गरुड़ पुराण के अष्टम अध्याय में पक्षीराज गरुड़ जी भगवान श्रीहरि से पूछते हैं कि मृतक जीव का भौतिक शरीर छूटने के बाद परलोक जाने वाला 'आतिवाहिक शरीर' किस प्रकार बनता है और वह यममार्ग की यात्रा कैसे तय करता है।
गरुड़ पुराण अष्टम अध्याय: 1 से 70 तक के संपूर्ण श्लोक एवं हिंदी अनुवाद
श्लोक 1
गरुड़ उवाच
शुरुतं मया महाविष्णो दानमाहात्म्यमुत्तमम्।
आतिवाहिकदेहस्य स्वरूपं ब्रूहि मे प्रभो॥१॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने उत्तम दान माहात्म्य सुन लिया। अब हे प्रभो! मुझे 'आतिवाहिक शरीर' का स्वरूप विस्तार से बताइए।
श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच
शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि आतिवाहिकदेहकम्।
येन गच्छति जीवो वै यममार्ग सुदारुणम्॥२॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! सुनो, अब मैं तुम्हें उस आतिवाहिक देह के बारे में बताता हूँ, जिसके सहारे जीव भयंकर यममार्ग की यात्रा तय करता है।
श्लोक 3
प्रेतदेहस्य दानेन पिण्डेन च दिने दिने।
आतिवाहिकदेहस्तु जायते यममार्गतः॥३॥
हिंदी अनुवाद: प्रतिदिन दिए जाने वाले पिंडदान और प्रेत देह संबंधी संस्कारों से यममार्ग पर चलने के लिए आतिवाहिक शरीर की रचना होती है।
श्लोक 4
अङ्गुष्ठमात्रकस्यैव देहो भवति तादृशः।
कर्मभोगार्थमेवायं निर्मितो धर्मराजतः॥४॥
हिंदी अनुवाद: अंगूठे के बराबर आकार वाला वह शरीर अपने कर्मों का भोग करने के लिए धर्मराज के विधान से निर्मित होता है।
श्लोक 5
न तस्य क्षुधा तृषा चापि न शीतोष्णभयं तथा।
कर्मभोगैकनिष्ठोऽसौ याति वै यममन्दिरम्॥५॥
हिंदी अनुवाद: उस आतिवाहिक शरीर को न भूख लगती है, न प्यास और न ही सर्दी-गर्मी का कोई भय होता है। वह केवल कर्मों का भोग करने के लिए यम मंदिर की ओर जाता है।
श्लोक 6
मासे मासे च यः पिण्डो दीयते पुत्रकैः सदा।
तेन पुष्टो भवेद्देह आतिवाहिकसंज्ञकः॥६॥
हिंदी अनुवाद: पुत्रों द्वारा हर महीने जो मासिक पिंडदान दिया जाता है, उससे आतिवाहिक नामक वह शरीर पुष्ट होता है।
श्लोक 7
द्वितीये मासि वै देहः पादौ प्राप्नोति वै खग।
तृतीये कटिदेशं च चतुर्थे चोदरं तथा॥७॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! दूसरे महीने में उस शरीर को पैर प्राप्त होते हैं, तीसरे महीने में कटिदेश (कमर) और चौथे महीने में पेट बनता है।
श्लोक 8
पञ्चमे हृदयञ्चैव षष्ठे कण्ठस्तथैव च।
सप्तमे मुखमङ्गानि अष्टमे च तथा शिरः॥८॥
हिंदी अनुवाद: पाँचवें महीने में हृदय, छठे में कंठ, सातवें में मुख और अन्य अंग, तथा आठवें महीने में सिर का निर्माण होता है।
श्लोक 9
नवमे दशमे चैव क्षुधातृषासमन्वितः।
बलवान् जायते देहो यममार्गप्रदर्शकः॥९॥
हिंदी अनुवाद: नौवें और दसवें महीने में वह शरीर भूख-प्यास से युक्त और बलवान हो जाता है तथा यममार्ग पर आगे बढ़ता है।
श्लोक 10
एवं द्वादशमासैस्तु पूर्णो देहो भवत्यसौ।
यातनाभोगहेतुर्हि यममार्गे प्रगच्छति॥१०॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार बारह महीनों में वह शरीर पूरी तरह पूर्ण हो जाता है और यातनाओं को भोगने के लिए यममार्ग पर आगे बढ़ता है।
श्लोक 11
योजनसहस्राणि विस्तीर्णे यममार्गे सुदारुणे।
