहिए।
श्लोक 40
एतत् ते कथितं तार्क्ष्य दानमाहात्म्यमुत्तमम्।
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥४०॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे यह उत्तम दान माहात्म्य कह दिया, जिसके श्रवण मात्र से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 41
गरुड़ उवाच
श्रुतं मया महाविष्णो दानधर्मस्य विस्तरः।
अधुना श्रोतुमिच्छामि यमलोकस्य विस्तरम्॥४१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने दान-धर्म का यह विस्तार सुन लिया। अब मैं यमलोक के विस्तार के बारे में सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 42
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि यमलोकस्य विस्तरम्।
यत्र गत्वा पापिजना भुञ्जते कर्मणां फलम्॥४२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें यमलोक का विस्तार बताता हूँ, जहाँ जाकर पापी लोग अपने कर्मों का फल भोगते हैं।
श्लोक 43
योजनसहस्राणि विस्तीर्णा यमपुरी शुभाम्।
स्वर्णभूमिसमायुक्ता वज्रवैदूर्यमंडिता॥४३॥
हिंदी अनुवाद: यमपुरी हजारों योजन में फैली हुई है। वह स्वर्ण भूमि से युक्त और वज्र-वैदूर्य मणियों से सुसज्जित है।
श्लोक 44
तत्रास्ते यमराजो वै धर्मराजो महाबलः।
चित्रगुप्तेन सहितः पश्यति कर्मणां गतिम्॥४४॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ महाबली धर्मराज यमराज निवास करते हैं, जो चित्रगुप्त के साथ जीवों के कर्मों की गति को देखते हैं।
श्लोक 45
न तत्र कश्चिद्मित्रं वा शत्रु वा पश्यति खग।
स्वयं कृतेन कर्मेण भुङ्क्ते सर्वं शुभेतरम्॥४५॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! वहाँ कोई किसी का मित्र या शत्रु नहीं होता। जीव अपने ही किए हुए अच्छे-बुरे कर्मों का फल स्वयं भोगता है।
श्लोक 46
धर्मराजस्य सभायां देवाः सिद्धा महर्षयः।
तिष्ठन्ति सर्वदा तार्क्ष्य न्यायकार्यार्थतत्पराः॥४६॥
हिंदी अनुवाद: धर्मराज की सभा में देवता, सिद्ध और महर्षिगण हमेशा न्याय कार्य में तत्पर होकर विराजमान रहते हैं।
श्लोक 47
पापिनां दर्शनं तत्र घोरं भवति दारुणम्।
पुण्यानां च सुखासीना पश्यन्ति सुखमुत्तमम्॥४७॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ पापियों का दृश्य अत्यंत भयंकर और डरावना होता है, जबकि पुण्यात्मा लोग सुखपूर्वक बैठकर उत्तम सुख का अनुभव करते हैं।
श्लोक 48
एतत् ते कथितं तार्क्ष्य यमलोकस्य वर्णनम्।
किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ब्रूहि मे वदतांवर॥४८॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे यमलोक का यह वर्णन कह दिया। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 49
गरुड़ उवाच
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं तव प्रसादाद् जनार्दन।
श्रुतं मया महाज्ञानं संसाराभयकारकम्॥४९॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे जनार्दन! आपकी कृपा से मैं धन्य हो गया और मेरा जन्म सफल हो गया। मैंने संसार का भय दूर करने वाला यह महाज्ञान सुन लिया है।
श्लोक 50
कथं पुनः पुनर्जन्म जायते मानवस्य वै।
तन्मे ब्रूहि कृपासिन्धो यतो मुच्येत संसारात्॥५०॥
हिंदी अनुवाद: हे कृपासिंधु! मनुष्य का बार-बार पुनर्जन्म क्यों होता है? मुझे वह उपाय बताइए जिससे वह इस संसार चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाए।
श्लोक 51
श्रीभगवानुवाच
साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया।
संसारमोचनं तत्त्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे॥५१॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! लोक कल्याण की भावना से तुमने बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अब संसार से मुक्ति देने वाला तत्व सुनाता हूँ, सुनो।
श्लोक 52
कर्मणा बध्यते जन्तुः विद्यया तु प्रमुच्यते।
तस्मात् ज्ञानं समभ्यस्येत् मुक्ताये सर्वदा नरः॥५२॥
हिंदी अनुवाद: जीव कर्मों से बँधता है और ज्ञान (विद्या) से मुक्त होता है। इसलिए मुक्ति के लिए मनुष्य को सदा आत्मज्ञान का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 53
विष्णुभक्तिरहितस्य सर्वं व्यर्थं नरोत्तम।
तपस्तपो दानमपि तीर्थयात्रा तथैव च॥५३॥
हिंदी अनुवाद: हे नरोत्तम गरुड़! विष्णुभक्ति के बिना मनुष्य का तप, दान और तीर्थयात्रा आदि सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 54
भक्तिहीनस्य मर्त्यस्य न गतिर्विद्यते क्वचित्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्॥५४॥
हिंदी अनुवाद: भक्तिहीन मनुष्य की कहीं भी उत्तम गति नहीं होती। इसलिए हर प्रकार से भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए।
श्लोक 55
ये भजन्ति महाविष्णुं सर्वभावान्विता नराः।
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥५५॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सब भावों से महाविष्णु का भजन करते हैं, उनका सैकड़ों-करोड़ों कल्पों तक फिर कभी संसार में पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 56
एतत्ते कथितं तार्क्ष्य दानमाहात्म्यमुत्तमम्।
यः शृणोति पठेच्चैव सर्वपापैः प्रमुच्यते॥५६॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे यह उत्तम दान माहात्म्य कह दिया। जो मनुष्य इसे सुनता या पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 57
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे और्ध्वदैहिकदानमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तमोध्यायः॥५७॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'और्ध्वदैहिक दान की महिमा' नामक सातवां अध्याय पूर्ण हुआ।
श्लोक 58
हरिः ॐ तत्सत्कृष्णार्पणमस्तु॥५८॥
हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्रीकृष्ण को समर्पित है।
श्लोक 59
नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥५९॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 60
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
पितुर्मातु मे सर्वमेवांग्रि युग्मं न जाने जाने न च देवमन्यम्॥६०॥
हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! आपके चरण कमल ही मेरे माता-पिता और सब कुछ हैं, मैं आपके सिवा किसी अन्य देव को नहीं जानता।
श्लोक 61
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥६१॥
हिंदी अनुवाद: हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु हैं, आप ही सखा हैं, आप ही विद्या हैं और आप ही मेरा धन हैं।
श्लोक 62
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः।
त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥६२॥
हिंदी अनुवाद: 'हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्मों से युक्त हूँ; आप मेरे समस्त पापों का नाश करके मेरी रक्षा करें।'
श्लोक 63
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥६३॥
हिंदी अनुवाद: 'हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई आश्रय नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए दया करके मेरी रक्षा कीजिए।'
श्लोक 64
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥६४॥
हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय या स्वभाव से जो कुछ भी कर्म मैं करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।
श्लोक 65
य इदं पठते नित्यं दानमाहात्म्यमुत्तमम्।
न तस्य कुयोनौ जन्म न च नरकपातनम्॥६५॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस उत्तम दान माहात्म्य का नित्य पाठ करता है, उसका कभी नीच योनियों में जन्म नहीं होता और न ही वह नरक में गिरता है।
श्लोक 66
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते॥६६॥
हिंदी अनुवाद: इसके प्रभाव से पुत्रहीन को पुत्र और दरिद्र को धन की प्राप्ति होती है तथा वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजनीय होता है।
श्लोक 67
विष्णुभक्तिं समाश्रित्य यः करोति शुभां क्रियाम्।
तस्य पापं क्षयं याति पदं प्राप्नोति वैष्णवम्॥६७॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु की भक्ति का आश्रय लेकर जो शुभ कर्म करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और वह परम वैष्णव पद पाता है।
श्लोक 68
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥६८॥
हिंदी अनुवाद: हे सर्वमंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला माँ नारायणी! आपको नमस्कार है।
श्लोक 69
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥६९॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि कल्याणप्रद हैं।
श्लोक 70
सर्वथा सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।
येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥७०॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में मंगल के धाम भगवान श्रीहरि बसे हैं, उनके किसी भी कार्य में कभी कोई अमंगल नहीं होता।
श्लोक 71
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥७१॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में श्यामवर्ण भगवान जनार्दन स्थित हैं, उन्हीं की विजय और लाभ है; उनकी कभी पराजय नहीं होती।
श्लोक 72
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७२॥
हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, वैभव और अचल नीति है।
श्लोक 73
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥७३॥
हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से पृथ्वी का पालन करें, गो-ब्राह्मणों का नित शुभ हो और संपूर्ण संसार सुखी हो।
श्लोक 74
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।
देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥७४॥
हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न से हरी-भरी रहे, यह देश उपद्रव से रहित हो और सभी निर्भय रहें।
श्लोक 75
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥७५॥
हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सब कल्याण देखें और कोई दुःखी न हो।
श्लोक 76
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥७६॥
हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति हो।
श्लोक 77
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥७७॥
हिंदी अनुवाद: हम नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे भगवान विष्णु हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
श्लोक 78
विष्णुः सर्वेश्वरः श्रीमान् सर्वभूतहितैषिणः।
तस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥७८॥
हिंदी अनुवाद: सर्वेश्वर, श्रीमान और समस्त प्राणियों का हित चाहने वाले भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 79
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥७९॥
हिंदी अनुवाद: अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव और जानकीनाथ रामचंद्र जी का मैं भजन करता हूँ।
श्लोक 80
नामावलिं इमां नित्यं यः पठेद्भक्तिभावतः।
न तस्य कुयोनौ जन्म विष्णुलोकं स गच्छति॥८०॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस नामावली का भक्ति से नित्य पाठ करता है, उसका कुयोनि में जन्म नहीं होता और वह विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 81
गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥८१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ और श्रवण से जीव सब पापों से मुक्त होकर अंत में परम पद विष्णुलोक प्राप्त करता है।
श्लोक 82
इति सप्तमोऽध्यायः सम्पूर्णः॥८२॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार गरुड़ पुराण का सातवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ।
श्लोक 83
॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥८३॥
हिंदी अनुवाद: परम सत्य स्वरूप श्री हरि को नमन।
श्लोक 84
॥ इति शुभम् ॥८४॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ और कल्याणकारी हो।
श्लोक 85
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥८५॥
हिंदी अनुवाद: सर्वत्र शांति हो।