गच्छति दूतसंयुक्ते पापी कर्मवशेन वै॥११॥
हिंदी अनुवाद: हजारों योजन विस्तृत उस भयंकर यममार्ग पर पापी जीव यमदूतों के साथ अपने कर्मों के वशीभूत होकर चलता है।
श्लोक 12
तप्तबालुकसंकीर्णे सूर्योप्ते च महापथि।
क्षुत्क्ष्धाम्भःपरिपीडितो रुदति पापकर्मकृत्॥१२॥
हिंदी अनुवाद: गर्म बालू और जलते हुए सूर्य के तेज वाले उस महान मार्ग पर भूख-प्यास से पीड़ित पापी जीव जोर-जोर से रोता है।
श्लोक 13
असिपत्रवनं प्राप्य छिन्नभिन्नाङ्गको भृशम्।
पतति भूमौ मूर्च्छितो यमदूतैः प्रताडितः॥१३॥
हिंदी अनुवाद: 'असिपत्रवन' में पहुँचकर यमदूतों द्वारा ताड़ित होने पर उसके अंग कट जाते हैं और वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ता है।
श्लोक 14
वैतरणीं समासाद्य ज्वलन्तीं मज्जाशोणिताम्।
दृष्ट्वा भीता भृशं तार्क्ष्य क्रन्दन्ते पापकारिणः॥१४॥
हिंदी अनुवाद: मवाद और रक्त से उबलती हुई वैतरणी नदी को देखकर पापी जीव अत्यंत भयभीत होकर विलाप करते हैं।
श्लोक 15
अगौदानस्य पापिष्ठो पतत्यस्यां महानद्याम्।
मज्जयते भृशं तत्र क्रिमिभिश्चैव दश्यते॥१५॥
हिंदी अनुवाद: गोदान न करने वाला पापी उस महान नदी में गिर जाता है, जहाँ वह डूबता है और जहरीले कीड़े उसे काटते हैं।
श्लोक 16
एवं बहुविधे दुःखैः पीड्यमानाः सुदारुणैः।
प्राप्नुवन्ति यमपुरीं पापिनो यमशासनात्॥१६॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार अनेक भयंकर दुःखों से पीड़ित होते हुए वे पापी यमराज की आज्ञा से यमपुरी पहुँचते हैं।
श्लोक 17
तत्र चित्रगुप्तः प्राह पापिष्ठं प्रति कोपतः।
किमर्थं न कृतं पुण्यं मर्त्यलोके त्वया मूढ॥१७॥
हिंदी अनुवाद: वहाँ चित्रगुप्त उस पापी से क्रोधपूर्वक कहते हैं—'हे मूर्ख! तूने मृत्युलोक में रहते हुए पुण्य कर्म क्यों नहीं किए?'
श्लोक 18
न दत्तं जलमन्नं च न कृतं देवपूजनम्।
तत्सर्वं भुङ्क्ष्व पापिष्ठ स्वकृतानां फलं भृशम्॥१८॥
हिंदी अनुवाद: 'न तूने अन्न-जल का दान किया और न भगवान की पूजा की। अब अपने किए हुए कर्मों का यह भयंकर फल भुगत!'
श्लोक 19
इत्युक्त्वा पातयन्त्येव नरकेषु सुदारुणे।
रौरवे चापि कुम्भीपाके कालसूत्रे तथैव च॥१९॥
हिंदी अनुवाद: ऐसा कहकर वे उसे रौरव, कुंभीपाक और कालसूत्र जैसे भयंकर नरकों में गिरा देते हैं।
श्लोक 20
तप्ततैलकठारेषु तच्यन्ते च मुहुर्मुहुः।
क्रकचैश्छिद्यते कश्चित् भूमौ पातित एव च॥२०॥
हिंदी अनुवाद: उन्हें उबलते हुए तेल के कड़ाहों में बार-बार तला जाता है और कुछ को ज़मीन पर पटककर आरी से काटा जाता है।
श्लोक 21
एतत् ते कथितं तार्क्ष्य आतिवाहिकदेहकम्।
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥२१॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे आतिवाहिक शरीर का यह वर्णन कह दिया, जिसके श्रवण मात्र से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 22
गरुड़ उवाच
श्रुतं मया महाविष्णो आतिवाहिकवर्णनम्।
कथं पुनर्जन्मपाशात् मुच्यते मानवो भुवि॥२२॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ जी बोले—हे महाविष्णु! मैंने आतिवाहिक शरीर का वर्णन सुन लिया। अब बताइए कि मनुष्य इस पुनर्जन्म के बंधन से कैसे मुक्त हो सकता है?
श्लोक 23
श्रीभगवानुवाच
साधु पृष्टं त्वया तार्क्ष्य लोकानां हितकाम्यया।
संसारमोचनं तत्त्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मे॥२३॥
हिंदी अनुवाद: श्री भगवान बोले—हे गरुड़! लोक कल्याण की भावना से तुमने बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अब मैं संसार से मुक्ति देने वाला तत्व सुनाता हूँ, सुनो।
श्लोक 24
सत्यं शौचं दया क्षान्तिः सन्तोषो धर्म एव च।
एतैर्युक्तो नरो नित्यं मुच्यते जन्मबन्धनात्॥२४॥
हिंदी अनुवाद: सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, संतोष और धर्म—इन गुणों से युक्त मनुष्य सदा जन्म-बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 25
इन्द्रियाणां दमनं कृत्वा विषयौघं परित्यजेत्।
वासुदेवे मनो न्यस्य मुच्यते सर्वपातकैः॥२५॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में करके विषय-वासनाओं का त्याग कर देता है और वासुदेव में मन लगाता है, वह सब पापों से छूट जाता है।
श्लोक 26
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तो यः स याति परमां गतिम्॥२६॥
हिंदी अनुवाद: जो योगयुक्त होकर सभी प्राणियों में अपनी आत्मा को और अपनी आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 27
नाहं देहो न मे देहो जीवो ब्रह्म सनातनः।
इति ज्ञानं यदा जात्ये मुच्यते जन्मसंसृतेः॥२७॥
हिंदी अनुवाद: 'मैं शरीर नहीं हूँ, यह शरीर मेरा नहीं है, जीव सनातन ब्रह्म है'—ऐसा ज्ञान होते ही वह जन्म-संसार से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 28
कर्मणा बध्यते जन्तुः विद्यया तु प्रमुच्यते।
तस्मात् ज्ञानं समभ्यस्येत् मुक्ताये सर्वदा नरः॥२८॥
हिंदी अनुवाद: जीव कर्मों से बँधता है और विद्या (ज्ञान) से मुक्त होता है। इसलिए मुक्ति के लिए मनुष्य को सदा आत्मज्ञान का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 29
विष्णुभक्तिरहितस्य सर्वं व्यर्थं नरोत्तम।
तपस्तपो दानमपि तीर्थयात्रा तथैव च॥२९॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! विष्णुभक्ति के बिना मनुष्य का तप, दान और तीर्थयात्रा आदि सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 30
भक्तिहीनस्य मर्त्यस्य न गतिर्विद्यते क्वचित्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्॥३०॥
हिंदी अनुवाद: भक्तिहीन मनुष्य की कहीं भी उत्तम गति नहीं होती। इसलिए हर प्रकार से भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए।
श्लोक 31
ये भजन्ति महाविष्णुं सर्वभावान्विता नराः।
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥३१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सब भावों से महाविष्णु का भजन करते हैं, उनका सैकड़ों-करोड़ों कल्पों तक फिर कभी संसार में पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 32
एतत्ते कथितं तार्क्ष्य आतिवाहिकवर्णनम्।
यः शृणोति पठेच्चैव सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३२॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे आतिवाहिक शरीर का यह वर्णन कह दिया। जो इसे सुनता या पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 33
इति श्रीगरुड़पुराणे सारोद्धारे आतिवाहिकशरीरवर्णनं नाम अष्टमोऽध्यायः॥३३॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार श्री गरुड़ पुराण सारोद्धार का 'आतिवाहिक शरीर वर्णन' नामक आठवां अध्याय पूर्ण हुआ।
श्लोक 34
हरिः ॐ तत्सत्कृष्णार्पणमस्तु॥३४॥
हिंदी अनुवाद: हरिः ॐ तत्सत्, यह सब श्रीकृष्ण को समर्पित है।
श्लोक 35
नमो भगवते वासुदेवाय नमः॥३५॥
हिंदी अनुवाद: भगवान वासुदेव को बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 36
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
पितुर्मातु मे सर्वमेवांग्रि युग्मं न जाने जाने न च देवमन्यम्॥३६॥
हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! आपके चरण कमल ही मेरे माता-पिता और सब कुछ हैं, मैं आपके सिवा किसी अन्य देव को नहीं जानता।
श्लोक 37
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥३७॥
हिंदी अनुवाद: हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु हैं, आप ही सखा हैं, आप ही विद्या हैं और आप ही मेरा धन हैं।
श्लोक 38
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसंभवः।
त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव॥३८॥
हिंदी अनुवाद: 'हे कमलनेत्र प्रभु! मैं पापी हूँ, पाप कर्मों से युक्त हूँ; आप मेरे समस्त पापों का नाश करके मेरी रक्षा करें।'
श्लोक 39
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जनार्दन॥३९॥
हिंदी अनुवाद: 'हे जनार्दन! आपके सिवा मेरा कोई आश्रय नहीं है, आप ही मेरी शरण हैं; इसलिए दया करके मेरी रक्षा कीजिए।'
श्लोक 40
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।
करोमि यद्यत्सकलम् परस्मै नारायणायेति समर्पितं तत्॥४०॥
हिंदी अनुवाद: शरीर, वाणी, मन, इंद्रिय या स्वभाव से जो कुछ भी कर्म मैं करता हूँ, वह सब भगवान नारायण को समर्पित है।
श्लोक 41
य इदं पठते नित्यं आतिवाहिकवर्णनम्।
न तस्य कुयोनौ जन्म न च नरकपातनम्॥४१॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य आतिवाहिक शरीर वर्णन के इस अध्याय का नित्य पाठ करता है, उसका कभी नीच योनियों में जन्म नहीं होता और न ही वह नरक में गिरता है।
श्लोक 42
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते॥४२॥
हिंदी अनुवाद: इसके प्रभाव से पुत्रहीन को पुत्र और दरिद्र को धन की प्राप्ति होती है तथा वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजनीय होता है।
श्लोक 43
विष्णुभक्तिं समाश्रित्य यः करोति शुभां क्रियाम्।
तस्य पापं क्षयं याति पदं प्राप्नोति वैष्णवम्॥४३॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु की भक्ति का आश्रय लेकर जो शुभ कर्म करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और वह परम वैष्णव पद पाता है।
श्लोक 44
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४४॥
हिंदी अनुवाद: हे सर्वमंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला माँ नारायणी! आपको नमस्कार है।
श्लोक 45
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुड़ध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलाय तनो हरिः॥४५॥
हिंदी अनुवाद: भगवान विष्णु मंगल स्वरूप हैं, गरुड़ध्वज मंगलकारी हैं, कमलनेत्र प्रभु मंगल रूप हैं और श्रीहरि कल्याणप्रद हैं।
श्लोक 46
सर्वथा सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्।
येषां हृदिस्थो भगवान् मंगलायतनो हरिः॥४६॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में मंगल के धाम भगवान श्रीहरि बसे हैं, उनके किसी भी कार्य में कभी कोई अमंगल नहीं होता।
श्लोक 47
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥४७॥
हिंदी अनुवाद: जिनके हृदय में श्यामवर्ण भगवान जनार्दन स्थित हैं, उन्हीं की विजय और लाभ है; उनकी कभी पराजय नहीं होती।
श्लोक 48
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥४८॥
हिंदी अनुवाद: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, वैभव और अचल नीति है।
श्लोक 49
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥४९॥
हिंदी अनुवाद: प्रजा का कल्याण हो, राजा न्याय से पृथ्वी का पालन करें, गो-ब्राह्मणों का नित शुभ हो और संपूर्ण संसार सुखी हो।
श्लोक 50
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्यशालिनी।
देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥५०॥
हिंदी अनुवाद: समय पर वर्षा हो, पृथ्वी अन्न से हरी-भरी रहे, यह देश उपद्रव से रहित हो और सभी निर्भय रहें।
श्लोक 51
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥५१॥
हिंदी अनुवाद: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सब कल्याण देखें और कोई दुःखी न हो।
श्लोक 52
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥५२॥
हिंदी अनुवाद: तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की शांति हो।
श्लोक 53
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥५३॥
हिंदी अनुवाद: हम नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे भगवान विष्णु हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
श्लोक 54
विष्णुः सर्वेश्वरः श्रीमान् सर्वभूतहितैषिणः।
तस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापं प्रणश्यति॥५४॥
हिंदी अनुवाद: सर्वेश्वर, श्रीमान और समस्त प्राणियों का हित चाहने वाले भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 55
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥५५॥
हिंदी अनुवाद: अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव और जानकीनाथ रामचंद्र जी का मैं भजन करता हूँ।
श्लोक 56
नामावलिं इमां नित्यं यः पठेद्भक्तिभावतः।
न तस्य कुयोनौ जन्म विष्णुलोकं स गच्छति॥५६॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य इस नामावली का भक्ति से नित्य पाठ करता है, उसका कुयोनि में जन्म नहीं होता और वह विष्णुलोक जाता है।
श्लोक 57
गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥५७॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ और श्रवण से जीव सब पापों से मुक्त होकर अंत में परम पद विष्णुलोक प्राप्त करता है।
श्लोक 58
इति अष्टमोऽध्यायः सम्पूर्णः॥५८॥
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार गरुड़ पुराण का आठवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ।
श्लोक 59
॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥५९॥
हिंदी अनुवाद: परम सत्य स्वरूप श्री हरि को नमन।
श्लोक 60
॥ इति शुभम् ॥६०॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ और कल्याणकारी हो।
श्लोक 61
संसारसागरो घोरः पापकर्मसमन्वितः।
तस्माद्दारणरूपोऽसौ विष्णुभक्त्या विमुच्यते॥६१॥
हिंदी अनुवाद: यह संसार सागर घोर और पापकर्मों से युक्त है; इस भयंकर संसार से केवल भगवान विष्णु की भक्ति के द्वारा ही मुक्ति मिलती है।
श्लोक 62
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन विष्णुभक्तिं समाचरेत्।
संसारतारिणी भक्तिः सर्वदुःखविनाशिनी॥६२॥
हिंदी अनुवाद: इसलिए हर संभव प्रयत्न करके भगवान विष्णु की भक्ति करनी चाहिए, क्योंकि भक्ति ही संसार से तारने वाली और समस्त दुःखों का नाश करने वाली है।
श्लोक 63
ये भजन्ति महाविष्णुं सर्वभावान्विता नराः।
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥६३॥
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य पूर्ण भाव से महाविष्णु का भजन करते हैं, उनका सैकड़ों-करोड़ों कल्पों तक फिर कभी संसार में पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 64
एतत्ते कथितं तार्क्ष्य आतिवाहिकमुत्तमम्।
यः शृणोति पठेच्चैव सर्वपापैः प्रमुच्यते॥६४॥
हिंदी अनुवाद: हे गरुड़! मैंने तुमसे यह उत्तम आतिवाहिक वर्णन कह दिया। जो इसे सुनता या पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 65
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते॥६५॥
हिंदी अनुवाद: इसके पाठ से पुत्रहीन को पुत्र, दरिद्र को धन मिलता है और वह सब पापों से छूटकर विष्णुलोक में पूजनीय होता है।
श्लोक 66
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द नामेति सदा जपस्व॥६६॥
हिंदी अनुवाद: हे श्रीकृष्ण! हे गोविंद! हे हरे! हे मुरारे! हे नाथ नारायण! हे मेरी जीभ! तू सदा गोविंद नाम के इस अमृत का पान करती रह।
श्लोक 67
गरुड़पुराणपाठेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अन्ते च परमं स्थानं विष्णुलोकं स गच्छति॥६७॥
हिंदी अनुवाद: गरुड़ पुराण के पाठ से जीव सब पापों से मुक्त होकर अंत में परम स्थान विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 68
॥ श्रीहरि ॐ तत्सत् ॥६८॥
हिंदी अनुवाद: श्री हरि ही परम सत्य हैं।
श्लोक 69
॥ इति शुभम् ॥६९॥
हिंदी अनुवाद: सब शुभ और मंगलमय हो।
श्लोक 70
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥७०॥
हिंदी अनुवाद: त्रिविध तापों की शांति हो, सर्वत्र शांति हो।